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गुरुवार, २८ मई २००९

मोहन राणा की कवितायें - विशेष प्रस्तुति

मोहन राणा समकालीन कवियों में उँचा स्थान रखते हैं। आपके काव्य संग्रह "धूप के अंधेरे में" को 10 वें पद्मानंद अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मान के लिये घोषित किया गया है। इस अवसर पर साहित्य शिल्पी नें जब श्री मोहन राणा से प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कहा - "सम्मान कविता का होता है"। साहित्य शिल्पी परिवार आपकी इस विनम्रता को नमन करता है और इस उपलब्धि पर हार्दिक शुभकामनायें देता है। 

मोहन राणा जी नें अपने काव्य संग्रह "धूप के अंधेरे में" से चुन कर कुछ रचनायें साहित्य शिल्पी के पाठकों के लिये प्रेषित की हैं। प्रस्तुत हैं:- 
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पतझर में

पतझर में गिरते हुए पत्ते एक पल रुकते हवा में
एक झलक फीके नीले आकाश की गिरने से पहले
वे किसके हृदय हैं
किसकी आशा
झुककर मैं उठाता
और वे गिरते लगातार

14.10.2003

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रचनाकार परिचय:-

मोहन राणा का जन्म 1964 में दिल्ली में हुआ. वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मानविकी में स्नातक हैं, आजकल ब्रिटेन के बाथ शहर के निवासी हैं। उनके 6 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

जगह(1994),जैसे जनम कोई दरवाजा (1997), सुबह की डाक (2002), इस छोर पर (2003), पत्थर हो जाएगी नदी (2007),धूप के अँधेरे में (2008). एक द्विभाषी संग्रह With Eyes Closed का प्रकाशन 2008 में हुआ है.

कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार - हिंदी कविता की नई पीढ़ी में मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है, क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता. यह कविता यदि किसी विचारात्मक खांचे में नहीं अँटती तो इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि मोहन राणा की कविता विचार से परहेज करती है - बल्कि वह यह जानती है कि कविता में विचार करने और कविता के विचार करने में क्या फर्क है. मोहन राणा के लिए काव्य रचना की प्रक्रिया अपने में एक स्वायत्त विचार प्रक्रिया भी है.

कोई बात

धूपघड़ी में सूरज
उतरा
कि दिखा
धूपघड़ी में अँधेरा

धरती ना घूमती तो होता कैसे
दिन पूरा इस घड़ी का

आना ही था यहाँ
जानने
बेकार गिनना समय को
रोशनी और छायाओं में
बस गिनता हूँ अपने आप को

जब तक याद रहती है
कोई बात भूलने के लिए

17.9.2007

*****

अर्थ शब्दों में नहीं तुम्हारे भीतर है

मैं बारिश में शब्दों को सुखाता हूँ
और एक दिन उनकी सफ़ेदी ही बचती है
जगमगाता है बरामदा शून्यता से
फिर मैं उन्हें भीतर ले आता हूँ

वे गिरे हुए छिटके हुए क़तरे जीवन के
उन्हें चुन जोड़ बनाता कोई अनुभव
जिसका कोई अर्थ नहीं बनता
बिना कोई कारण पतझर उनमें प्रकट होता
बाग़ की सीमाओं से टकराता
कोई बरसता बादल,
दो किनारों को रोकता कोई पुल उसमें
आता जैसे कुछ कहने,
अक्सर इस रास्ते पर कम ही लोग दिखते हैं
यह किसी नक़्शे में नहीं है
कहीं जाने के लिए नहीं यह रास्ता,
बस जैसे चलते-चलते कुछ उठा कर साथ लेते ही
बन पड़ती कोई दिशा,
जैसे गिरे हुए पत्ते को उठा कर
कि उसके गिरने से जनमता कोई बीज कहीं

7.11.2005

*****

डरौआ

समय के बिना भी
मैं जी लूँगा समय निकालकर कहीं से
धूप के अँधेरे में

स्वागत करूँगा समयहीन ऊसर प्रदेशों में विपत्तियों के अंधड़ों का
इस बार भी,
कोई और नहीं आता उसके अलावा इस ओर

25.9.2007

*****

पानी का चेहरा

चिमनी में करती रही बातें
हवा कल सारी रात
जंगलों की कहानियाँ
पहाड़ों की यातना
समुंदरों का सीत्कार
सो रही और कहीं जागती दुनिया के दुस्वप्न
उसके अल्पविरामों के बीच
झरती बरसों पहले बुझ चुके अंगारों की राख,
चुपचाप
नींद में भी
सुनता रहा अपने आप को समेटता
जूझता रहा उसकी उमंग से,
मैं अँधेरे में पानी का चेहरा था
पेड़ों और दीवारों पर बहता

2.2.2002

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18 टिप्पणियाँ:

नंदन May 28, 2009 7:07 AM  

सभी कवितायें असाधारण हैं। मोहन राणा जी को पद्मानंद साहित्य सम्मान के लिये बधाई।

अनिल कुमार May 28, 2009 7:38 AM  

नींद में भी
सुनता रहा अपने आप को समेटता
जूझता रहा उसकी उमंग से,
मैं अँधेरे में पानी का चेहरा था
पेड़ों और दीवारों पर बहता

