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शनिवार, १ अगस्त २००९

मीना कुमारी: अभिनेत्री और शायरा [आलेख] - अभिषेक सागर

ट्रेजडी क्वीन के खिताब से नवाज़ी गई मशहूर अदाकारा महजबीं बानो उर्फ मीना कुमारी का जन्म प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो) और मास्टर अली बक्श के एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में 1 अगस्त 1932 को बम्बई में हुआ था। मीना कुमारी के पिता एक पारसी थियेटर मे हारमोनियम बजाने का काम किया करते थे, जबकि माँ डांसर थी। माँ की बीमारी और पिता की बेकारी ने महजबीं को बचपन में ही स्कूल छोड़ बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्मों में काम करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने 1939 में प्रकाश पिक्चर्स की “लेदर फेस” में बेबी मीना के नाम से पहली बार काम किया। मात्र ८ साल की उम्र में यह फिल्मों में आ गई। पहले यह गाने गाया करती थीं। कई गजल और गीत उन्होंने अपनी दर्द भरी आवाज़ में गाए हैं। उपनाम नाज़ से वह लिखा भी करती थी। कुछ कहानियाँ भी लिखी थी इन्होने। मीना कुमारी की किस्मत का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की क्लासिक फिल्म 1953 में आई बैजू बावरा (जिसके लिए इन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला) से चमका। 1952 में मीना कुमारी ने फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही के साथ शादी कर ली। 1953 तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : “दायरा”, “दो बीघा ज़मीन” और “परिणीता” शामिल थीं।

रचनाकार परिचय:-

अभिषेक सागर का जन्म 26.11.1978 को हुआ। अपनी साहित्यिक अभिरुचि तथा अध्ययन शील प्रवृत्ति के कारन आप लेखन से जुडे।

आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।
“परिणीता” से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। इसमें उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूकि इस फिल्म में भारतीय नारियों की आम जिदगी की तकलीफ़ों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। लेकिन इसी फिल्म की वजह से उनकी छवि सिर्फ़ दुखांत भूमिकाएँ करने वाले की होकर रह गयी। काम के प्रति समर्पित मीना कुमारी अपने काम में कमाल अमरोही की बेवजह दखल को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और वर्ष 1964 के बाद वे दोनों अलग-अलग रहने लगे और उन्होंने अपने आप को शराब के नशे में डूबो लिया। कमाल अमरोही से अलग होने के बाद भी कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ की शूटिंग जारी रखी। वर्ष 1972 में जब ‘पाकीजा’ प्रदर्शित हुई तो फिल्म में मीना कुमारी के अभिनय को देख दर्शक मुग्ध हो गए पर फिल्म के निर्माण के दौरान उनकी तबीयत काफी खराब रहने लगी थी। “ठाड़े रहियो” और “चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था” गीतों के फिल्मांकन के दौरान मीना कुमारी कई बार नाचते-नाचते बेदम हो कर गिर पड़ती थी। यह फिल्म आज भी मीना कुमारी के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती है। वर्ष 1962 मीना कुमारी के सिने करियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1954 में भी फिल्म ‘परिणीता’ के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद लगभग 8 वर्षों तक इंतजार के बाद वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए उन्हें ‘फिल्मफेयर’ मिला। इसके बाद वर्ष 1965 में फिल्म ‘काजल’ के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के ‘फिल्मफेयर’ पुरस्कार से सम्मानित की गईं।

मीना कुमारी अपने आधा दर्जन नामों से जानी जाती थी- महजबीं आरा (माता-पिता), चीनी (परिवार वालो ने- क्योंकि इनकी आखें छोटी थी), बेबी मीना (बतौर बाल-कलाकार), मीना कुमारी (होमी वाडिया की फिल्म “बच्चों का खेल” में बेबी मीना ने पहली बार हीरोइन का रोल किया। वे इस फिल्म में मीना कुमारी बन गई और फिर इसी नाम से आखिरी फिल्म “गोमती के किनारे” तक लगातार काम करती रहीं।), नाज़ (शायरी के लिए उपनाम) और मंजू (कमाल अमरोही द्वारा दिया गया नाम)।

मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है। वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं, उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी। अपने जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया, उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो। गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. ये तो शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी उन्हें। तभी तो कहा उन्होंने -
कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको
मीनाकुमारी की ज़िंदगी अपने पति के शोषण से प्रताड़ित रही है। मीना कुमारी अपनी जिंदगी का फैसला खुद नहीं कर सकी। वह अपने परिवार के लिए आमदनी का एक साधन बनकर रह गई। वह दूसरों की उँगलियों के इशारे पर अंत तक नाचती रही। वह ज्यादतियाँ बर्दाश्त करती रही परंतु उनका सामना करने की अपने में ताकत नहीं सँजो सकी।

मीना कुमारी ने अपने हक की लडाई को शराब की प्यालियों में पी जाना बेहतर समझा बजाय सिर उठाने के। अंदर की चोटों से तिलमिला कर उन्होंने अपनी तन्हाइयों में शायरी का दामन थाम कर खुद को बचाये रखा। उसकी शायरी में ग़म है, आग नहीं, बगावत नहीं। वे कहतीं थीं, “आपको अपने बाजुओं की ताकत पर नाज़ है तो हमें अपनी सहनशक्ति और रूहानी ताकत पर।“

