बधाइयों की भीड़ में [कविता] - सुभाष नीरव
रचनाकार परिचय:-‘जब न मिलने के आसार बहुत हों,
जो मिल जाए, वही अच्छा है’
एक अरसे के बाद
सुनने को मिलीं ये पंक्तियाँ
उनके मुख से
जब मिला उन्हें लखटकिया पुरस्कार
उम्र की ढलती शाम में
उनकी साहित्य-सेवा के लिए।
मिलीं बहुत-बहुत चिट्ठियाँ
आए बहुत-बहुत फोन
मिले बहुत-बहुत लोग
बधाई देते हुए।
जो अपने थे,
हितैषी थे, हितचिंतक थे
उन्होंने जाहिर की खुशी यह कह कर
‘चलो, देर आयद, दुरस्त आयद
इनकी लंबी साधना की
कद्र तो की सरकार ने…
वरना, हकदार तो थे इसके
कई बरस पहले।'
जो रहे छत्तीस का आंकड़ा
करते रहे ईर्ष्या
उन्होंने भी दी बधाई
मन ही मन भले ही वे बोले-
‘चलो, निबटा दिया सरकार ने
इस बरस एक बूढ़े को…’
बधाइयों के इस तांतों के बीच
पर कितने अकेले और चिंतामग्न रह वे
बत्तीस को छूती
अविवाहित जवान बेटी के विवाह को लेकर
नौकरी के लिए दर-दर भटकते
जवान बेटे के भविष्य की सोचकर
बीमार पत्नी के मंहगे इलाज और
ढहने की कगार पर खड़े
अपने छोटे से अधकच्चे मकान को लेकर।
जाने से पहले
इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएं वे
इस लखटकिया पुरस्कार से
इसी सोच में डूबे
खुद को बेहद अकेला पा रहे हैं वे
बधाइयों की भीड़ में।









18 comments:
जाने से पहले
इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएं वे
इस लखटकिया पुरस्कार से
इसी सोच में डूबे
खुद को बेहद अकेला पा रहे हैं वे
बधाइयों की भीड़ में।
एक अलग ही दृष्टिकोण।
हिन्दी के साहित्यकार की वास्तविक दशा।
जो अच्छे साहित्यकार है उनकी दशा चिंतनीय है लेकिन छद्म साहित्यिकों की तो चांदी कटती है।
Nice poem. Thanks.
Alok Kataria
सुभाष जी नें कविता के परोक्ष में हिन्दी की दुर्दशा का कारण साफ कर दिया है।
बहुत अच्छी कविता है, बधाई।
सुन्दर कविता
इसी आशय पर एक कविता मैने लिखी थी जिसकी चार लाईन
चेहरे के पीछे कितने चेहरे हैं
जरा पलट कर गौर से देखों
मुस्कानों की इस भीड में तुमको
दर्द सजीले मिल जायेंगे
बहुत सुन्दर कविता है, बधाई।
कृषि प्रधान निज देश में, बढ़ता भ्रष्ठाचार।
यदि चाहो कल्याण अब, हो आचार विचार।।
सच बयान किया है भाई सुभाष नीरव जी ने अपनी कविता में। कविता की अंतर्वस्तु मन को आलोड़ती है।
सृजन एक तपस्या है और जहां तक सृजन आर्थिक होने से बचा रहे वहाँ तक अच्छा है .. आर्थिक होते ही उस के मायने बदल जाते हैं .. आत्मा खो जाती है | पर प्रश्न ये है कि जितना उपयोगी साहित्यकार , साहित्य को समझता है , समाज के लिए , समाज उसे उतना महत्व देता है या नहीं | हिंदी साहित्य के प्रति कम होता रुझान और सर्जक की कठिन होती तपस्या देखें कहाँ ले कर जाती है |
बहरहाल मुद्दा उठाती हुई कविता के लिए बधाई |:-)
EK VICHARNIY KAVITA
SUBHASH JEE KO BADHAAEE
सच्च बोलती, सोचने पर मजबूर, विचारों को उत्तेजित करती कविता--
बधाई!
भाई सुभाष,
एक ईमानदार और छल-छद्म से दूर रहने वाले साहित्यकार की पीड़ा को कितनी सहजता से तुमने स्पर्श किया है. सोचने के लिए विवश करती कविता -- यदि कहूं कि एक मारक कविता.
बधाई,
चन्देल
सुभाष जी ने
बडी सहजता से
सच लिख दिया है
- लावण्या
सुभाष जी,
कड़वी सच्चाई से रूह-ब-रूह कराती कविता अपने अंत में मन छू जाती है।
बधाई।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
कैसी विडंबना है ये कि हकदार को उसका हक नहीं मिलता और जो अयोग्य हैँ उन्हीं का हर तरफ बोलबाला है
सच्चाई को दर्शाती एक बढिया रचना
सत्यता का बयान करती हुई सुंदर रचना है
गंभीर बात,सही तरीका..पर पता नहीं कुछ कमि सी लगी प्रस्तुतिकरण में..शायद और मारक बनाया जा सकता था!
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