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बुधवार, ५ अगस्त २००९

मानवीय रिश्तों को एक धागे में बाँधता रक्षाबन्धन पर्व [आलेख] - कृष्ण कुमार यादव

भारतीय संस्कृति में त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर त्यौहार के साथ धार्मिक मान्यताओं, मिथकों, सामाजिक ऐतिहासिक घटनाओं और परम्परागत विश्वासों का अद्भुत संयोग प्रदर्शित होता है। त्यौहार सिर्फ एक अनुष्ठान मात्र नहीं हैं, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुडे रहने का सुखद अहसास भी जुड़ा होता है। त्यौहारों को मनाने के तरीके अलग हो सकते हैं पर उद्देश्य अंतत: एक ही है। यहाँ तक कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए त्यौहारों मेलों का एक मंच के रूप में प्रयोग होता था। Justify Full
रक्षाबन्धन भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख त्यौहार है जो कि श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिए भाई को राखी बाँधती है। भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। पहले रक्षा बन्धन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’- अर्थातसूत्रअविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। गीता में ही लिखा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योतिर्लिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं।

राखी का सर्वप्रथम उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है जिसके अनुसार असुरों के हाथ देवताओं की पराजय पश्चात अपनी रक्षा के निमित्त सभी देवता इंद्र के नेतृत्व में गुरू वृहस्पति के पास पहुँचे तो इन्द्र ने दुखी होकर कहा- ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुनकर गुरू वृहस्पति के दिशा-निर्देश पर रक्षा-विधान हेतु इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित समस्त देवताओं की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और अंतत: इंद्र ने युद्ध में विजय पाई। एक अन्य कथानुसार राजा बलि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बलि के राज्य की रक्षा के लिये चले गय। तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो बलि ने देवी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बलि ने भगवान विष्णु से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की। त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुँची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बाँध दिया और कहा कि- ‘‘भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे, तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटनेवालों से तुम बदला ले सकोगे।’’ इसी प्रकार महाभारत काल में भगवान कृष्ण के हाथ में एक बार चोट लगने फिर खून की धारा फूट पड़ने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी कंचुकी का किनारा फाड़कर भगवान कृष्ण के घाव पर बाँध दिया। कालांतर में दु:शासन द्वारा द्रौपदी-चीर-हरण के प्रयास को विफल कर उन्होंने इस रक्षा-सूत्र की लाज बचायी। द्वापर युग में ही एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘‘राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा।’’

रचनाकार परिचय:-

कृष्ण कुमार यादव का जन्म 10 अगस्त 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ0 प्र0) में हुआ। आपनें इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नात्कोत्तर किया है। आपकी रचनायें देश की अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं साथ ही अनेकों काव्य संकलनों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आपकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं: अभिलाषा (काव्य संग्रह-2005), अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह-2006), इण्डिया पोस्ट-150 ग्लोरियस इयर्स (अंग्रेजी-2006), अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह-2007), क्रान्ति यज्ञ :1857-1947 की गाथा (2007)।

आपको अनेकों सम्मान प्राप्त हैं जिनमें सोहनलाल द्विवेदी सम्मान, कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान, काव्य गौरव, राष्ट्रभाषा आचार्य, साहित्य-मनीषी सम्मान, साहित्यगौरव, काव्य मर्मज्ञ, अभिव्यक्ति सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य श्री, साहित्य विद्यावाचस्पति, देवभूमि साहित्य रत्न, सृजनदीप सम्मान, ब्रज गौरव, सरस्वती पुत्र और भारती-रत्न से आप अलंकृत हैं। वर्तमान में आप भारतीय डाक सेवा में वरिष्ठ डाक अधीक्षक के पद पर कानपुर में कार्यरत हैं।

ऐतिहासिक युग में भी सिंकदर पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया। मुगल काल के दौर में जब मुगल सम्राट हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया। इसी प्रकार जाने कितनी मान्यतायें रक्षा बन्धन से जुड़ी हुयी हैं।
लोक परम्परा में रक्षाबन्धन के दिन परिवार के पुरोहित द्वारा राजाओं और अपने यजमानों के घर जाकर सभी सदस्यों की कलाई पर मौली बाँधकर तिलक लगाने की परम्परा रही है। पुरोहित द्वारा दरवाजों, खिड़कियों, तथा नये बर्तनों पर भी पवित्र धागा बाँधा जाता है और तिलक लगाया जाता है। यही नहीं बहन-भानजों द्वारा एवं गुरूओं द्वारा स्त्रियों को रक्षा सूत्र बाँधने की भी परम्परा रही है। राखी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। कई बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधकर देश की लाज रखने का वचन लिया। 1905 में बंग-भंग आंदोलन की शुरूआत लोगों द्वारा एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधकर हुयी। राखी से जुड़ी एक मार्मिक घटना क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के जीवन की है। आजाद एक बार तूफानी रात में शरण लेने हेतु एक विधवा के घर पहुँचे। पहले तो उसने उन्हें डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया पर यह पता चलने पर कि वह क्रांतिकारी आजाद है, ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गई। बातचीत के दौरान आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जवान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं तो उन्होंने द्रवित होकर उससे कहा- “मेरी गिरफ्तारी पर 5000 रूपये का इनाम है, तुम मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस इनाम से बेटी की शादी कर लो।यह सुन विधवा रो पड़ी कहा- “भैया! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। अत: मै ऐसा हरगिज नहीं कर सकती।यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आजाद के हाथों में बाँधकर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आजाद।

