........प्रात: 6.00 बजे से:- सुरेश शर्मा की कूची से [कार्टून] - 15.......अपरान्ह 1.00 बजे से:- सप्ताह का कार्टून - अभिषेक तिवारी......

शुक्रवार, ३ जुलाई २००९

बधाइयों की भीड़ में [कविता] - सुभाष नीरव



रचनाकार परिचय:-

सुभाष नीरव का जन्म 27-12-1953 को मुरादनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। मेरठ विश्वविद्यालय से स्नातक तथा भारत सरकार के पोत परिवहन मंत्रालय में अनुभाग अधिकारी(प्रशासन) के तौर पर कार्यरत सुभाष नीरव की कई कृतियाँ यथा ‘यत्कचित’, ‘रोशनी की लकीर’ (कविता संग्रह); ‘दैत्य तथा अन्य कहानियाँ’, ‘औरत होने का गुनाह’, ‘आखिरी पड़ाव का दु:ख’(कहानी-संग्रह); ‘कथाबिंदु’(लघुकथा-संग्रह), ‘मेहनत की रोटी’(बाल कहानी-संग्रह) आदि प्रकाशित हैं। लगभग 12 पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद भी वे कर चुके हैं और अनियतकालीन पत्रिका ‘प्रयास’ और मासिक ‘मचान’ का सम्पादन भी कर रहे हैं।
हिन्दी में लघुकथा लेखन के साथ-साथ पंजाबी-हिन्दी लघुकथाओं के श्रेष्ठ अनुवाद के लिए उन्हें ‘माता शरबती देवी स्मृति पुरस्कार, 1992’ तथा "मंच पुरस्कार, 2000" से सम्मानित किया गया जा चुका है।

"साहित्य सृजन" तथा अन्य कई ब्लाग्स के माध्यम से अंतर्जाल पर भी वे सक्रिय हैं।

‘जब न मिलने के आसार बहुत हों,
जो मिल जाए, वही अच्छा है’
एक अरसे के बाद
सुनने को मिलीं ये पंक्तियाँ
उनके मुख से
जब मिला उन्हें लखटकिया पुरस्कार
उम्र की ढलती शाम में
उनकी साहित्य-सेवा के लिए।

मिलीं बहुत-बहुत चिट्ठियाँ
आए बहुत-बहुत फोन
मिले बहुत-बहुत लोग
बधाई देते हुए।

जो अपने थे,
हितैषी थे, हितचिंतक थे
उन्होंने जाहिर की खुशी यह कह कर
‘चलो, देर आयद, दुरस्त आयद
इनकी लंबी साधना की
कद्र तो की सरकार ने…
वरना, हकदार तो थे इसके
कई बरस पहले।'

जो रहे छत्तीस का आंकड़ा
करते रहे ईर्ष्या
उन्होंने भी दी बधाई
मन ही मन भले ही वे बोले-
‘चलो, निबटा दिया सरकार ने
इस बरस एक बूढ़े को…’

बधाइयों के इस तांतों के बीच
पर कितने अकेले और चिंतामग्न रह वे
बत्तीस को छूती
अविवाहित जवान बेटी के विवाह को लेकर
नौकरी के लिए दर-दर भटकते
जवान बेटे के भविष्य की सोचकर
बीमार पत्नी के मंहगे इलाज और
ढहने की कगार पर खड़े
अपने छोटे से अधकच्चे मकान को लेकर।

जाने से पहले
इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएं वे
इस लखटकिया पुरस्कार से
इसी सोच में डूबे
खुद को बेहद अकेला पा रहे हैं वे
बधाइयों की भीड़ में।

18 comments:

दृष्टिकोण ३ जुलाई २००९ ७:४६ AM  

जाने से पहले
इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएं वे
इस लखटकिया पुरस्कार से
इसी सोच में डूबे
खुद को बेहद अकेला पा रहे हैं वे
बधाइयों की भीड़ में।

एक अलग ही दृष्टिकोण।

सुषमा गर्ग ३ जुलाई २००९ ८:०२ AM  

हिन्दी के साहित्यकार की वास्तविक दशा।

nitesh ३ जुलाई २००९ ८:१८ AM  

जो अच्छे साहित्यकार है उनकी दशा चिंतनीय है लेकिन छद्म साहित्यिकों की तो चांदी कटती है।

बेनामी ३ जुलाई २००९ ८:२२ AM  

Nice poem. Thanks.