प्रत्येक प्रस्तुत रचना बताती है कि मोहन राणा कविता का एक बडा नाम क्यों हैं। बधाई।

रचना सागर May 28, 2009 7:55 AM  

मोहन राणा जी को साहित्य शिल्पी पर पडःअना अच्छा लगा। सभी कवितायें प्रभावित करने वाली हैं। म्फन जी को सम्मान की बधाई।

दृष्टिकोण May 28, 2009 11:11 AM  

सभी कवितायें अच्छी लगीं खास कर - पानी का चेहरा।

राजीव रंजन प्रसाद May 28, 2009 9:33 AM  

आस पास के सहज से दिखने वाले दृश्य मोहन राणा जी की कविताओं में बिम्ब बने हैं। पतझर, धूप पहाड समंदर पानी कविता को पेंटिंग की शक्ल दे रहे हैं। मोहन जी की कविता पढी जाने के साथ साथ देखी और महसूस भी की जा सकती है।


मोहन राणा जी को 10वे पद्मानंद साहित्य सम्मान की बधाई।

बेनामी May 28, 2009 8:00 AM  

Nice Poems. Thanks.

Alok Kataria

अभिषेक सागर May 28, 2009 11:49 AM  

बहुत अच्छी कवितायें, बधाई।

Vijay Kumar Sappatti May 28, 2009 11:47 AM  

mohan ji ,aapko meri dil se badhai .. aapki kavitayen subah bhi padi ..aur abhi bhi padhi , dil nahi bhara ..man kahin kahin ud jaata hai .. aapki kavita padhte samay yun lagta hai ki koi chitr ban raha hai man ke aakash me ...

aapko aur sahitya shilpi ko dil se badhai ..

vijay

निधि अग्रवाल May 28, 2009 1:37 PM  

साहित्य शिल्पी का स्तर निरंतर बढता जा रहा है। मोहन राणा जी की कविताओं को पढ कर सुखद अनुभूति हुई। मेरा दुर्भाग्य था कि मैने अब तक उन्हे नहीं पढा था।

पंकज सक्सेना May 28, 2009 2:11 PM  

राणा जी को बधाई। सभी रचनायें अच्छी लगी।

तेजेन्द्र शर्मा May 28, 2009 2:19 PM  

भाई राजीव जी

मोहन राणा कि कविताएं भारत की मुख्यधारा की कविता या विश्व की आधुनिक कविता का मुक़ाबला करने में सक्षम हैं। वे पुराने बिम्बों का इस्तेमाल न करके अपने लिये नये आधुनिक बिम्बों का निर्माण करते हैं।

साहित्यशिल्पी ने कथा यू.के. के सम्मानित साहित्यकारों को जो विशेष महत्व देने का बीड़ा उठाया है मैं हृदय से आपका आभारी हूं।

आपकी कविता भी पढ़ी। बहुत अच्छे विषय को ख़ूबसूरत ढंग से पेश किया है आपने। आपकी युवा पीढ़ी इसी तरह हिन्दी कविता को नये बिम्ब और नया मुहावरा देती रहे - यह मेरी कामना है।

तेजेन्द्र शर्मा
महासचिव - कथा यू.के.

nitesh May 28, 2009 2:25 PM  

तेजेन्द्र जी की बात सही है मोहन राणा जी के बिम्बों में ताजगी है। कविताओं का आनंद आया।

मोहिन्दर कुमार May 28, 2009 2:49 PM  

आम कविताओं से हट कर अनूठे बिम्ब व भाव लिये कवितायें.

अनन्या May 28, 2009 3:53 PM  

सम्मान कविता का होता है कह कर मोहन राणा जी नें सचमुच विनम्रता का परिचय दिया है। उनकी कवितायें प्रभावित करने वाली हैं।

Dr. Sudha Om Dhingra May 28, 2009 10:47 PM  

अच्छी कविताएँ-बधाई.

dhirendra chandel May 28, 2009 11:11 PM  

kavitaayen nahi jadibootiyaan thi padhte hi oorja ki ek lahar mere jahen me daud gayi.....

madhu, mumbai. May 29, 2009 1:21 PM  

Mohan Ranaji, aapko PADMANAND SAHITYA SAMMAN ki bahut bahut badhai. aapki kavitaaeiN sach mein samvedansheelta ke dharatal per kharee utaratee hain. saccha kavi wahi hai jo dil ke marm ko sparsh kare aur ye tatva aapki kavitaaoN mein hai.

shaityashilpi ki team ko bahut bahut aabhar ki wey itnee sakriyata se hindi ke prasaar mein yogdaan de rahe hain.

अविनाश वाचस्पति June 17, 2009 10:18 PM  

मोहन राणा जी को
उनकी कविताओं में
विचारों की विशालता
और अनूठे नए बिम्‍बों के
अद्भुत मनभावन प्रस्‍तुतीकरण
के लिए बधाई।

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': अलंकार दृष्टान्त को जानें, लें आनंद -काव्य का रचना शास्त्र: ३९,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

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