.........प्रात: 6.00 बजे से:- आज भी प्रासंगिक हैं महात्मा गाँधी के विचार - गांधी जयन्ती पर विशेष आलेख - के के यादव......अपरान्ह 1.00 बजे से:- फ़ूल की टहनियां - कविता.. धीरेन्द्र सिहं....

Tuesday, June 9, 2009

मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ......[कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'


Photobucket रचनाकार परिचय:-

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का जन्म 10 अक्तूबर 1959 को हुआ। आप आपात स्थिति के दिनों में लोकनायक जयप्रकाश के आह्वान पर छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे।

आपकी रचनाओं का विभिन्न समाचार पत्रों, कादम्बिनी तथा साप्ताहिक पांचजन्य में प्रकाशन होता रहा है। वायुसेना की विभागीय पत्रिकाओं में लेख निबन्ध के प्रकाशन के साथ कई बार आपने सम्पादकीय दायित्व का भी निर्वहन किया है।

वर्तमान में आप वायुसेना मे सूचना प्रोद्यौगिकी अनुभाग में वारण्ट अफसर के पद पर कार्यरत हैं तथा चंडीगढ में अवस्थित हैं।

मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ
कौन हो कैसे नहीं मैं जानता हूँ
किन्तु एक अभिनव महा उत्साह से
मैं आ रहा हूँ
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

धूल जाने चरण किसके छू मेरे माथे लगी
अतुल अनजानी अनल से वसन सारे जल गये
थी मलिन बस्ती डगर पा आज
तुम तक आ रहा हूँ
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

स्रष्टि का अविचल महामंडल घिरा प्रतिछोर से
दिव्य आभालोक मण्डित चकित हूं चहुंओर से
सत्य सलिला सरित तट पर
लो ... आज मैं भी आ रहा हूं
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

शून्य में पग चिन्ह फिरता खोजता
गहन गह्‍वर तमस में अनभिज्ञ धुंधले मार्ग पर
ओ बटोही अनत अंतस के सुनो
निसर्ग चलना ही पथिक का धर्म
चलता जा रहा हूँ
अव्यक्‍त मेरे युग बटोही ठहर
मैं भी आ रहा हूं.
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

15 टिप्पणियाँ:

अवनीश एस तिवारी June 9, 2009 1:20 PM  

सुन्दर है | बधाई |

अवनीश तिवारी

अल्पना वर्मा June 9, 2009 3:57 PM  

शून्य में पग चिन्ह फिरता खोजता

'गहन गह्‍वर तमस में अनभिज्ञ धुंधले मार्ग पर

ओ बटोही अनत अंतस के सुनो

निसर्ग चलना ही पथिक का धर्म

चलता जा रहा हूँ'

antim panktiyan ek sundar sandes deti hui hain.

bahut hi sundar kavita,badhaayee.

शोभा June 9, 2009 4:35 PM  

शून्य में पग चिन्ह फिरता खोजता

गहन गह्‍वर तमस में अनभिज्ञ धुंधले मार्ग पर

ओ बटोही अनत अंतस के सुनो

निसर्ग चलना ही पथिक का धर्म

चलता जा रहा हूँ
ek bahut hi sachhi abhivyakti.

Kiran Sindhu June 9, 2009 5:44 PM  

मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ
शास्वत सत्य को व्यक्त करती हुई श्रीकांत जी की यह कविता नि;संदेह एक उत्कृष्ट रचना है. बहुत सुन्दर शब्दों के माध्यम से अनंत - पथ के राही की मनोदशा का जीवंत चित्रण है.

Science Bloggers Association June 9, 2009 6:11 PM  

प्रभावी कविता है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रंजना June 9, 2009 7:49 PM  

इस सुन्दर अभिव्यक्ति ने तो मन ही मुग्ध कर लिया....बहुत ही सुन्दर रचना...

श्यामल सुमन June 9, 2009 8:28 PM  

मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ। - सारगर्भित रचन श्रीकान्त भाई। वाह। लेकिन कितने लोग सुन पाते हैं ये पदचाप जो कि यक्ष - युधिष्ठिर संवाद में किमाश्चर्यम् प्रश्न का मूल भी है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
[email protected]

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) June 10, 2009 9:19 AM  

मिश्र जी बहुत ही सुंदर कविता है हर्दय के अन्दर क्या चल रहा है कितनी उथल पुथल है इस कविता से बखूबी पता चल रहा न जाने क्यूँ ये जानते हुए भी की म्रत्यु सत्य है हम अपनी आंखे बंद कर लेते है
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

दिगम्बर नासवा June 10, 2009 11:36 AM  

मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

शाश्वत बात................ कदम दर कदन ये आवाज़ नज़दीक होती जाती है......
लाजवाब रचना............ बधाई

Vijay Kumar Sappatti June 10, 2009 1:03 PM  

bahut dino se main soch raha tha ki mrutyu par kuch likhu.. aaj aapki kavita padhkar pyaas bujh gayi .. aapne bahut shaandar likha hai ..

badhai

राजाभाई कौशिक June 10, 2009 1:19 PM  

भई वाह! कांत जी अच्छा दर्पण दिखाया बाज को आते देख कपोत सा निश्चिंत अंत निरा निर्लेप तमस से आश्वश्त शाधित संत श्री की कांत से चकित चाहे अट्टालिका अनंत म्रिग्त्रृष्णा तो मरे न मरे आगया वीथी का अंत