Alok Kataria

अनन्या ३ जुलाई २००९ ९:४४ AM  

सुभाष जी नें कविता के परोक्ष में हिन्दी की दुर्दशा का कारण साफ कर दिया है।

अभिषेक सागर ३ जुलाई २००९ १०:०४ AM  

बहुत अच्छी कविता है, बधाई।

मोहिन्दर कुमार ३ जुलाई २००९ १०:०९ AM  

सुन्दर कविता
इसी आशय पर एक कविता मैने लिखी थी जिसकी चार लाईन

चेहरे के पीछे कितने चेहरे हैं
जरा पलट कर गौर से देखों
मुस्कानों की इस भीड में तुमको
दर्द सजीले मिल जायेंगे

Ambarish Srivastava ३ जुलाई २००९ १०:२८ AM  

बहुत सुन्दर कविता है, बधाई।

कृषि प्रधान निज देश में, बढ़ता भ्रष्ठाचार।
यदि चाहो कल्याण अब, हो आचार विचार।।

सुशील कुमार ३ जुलाई २००९ १:१० PM  

सच बयान किया है भाई सुभाष नीरव जी ने अपनी कविता में। कविता की अंतर्वस्तु मन को आलोड़ती है।

दिव्यांशु शर्मा ३ जुलाई २००९ १:४२ PM  

सृजन एक तपस्या है और जहां तक सृजन आर्थिक होने से बचा रहे वहाँ तक अच्छा है .. आर्थिक होते ही उस के मायने बदल जाते हैं .. आत्मा खो जाती है | पर प्रश्न ये है कि जितना उपयोगी साहित्यकार , साहित्य को समझता है , समाज के लिए , समाज उसे उतना महत्व देता है या नहीं | हिंदी साहित्य के प्रति कम होता रुझान और सर्जक की कठिन होती तपस्या देखें कहाँ ले कर जाती है |
बहरहाल मुद्दा उठाती हुई कविता के लिए बधाई |:-)

PRAN SHARMA ३ जुलाई २००९ ३:२७ PM  

EK VICHARNIY KAVITA
SUBHASH JEE KO BADHAAEE

Dr. Sudha Om Dhingra ३ जुलाई २००९ ६:३५ PM  

सच्च बोलती, सोचने पर मजबूर, विचारों को उत्तेजित करती कविता--
बधाई!

रूपसिंह चन्देल ३ जुलाई २००९ ८:३५ PM  

भाई सुभाष,

एक ईमानदार और छल-छद्म से दूर रहने वाले साहित्यकार की पीड़ा को कितनी सहजता से तुमने स्पर्श किया है. सोचने के लिए विवश करती कविता -- यदि कहूं कि एक मारक कविता.

बधाई,

चन्देल

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ३ जुलाई २००९ १०:५६ PM  

सुभाष जी ने
बडी सहजता से
सच लिख दिया है
- लावण्या

मुकेश कुमार तिवारी ४ जुलाई २००९ १२:४५ AM  

सुभाष जी,

कड़वी सच्चाई से रूह-ब-रूह कराती कविता अपने अंत में मन छू जाती है।

बधाई।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

राजीव तनेजा ४ जुलाई २००९ ८:०३ PM  

कैसी विडंबना है ये कि हकदार को उसका हक नहीं मिलता और जो अयोग्य हैँ उन्हीं का हर तरफ बोलबाला है

सच्चाई को दर्शाती एक बढिया रचना

अर्चना तिवारी ४ जुलाई २००९ १०:२३ PM  

सत्यता का बयान करती हुई सुंदर रचना है

विपुल ५ जुलाई २००९ ६:०२ AM  

गंभीर बात,सही तरीका..पर पता नहीं कुछ कमि सी लगी प्रस्तुतिकरण में..शायद और मारक बनाया जा सकता था!

जनवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': समासोक्ति -काव्य का रचना शास्त्र: ४४,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

जनवरी -2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP