भ्रांतिमान में भूल से, लगे असत ही सत्य[काव्य का रचना शास्त्र:२२] -आचार्य संजीव 'सलिल'
भ्रांतिमान में भूल से, लगे असत ही सत्य.
जब दिखती है एक में, दूजे की छवि मीत.
भ्रांतिमान कहते उसे, कविजन गाते गीत..
गुण विशेष से एक जब, लगता अन्य समान.
भ्रांतिमान तब जानिए, अलंकार गुणवान..
भ्रांतिमान में भूल से, लगे असत ही सत्य.
गुण विशेष पाकर कहें, ज्यों अनित्य को नित्य..
जैसे रस्सी देखकर, सर्प समझते आप.
भ्रांतिमान तब काव्य में, भ्रम लख जाता व्याप..
साहित्य शिल्पी" width="80" align="left" border="0">रचनाकार परिचय:-जब दो वस्तुओं में किसी गुण विशेष की समानता के कारण भ्रमवश एक वस्तु को अन्य समझ लिया जाये तो उसे ''भ्रांतिमान अलंकार'' कहते हैं.
उदाहरण:
१.
कपि करि ह्रदय विचार, दीन्ह मुद्रिका डारि तब.
जनु असोक अंगार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ..-तुलसीदास
२.
जान स्याम घन स्याम को, नाच उठे वन-मोर.
३.
चंद के भरम होत, मोद है कुमोदिनी को.
कुमुदिनी को देखकर चंद्रमा का भ्रम होना, भ्रांतिमान अलंकार का लक्षण है.
४.
चाहत चकोर सूर ओर, दृग छोर करि.
चकवा की छाती तजि, धीर धसकति है..
५.
हँसनि में मोती से झरत जनि हंस दौरें बार मेघ मानी बोलै केकी वंश भूल्यौ है.
कूजत कपोत पोत जानि कंठ रघुनाथ फूल कई हरापै मैन झूला जानि भूल्यौ है.
ऐसी बाल लाल चलौ तुम्हें कुञ्ज लौं देखाऊँ जाको ऐसो आनन प्रकास वास तूल्यौ है.
चितवे चकोर जाने चन्द्र है अमल घेरे भौंर भीर मानै या कमल चारु फूल्यौ है.
६.
नाक का मोती अधर की कांति से.
बीज दाडिम का समझ कर भ्रांति से.
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है.
सोचता है अन्य शुक यह कौन है. - मैथिलीशरण गुप्त
७.
काली बल खाती चोटी को देख भरम होता नागिन का. -सलिल
८. अरसे बाद
देख रोटी चाँद का
आभास होता. -सलिल
९.
जन-गण से है दूर प्रशासन
जनमत की होती अनदेखी
छद्म चुनावों से होता है
भ्रम सबको आजादी का. -सलिल
साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.
'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है.
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18 comments:
जब दिखती है एक में, दूजे की छवि मीत.
भ्रांतिमान कहते उसे, कविजन गाते गीत..
गुण विशेष से एक जब, लगता अन्य समान.
भ्रांतिमान तब जानिए, अलंकार गुणवान..
प्रभावी विवेचन।
Nice article. Thanks.
Alok Kataria
सलिल जी आपके प्रत्येक आलेखों की तरह यह आलेख भी रुचिकर तथा महत्व का है। सभी नवीन उदाहरणों के लिये भी धन्यवाद। सच कहूँ तो इस अलंकार का नाम भी मैने पहले नहीं सुना था।
आभार संजीव जी।
भ्रांतिमान अलंकार सामयिक विसंगतियों को उद्घाटित करने, आम आदमी की पीडा को शब्द देने और युगीन विडंबनाओं पर प्रहार करने का सशक्त हथियार है किन्तु इसका प्रयोग वही कर सकता है जिसे भाषा पर अधिकार हो तथा जिसका शब्द भंडार समृद्ध हो.
आचार्य संजीव जी का हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक और संग्रहयोग्य लेख।
Sundar rachna..badhai !!
पुरानी कविताओं के अर्थ दे कर आपने अपने आलेख पर मेरे जैसे अनाडियों की समझ बढा दी है।
सरल विवेचना आपकी विशेषता है।
रक्षाबंधन पर्व की साहित्य शिल्पियों को बधाई। सलिल जी के विषय में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाना ही है।
बहुत अच्छा आलेख, बधाई।
रुचिकर के साथ ज्ञानवर्धक आलेख, रोजमर्रा की जिन्दगी में यह भ्रांतिमान अलंकार अक्सर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा ही लेता है !
आप सभी को रक्षा-बंधन और कजलियों की शुभ कामनाएँ. नन्दन जी! सूरज को दीपक न दिखाकर सलिल का अर्ध्य चढा दीजिये तो यह धन्य हो जायेगा.
सुन्दर प्रस्तुति |
अवनीश तिवारी
अलंकारों पर प्रामाणिक आलेख श्रंखला।
रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें।
atisundar prastuti.
dhanyawaad.
सभी पाठकों, प्रशंसकों व् टिप्पणीकारों को धन्यवाद तथा बुंदेलखंड के लोक पर्व कजलियाँ की शुभकामनायें.
अदा जी!
'सुन्दरता' आकार का विशेषण है. आप सुन्दर हैं. प्रकृति सुन्दर है. भवन सुन्दर है. इस तरह के प्रयोग सही हैं. इन्हें स्वादिष्ट नहीं कहा जा सकता क्योंकि स्वाद रसना (जिव्हा) से अनुभूत किया जाता है. स्वाद को आँखों से नहीं देखा जा सकता. रूप और रंग को बिना आँखों के नहीं देखा जा सकता किन्तु काव्य या लेख का आनंद सुनकर या पढ़कर लिया जाता है. लेख का आकार केवल छोटा या बड़ा होता है. सभी अक्षर हमेशा एक से लिखे जाते हैं. उनकी श्रेष्ठता सुन्दरता से नहीं उनके अर्थ और कथ्य से आँकी जाती है. लिखायी का सुन्दर या असुंदर होना अक्षरों के आकारों से संबंधित है पर साहित्यिक सामग्री की श्रेष्ठता के निर्धारण के मानक अलग हैं.
सरसता, मधुरता, मार्मिकता, भाषिक शुद्धता, शैली, बिम्ब, प्रतिक, सामयिकता, प्रासंगिकता, उपयोगिता आदि अनेक मानक हैं. शायद आप सहमत हो सकें कि 'सुन्दर' का पर्यायवाची 'खूबसूरत' किसी रचना के लिए प्रयोग किया जाना ठीक नहीं है क्योकि रचना की सूरत ही नहीं होती. क्या किसी लेख को 'हसीं', 'नाजनीन', नयनाभिराम'' 'आकर्षक' आदि विशेषण देना उचित होगा? इसी तरह ''सुन्दर ' का प्रयोग भी सार्थक नहीं है. कृपया, अन्यथा न लें.
भाषा में शब्दों का सही प्रयोग ही साहित्यकार और सामान्य जन कि पहचान बनता है. यदि मैं गलत हूँ तो कृपया बताएं, मैं स्वयं को सुधारूँगा.
रचना श्रंखला के लिये तो हम आपके आभारी हैं ही आपसे भाषा को ले कर ज्ञान प्राप्ति भी होती रहती है। यथोचित सुधार का प्रयास रहेगा।
वाह ! काव्य में ही संपूर्ण जानकारी.. आभार
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