देश के विभिन्न अंचलों में राखी पर्व को भाई-बहन के त्यौहार के अलावा भी भिन्न-भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। मुम्बई के कई समुद्री इलाकों में इसे नारियल-पूर्णिमा या कोकोनट-फुलमून के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से समुद्र देवता पर नारियल चढ़ाकर उपासना की जाती है और नारियल की तीन आँखों को शिव के तीन नेत्रों की उपमा दी जाती है। बुन्देलखण्ड में राखी को कजरी-पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन कटोरे में जौ धान बोया जाता है तथा सात दिन तक पानी देते हुए माँ भगवती की वन्दना की जाती है। उत्तरांचल के चम्पावत जिले के देवीधूरा में राखी-पर्व पर बाराही देवी को प्रसन्न करने के लिए पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता रहा है, जिसे स्थानीय भाषा मेंबग्वालकहते हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि इस युद्ध में आज तक कोई भी गम्भीर रूप से घायल नहीं हुआ और ही किसी की मृत्यु हुई। इस युद्ध में घायल होने वाला योद्धा सर्वाधिक भाग्यवान माना जाता है एवं युद्ध समाप्ति के पश्चात पुरोहित पीले वस्त्र धारण कर रणक्षेत्र में आकर योद्धाओं पर पुष्प अक्षत् की वर्षा कर आशीर्वाद देते हैं। इसके बाद युद्ध बन्द हो जाता है और योद्धाओं का मिलन समारोह होता है। एक रोचक घटनाक्रम में हरियाणा राज्य में अवस्थित कैथल जनपद के फतेहपुर गाँव में सन् 1857 में एक युवक गिरधर लाल को रक्षाबन्धन के दिन अंग्रेजों ने तोप से बाँधकर उड़ा दिया, इसके बाद से गाँव के लोगों ने गिरधर लाल को शहीद का दर्जा देते हुए रक्षाबन्धन पर्व मनाना ही बंद कर दिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूरे होने पर सन् 2006 में जाकर इस गाँव के लोगों ने इस पर्व को पुन: मनाने का संकल्प लिया।
रक्षाबन्धन हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का अंग है। आज जरुरत है कि आडम्बर की बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।

24 comments:

Rashmi Singh २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन पर्व की बधाई...पौराणिक, ऐतिहासिक एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य को सहेजता सुन्दर आलेख..के.के. जी का आभार.

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

Very Interesting article on Rakhi, Thanks to KK Yadav.

Dr. Brajesh Swaroop २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

त्यौहार भी मन गया, नई-नई जानकारियां भी मिलीं. सब साहित्याशिल्पी पर कृष्ण की माया है.

डाकिया बाबू २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

Nice Article.

Bhanwar Singh २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

सारगर्भित लेख. पर्व की प्रासंगिकता को खूबसूरती से बताता है.रक्षाबंधन की बधाई...

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

Very Interesting article on Rakhi, Thanks to KK Yadav.

आकांक्षा~Akanksha २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

त्यौहार सिर्फ एक अनुष्ठान मात्र नहीं हैं, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुडे रहने का सुखद अहसास भी जुड़ा होता है।
___________________________
आपने तो त्योहारों का सार ही लिख दिया..बहुत-बहुत बधाई..सुन्दर प्रस्तुति.

अजय कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन पर अच्छी रोचक आलेख...

युवा २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

राखी त्यौहार के बारे में तमाम मान्यताएं पढ़ी थीं, पर कृष्ण कुमार जी ने तो पूरा खजाना ही रख दिया. ऐसे आलेख युवा पीढी को त्योहारों से जोड़ते हैं.

Ram Shiv Murti Yadav २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन पर शोधपूर्ण रचना.

Ghanshyam २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। ........आपकी ये पंक्तियाँ ह्रदय को छूती हैं. राखी-पर्व की शुभकामनायें.

आकांक्षा~Akanksha २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
बाजीगर २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

Bahut khub ! Historical information se paripurna Rakhi. Lajwab prastuti.

Pakhi २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन का त्यौहार तो बहुत प्यारा होता है. मैंने भी आज राखी बांधी.

ersymops २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबन्धन हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का अंग है। आज जरुरत है कि आडम्बर की बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।...Ekdam sahi kaha apne.

SR Bharti २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

कृष्ण कुमार जी ने इस लेख में रक्षाबंधन की भावना को बहुत करीने से सोदाहरण दर्शाया है. उनकी लेखन क्षमता के लोग यूँ ही कायल नहीं हैं....बहुत-बहुत बधाई.

Pakhi २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन का त्यौहार तो बहुत प्यारा होता है. मैंने भी आज राखी बांधी.

शरद कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

भाई-बहन के इस पवित्र त्यौहार पर ढेरों शुभकामनायें. स्नेह का बंधन यूँ ही बना रहे. के. के. सर का आलेख पढ़कर इस पर्व से जुडी तमाम अनकही बातों के बारे में भी विस्तृत जानकारी मिली...धन्यवाद.

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

राखी के पौराणिक तथा वर्तमान महत्व को सुन्दरता से प्रस्तुत किया है के. के. जी नें। शुभकामना।

ersymops २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

प्रभावी आलेख है। सचमुच रक्षाबंधन मानवीय रिश्तों को एक धागे में पिरोने वाला पर्व है।

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

यह ब्लॉग वास्तव में ब्लॉग को सम्पूर्ण रूप से परिभाषित करता है आभार

जीवन सफ़र २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन पर्व की पौराणिक तथा वर्तमान महत्व को दर्शाता हुआ बहुत ही सुंदर सारगर्भित आलेख है।रक्षाबंधन के इस पावन पर्व पर बहुत-बहुत शुभकामनायें।

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१६ PM  

रक्षाबंधन पर संपूर्ण जानकारी देने के लिये यादव जी का आभार.

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