अंदर के अँधेरों की छटपटाहट से बेबस होकर वह शराब की प्यालियों में अपने को डुबोती गईं और जब कभी तन्हा दर्द पिघल उठा, तब उससे शायरी फूट पडी। मीना आमदनी का जरिया बनकर भी दिल की, मुहब्बत की, आशिकी की और ईमान की बेशुमार ताकत थीं। वह अपने से जिंदा रहने के लिए नहीं, मरने के लिए लडी थीं। उस मरने के लिए जिसके आगे मौत अपने को यतीम महसूस करती है।

और जाते जाते सचमुच सारे जहाँ को तन्हां कर गयीं। जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं। दर्द चुनती रहीं, संजोती रहीं और कहती रहीं -
टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाहा दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सादा-सी जो बात मिली
एक बार गुलज़ार साहब ने उन पर एक नज़्म लिखी थी :
शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर
अपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी
पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी। कहने लगी -"जानते हो न, वे तागे क्या हैं? उन्हें प्यार कहते हैं। मुझे तो प्यार से प्यार है। प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है। इतना प्यार कोई अपने तन से लिपटा कर मर सके तो और क्या चाहिए?" महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा। "बैजू बावरा","परिणीता", "एक ही रास्ता", 'शारदा". "मिस मेरी", "चार दिल चार राहें", "दिल अपना और प्रीत पराई", "आरती", "भाभी की चूडियाँ", "मैं चुप रहूंगी", "साहब बीबी और गुलाम", "दिल एक मंदिर", "चित्रलेखा", "काजल", "फूल और पत्थर", "मँझली दीदी", 'मेरे अपने", "पाकीजा" जैसी फिल्में उनकी "लम्बी दर्द भरी कविता" सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है -
थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं....
गीतकार और शायर गुलजार से एक बार मीना कुमारी ने कहा था, “ये जो एक्टिग मैं करती हूं उसमें एक कमी है। ये फन, ये आर्ट मुझसे नही जन्मा है। ख्याल दूसरे का, किरदार किसी का और निर्देशन किसी का। मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूं। जो मैं कहना चाहती हूं, वह लिखती हूं।“
मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया, जिसे उन्होंने नाज उपनाम से छपवाया। सदा तन्हा रहने वाली मीना कुमारी ने अपनी रचित एक गजल के जरिए अपनी जिंदगी का नजरिया पेश किया है-
चांद तन्हा है
आसमां तन्हा
दिल मिला है
कहां-कहां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएंगे
ये जहां तन्हा
लगभग तीन दशक तक अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिल पर राज करने वाली हिंदी सिने जगत की महान अभिनेत्री मीना कुमारी 31 मार्च 1972 को इस दुनिया से सदा के लिए रुखसत हो गई।

8 comments:

परमजीत बाली १ अगस्त २००९ १:२४ PM  

बढिया जानकारी पूर्ण आलेख है। आभार।

सतपाल १ अगस्त २००९ ५:१० PM  

ek bahut he sanzeeda abhinetree thee baat kartee thee to aisa lagta tha ki ghazal bol rahee ho..

बेनामी २ अगस्त २००९ ९:१७ AM  

ये तो हद हो गई भाई...अभिषेक जी, श्रद्धांजलि ही देनी थी तो अपने शब्दों में देते...पूरा का पूरा लेख ही टीप दिया....
http://podcast.hindyugm.com/2009/03/remembering-meena-kumari-on-her-death.html
पढिए और बताइए कितना पानी मिलाया है इस ओरिजिनल लेख में.....
कम से कम साभार ही लगा दते भाई...

अवनीश एस तिवारी २ अगस्त २००९ १२:२५ PM  

अच्छी जानकारी है |
मीना कुमारी वास्तव में एक कलाकार थी |

अवनीश तिवारी

KK Yadav २ अगस्त २००९ १:३२ PM  

...Meena kumari ki yad taji karne ke liye abhar !!

मोहिन्दर कुमार ३ अगस्त २००९ १२:०४ PM  

अभिषेक जी का इस सुन्दर जानकारी पूर्ण लेख के लिये आभार.

अजय कुमार ३ अगस्त २००९ ८:४५ PM  

very good.keep it on.

rc २१ अगस्त २००९ २:४२ PM  

साहित्याशिल्पी पर मीना-कुमारी जी पर आलेख बहुत अच्छा लगा | इनके बारे में मैंने टुकडों में पढ़ रखा था और इसी तरह के आलेख का इंतज़ार था |
आपकी वेबसाइट पर छपे आलेख अक्सर पढ़ती हूँ और वे बेहद अच्छे और सूचनात्मक होते हैं | एक बात यहाँ ज़रूर कहना चाहूंगी के ऐसे अच्छे दर्जे के आलेखों से वेबसाइट की गुणवत्ता भी बढती है |

ढेरो बधाइयाँ एवं शुभकामनाओं सहित
RC

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

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नाटक पर स्थायी स्तंभ:
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अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-बस्तर का इतिहास [पुस्तक-अंश-5] - शरद व कविता गौड़,
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हिन्दी साहित्य का इतिहास:- जायसी और उनका "पद्मावत" - अजय यादव,

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