राजीव तनेजा June 11, 2009 8:39 AM  

जीना यहाँ...मरना यहाँ

इसके सिवा..जाना कहाँ


सुन्दर कविता

रंजना [रंजू भाटिया] June 11, 2009 4:41 PM  

स्रष्टि का अविचल महामंडल घिरा प्रतिछोर से
दिव्य आभालोक मण्डित चकित हूं चहुंओर से
सत्य सलिला सरित तट पर
लो ... आज मैं भी आ रहा हूं
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

यही एक शश्वत सत्य है .जिसको भुलाया झुठलाया नहीं जा सकता है ...इस भाव को आपने बहुत सुन्दर शब्दों में पिरोया है ..जिसको याद रखना हर मनुष्य के बस की बात नहीं ..सच हर कोई जानता है ,पर वह एक भ्रम में जीता रहता है अच्छी लगी आपकी यह रचना शुक्रिया

sunita yadav June 11, 2009 10:47 PM  

कविता बहुत ही हृदयस्पर्शी बन पड़ी है.जीवन और मृत्यु तो शाश्वत सत्य है पर इस कविता को पढने के बाद ज्ञात होता है ..कवि सहर्ष परमात्मा में लीन होना चाहते हैं तथा कथित मृत्यू का आलिंगन करना चाहते हैं ...पर ...

जीना है क्यूँ कि जन्म है ..
पर स्थिति कहाँ
मरना है पर हाय
मृत्यू भी तो नहीं !

सोचलो तुम निर्जीव
क्या सचमुच हो जीवित ?
क्यूँ कि बचना ही तो नहीं है जीवन .....

फिर से कहना चाहती हूँ ..वाकई कविता अपनी ही बाढ़ में समूचे वातावरण को बहाने की शक्ति रखती है

बेनामी June 21, 2009 9:25 AM  

............
अतुल अनजानी अनल से वसन सारे जल गये
थी मलिन बस्ती डगर पा आज
तुम तक आ रहा हूँ
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ

आत्मा से जुड़ी हुयी कविता ..... अत्यंत सुंदर

- अपरा

सितम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

कविता:-अजय यादव, सुशील कुमार, दीपक शर्मा, राजीव रंजन प्रसाद, तेज राम शर्मा, रचना श्रीवास्तव, हिन्दी दिवस पर तीन कवितायें - डॉ. वेद व्यथित/ डी. के. सिंह/ शोभा महेन्द्रू., अवनीश तिवारी, प्रथम नागरिक हैं पेड़ पृथ्वी पर [पेंटिंग -कविता श्रंखला - 3] - सुशील कुमार,
कहानी:- शक्ति प्रकाश,
गज़ल:-देवमणि पांडेय, नीरज गोस्वामी, दीपक बेदिल, दिगम्बर नासवा, दीपक गुप्ता, श्रद्धा जैन,
जीवन परिचय:-
नज़म:-
काव्यालोचना:-

साहित्य समाचार:-"स्पंदन" संस्था का प्रथम कथा पुरस्कार श्रीमती मृदुला गर्ग को - वीरेन्द्र जैन, दिविक रमेश का हिंदी कविता में एक पृथक चेहरा है - केदारनाथ सिंह - डॉ. प्रेम जन्मेजय,

गीत:-

कवि चर्चा:- रचनाकार से मिलिए -गीति-शिल्पी महेंद्रभटनागर - साहित्य शिल्पी,
साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव:-
साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव समारोह/ काव्य गोष्ठी/ ब्लॉगर्स महा सम्मेलन - रिपोर्ट, " हिन्दी दिवस और साहित्य शिल्पी का आज जन्मदिवस" [आज साहित्य शिल्पी का स्थापना दिवस है] - विशेष प्रस्तुति, " साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव समारोह/ काव्य गोष्ठी/ ब्लॉगर्स महा सम्मेलन की रिपोर्ट, समाचार माध्यमों एवं विभिन्न ब्ळोग मंचों पर।,

सितम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': काव्य का रचना शास्त्र:२6, काव्य का रचना शास्त्र:२7, वर्ण्य एक वर्णन कई, अलंकार उल्लेख -काव्य का रचना शास्त्र: २८, जोर सहित दोहराव ही, है पुनरुक्तिप्रकाश- काव्य का रचना शास्त्र: २९ ,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:- ब्राह्मण और तीन दुष्ट [हितोपदेश का काव्यानुवाद - 5] - सीमा सचदेव,
आलेख:- छत्तीसगढ़ में गणेश उत्सव की प्राचीन परंपरा - प्रो. अश्विनी केशरवानी, आशा भोसले एक परिचय - अजय कुमार, भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी के बढ़ते कदम - के के यादव, वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रभाषा हिन्दी की विकास प्रक्रिया - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, दुर्गा सप्तशती अर्थात 700 प्रयोग [नवरात्रि पूजा विधि पर विशेष आलेख] - अजय कुमार, दिनकर का काव्य : दहकते अंगारों पर इंद्रधनुषों की क्रीड़ा [रामधारी सिंह दिनकर जयंती पर विशेष] - सुशील कुमार,

सितम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:- जिन्नागिरी के पेंच - आलोक पुराणिक,
श्रद्धांजलि:- "हिन्दी चेतना" की ओर से फ़ादर कामिल बुल्के को श्रद्धाँजलि - शशि पाधा, डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' नहीं रहीं [श्रद्धांजलि] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल",
साक्षात्कार:-कमिटमेंट की कमी है आज के लेखन में - पुष्पा भारती। [प्रसिद्ध साहित्यकार तथा प्रखर पत्रकार पुष्पा भारती जी से बातचीत] - मधु अरोरा,
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP