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रविवार, १० मई २००९

माँ ! तुम याद बहुत आती हो.....[कविता] - सुधा ओम ढींगरा

मेरा बच्चा,
जब हँसता,
रोता,
अठखेलियाँ करता है,
ऐसा लगता है
मानों लौट आया हो
बचपन मेरा.
बच्चे को देख
जब ख़ुश होती हूँ तो
महसूस होता है
तुम मुझ में खड़ी--
मुझी को निहारती हो.....
माँ! तुम याद बहुत आती हो.......


<span title=साहित्य शिल्पी" width="100" align="left" border="0">रचनाकार परिचय:-

पंजाब के जालंधर शहर में जन्मी डा. सुधा धीगरा हिन्दी और पंजाबी की सम्मानित लेखिका हैं। इनकी कई रचनाये जैसे- मेरा दावा है (काव्य संग्रह-अमेरिका के कवियों का संपादन ), तलाश पहचान की (काव्यसंग्रह) ,परिक्रमा (पंजाबी से अनुवादित हिन्दी उपन्यास), वसूली (कथा- संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), सफर यादों का (काव्य संग्रह हिन्दी एवं पंजाबी), माँ ने कहा था (काव्य सी.डी). पैरां दे पड़ाह (पंजाबी में काव्यसंग्रह), संदली बूआ (पंजाबी में संस्मरण) आदि प्रकाशित हैं।

अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये कार्यरत डा. सुधा को अनेक सम्मान प्राप्त हुये हैं जिनमें अक्षरम प्रवासी मीडिया सम्मान (२००६), सर्वोतम कवयित्री (२००६) आदि हैं। वे अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति (अमेरिका) द्वारा हिन्दी के प्रचार -प्रसार एवं सामाजिक कार्यों के लिए भी कई बार सम्मानित की गई हैं।

पता है माँ,
बच्चे को जब दुलारती हूँ,
प्यार करती हूँ,
सोए को जगाती हूँ,
रूठे को मनाती हूँ,
वही बातें मुहँ से निकलती हैं
जो तुम
मुझे कहा करती थी--
मेरे होंठों से लोरी भी तुम्हीं सुनाती हो....
माँ ! तुम याद बहुत आती हो.....

सुना तुमने,
मैं वैसे ही गुस्सा हुई
बच्चे पर,
जैसे तुम मुझ पर होती थी,
आवाज़ भी वही
और अंदाज़ भी वही.
कुदरत की कैसी यह लीला है?
माँ बनने के बाद,
माँ की महिमा
और भी बढ़ जाती है--
पल- पल इसका आभास कराती हो.....
माँ! तुम याद बहुत आती हो......

हर माँ,
हर लड़की में बसती है,
माँ बनने के बाद वह उभरती है.
नया कुछ नहीं
किस्सा सब पुराना है
सदियों से चला आ रहा फसाना है--
इस बात को ढंग से समझाती हो......
माँ! तुम याद बहुत आती हो......

क्षण -क्षण,
बच्चे में ख़ुद को
ख़ुद में तुम को पाती हूँ,
जिंदगी का अर्थ,
अर्थ से विस्तार,
विस्तार से अनन्त का
सुख पाती हूँ--
मेरे अन्तस में दर्प के फूल खिलाती हो...
माँ! तुम याद बहुत आती हो......

27 टिप्पणियाँ:

अविनाश वाचस्पति May 10, 2009 7:35 AM  

मां की महिमा अपरंपार
कितना दिए जाओ विस्‍तार

फिर भी मन नहीं भरता है
बचपन तुझमें सबका अठखेलियां करता है

राजीव तनेजा May 10, 2009 7:51 AM  

माँ के व्यक्तित्व को बहुत ही अच्छे ढंग से उकेरती कविता पसन्द आई...


मदर्स डॆ के अवसर पर इतनी बढिया रचना प्रस्तुत करने के लिए सुधा जी के साथ-साथ साहित्य शिल्पी को भी बधाई

अनन्या May 10, 2009 8:08 AM  

क्षण -क्षण,
बच्चे में ख़ुद को
ख़ुद में तुम को पाती हूँ,
जिंदगी का अर्थ,
अर्थ से विस्तार,
विस्तार से अनन्त का
सुख पाती हूँ--
मेरे अन्तस में दर्प के फूल खिलाती हो...
माँ! तुम याद बहुत आती हो......

हर दिन ही मदर्स डे है।

शोभा May 10, 2009 10:09 AM  

माँ का वर्णन करने में शब्द कम पड़ जाते हैं। इस गीत में मन के भावों को सुन्दर अभिव्यक्ति दी गई है।

सुभाष नीरव May 10, 2009 10:11 AM  

जी हाँ, माँएँ होती ही ऐसी हैं, वे बहुत याद आया करती हैं। जीवन के हर रणक्षेत्र में माँ हमारे साथ ही खड़ी होती है ! माँ जैसा दुनिया में कोई नहीं होता, ममता की मूरत माँ पर कितना भी लिखें, सागर में बूँद बराबर होगा।

बेनामी May 10, 2009 8:56 AM  

Happy Mothers Day. Nice Poem.

Alok Kataria

Udan Tashtari May 10, 2009 9:05 AM  

मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं.

अभिषेक सागर May 10, 2009 8:54 AM  

बहुत अच्छी कविता, बधाई।

रितु रंजन May 10, 2009 8:26 AM  

मातृ दिवस पर इस रचना नें साहित्य शिल्पी का स्तर बढाया है। सुधा जी आपनें बहुत संवेदित करने वाली कविता लिखी है।

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя May 10, 2009 11:52 AM  

मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत कविता पढें और अपनी माँ के प्यार,अहसास और त्याग को जिंदा रखें
कविता पढने नीचे क्लीक करें
सताता है,रुलाता है,हाँथ उठाता है पर वो मुझे माँ कहता है

रूपसिंह चन्देल May 10, 2009 11:40 AM  

’मां ! तुम बहुत याद आती हो....’ सुधा जी की इस कविता ने मुझमें एक हलचल पैदा कर दी और मैं मां की यादों में डूब गया. मेरी शैतानी पर मां किस प्रकार छड़ी लेकर मुझे दौड़ाती थीं और मैं हंसता हुआ घर के आंगन मे बिछी चारपाई के चारों ओर चक्कर काटता रहता था और मेरे पीछे मां भी दौड़ती रहती थी और अंत में थककर बैठ जाती थीं. मैं खिलखिलाता फिर बाहर भाग जाया करता था.

सुधा जी , इतनी अच्छी कविता के लिए आपको ढेरों बधाई.

और ’मदर्स डे’ पर इसे प्रस्तुत करने के लिए राजीव जी आपको धन्यवाद.

चन्देल

"अर्श" May 10, 2009 10:17 AM  

maa ke gungaan me jitna likhaa jaye kam hai ... bahot hi sadhi hui shabd me kahaa hai aapne achhe bhav ke saath


arsh

निधि अग्रवाल May 10, 2009 10:43 AM  

माँ बनने के बाद,
माँ की महिमा
और भी बढ़ जाती है--
पल- पल इसका आभास कराती हो.....

छू गयी आपकी कविता।

राजकुमार ग्वालानी May 10, 2009 1:10 PM  

मां तूने दिया हमको जन्म
तेरा हम पर अहसान है
आज तेरे ही करम से
हमारा दुनिया में नाम है
हर बेटा तुझे आज
करता सलाम है

Shefali Pande May 10, 2009 1:16 PM  

बिलकुल सच ...जब औरत माँ बनती है तभी अपनी माँ को महसूस कर पाती है ....दिल को छूती रचना ....

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` May 10, 2009 9:29 PM  

माँ बनने के बाद,
माँ की महिमा
और भी बढ़ जाती है--
सुधा जी,
आपकी माँ जी को याद कर
लिखी ये बिरदावली सी कविता
बहुत पसँद आयी -
स स्नेह, सादर,
- लावण्या

मोहन वशिष्‍ठ May 10, 2009 9:14 PM  

बहुत ही बेहतरीन कविता लिखी है आपने

PRAN SHARMA May 10, 2009 5:45 PM  

SUDHA JEE ,AAPNE "MAA,TUM YAAD
BAHUT AATEE HO"KAVITA MEIN JAN-
JAN KEE VAANEE KO MUKHRIT KIYA HAI.
PANJABEE MEIN KAHTE HAIN---"MAAVAN
THANDIYAN CHHAAVAAN" .AAPNE IS UKTI
KO BADEE SAADGEE AUR SUNDARTAA SE
CHARITARTH KIYAA HAI.MAA KEE
MAHAANTAA KE AAGE TO DEVTA BHEE
NATMASTAK HAIN.UMDAA KAVITA KE LIYE
AAPKO DHERON BADHAAEEYAN.

दृष्टिकोण May 11, 2009 7:52 AM  

सुधा जी बहुत अच्छी कविता। शुभकामनायें।

रचना सागर May 11, 2009 8:01 AM  

क्षण -क्षण,
बच्चे में ख़ुद को
ख़ुद में तुम को पाती हूँ,
जिंदगी का अर्थ,
अर्थ से विस्तार,
विस्तार से अनन्त का
सुख पाती हूँ--
मेरे अन्तस में दर्प के फूल खिलाती हो...
माँ! तुम याद बहुत आती हो......

बेहद अच्छी कविता।

अविनाश वाचस्पति May 11, 2009 11:29 AM  

निधि अग्रवाल जी
आपकी रचना निधि में
रचनायें नहीं हैं जी
आपका ई मेल पता भी नहीं है
कमेंट बाक्‍स भी नहीं है

मोहिन्दर कुमार May 11, 2009 11:44 AM  

बचपन में एक गीत सुना था...

मां ही गंगा, मां ही जमुना, मां ही तीर्थधाम
मां का सर पर हाथ जो होवे क्या ईश्वर का काम

सचमुच मां का स्थान सब से ऊपर है.. इस भावभिनी रचना को पढवाने के लिये सुधा जी का आभार

दिगम्बर नासवा May 11, 2009 2:25 PM  

क्षण -क्षण,
बच्चे में ख़ुद को
ख़ुद में तुम को पाती हूँ,
जिंदगी का अर्थ,
अर्थ से विस्तार,
विस्तार से अनन्त का
सुख पाती हूँ--

बहूत ही गहरी............माँ को जैसे जीलिया
जितना पढो उतना ही दिल में गहरी उतरती है

अवनीश एस तिवारी May 11, 2009 1:38 PM  

बहुत ही भावपूर्ण, सुन्दर रचना है |

अवनीश तिवारी

rachana May 11, 2009 8:01 PM  

sudha ji
kitni bariki se aap ne hum sabhi ki baat kah di .bahut khoob dil ko chune wali kavita
saader
rachana

Vijay Kumar Sappatti May 13, 2009 2:29 PM  

sudha ji ,

aapki rachna ko padhkar main apne bachpan me pahunch gaya ..

itni acchi kavita ke liye badhai sweekar karen...

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

AlbelaKhatri.com July 24, 2009 1:28 AM  

khoob
bahut khoob
bahut bahut khoob

gazab ki kavita

maaki kavita

maa jaisee kavita

_____________BADHAI !

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': अलंकार दृष्टान्त को जानें, लें आनंद -काव्य का रचना शास्त्र: ३९,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

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