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बुधवार, २६ अगस्त २००९

मुझे शिकायत है वक्त से [कविता] - बृजेश शर्मा


रचनाकार परिचय:-

बृजेश शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर फिरोजाबाद में १० नवम्बर १९८२ को हुआ। १४ साल तक का जीवन वही गुजारा और ९ वी तक की पढ़ाई भी वही हुई, फिर वे दिल्ली आ गये , और आज काल एक इंटरनेशनल बी पि ऊ में एकज्युकेटिव के पद पर हैं..।
मुझे शिकायत है वक्त से
क्योंकि, ये गुजर जाता है
नही करता इन्तेजार मेरे बढ़ने का
नही थामता हाथ साथ ले कर चलने के लिए!
नही विचारता शुभ अशुभ के बारे मैं-
नही देखता वक्त-बेवक्त!
बस चलता है निरंतर
निरंतरता- शायद यही इसकी पहचान है!
मुझे शिकायत है वक्त से
क्योंकि यह भुला देता है अतीत को
धूमिल कर देता है यादो को
और चढा देता है परत पुराने हरे जख्मो पर
जखम जो मैंने दिए थे स्वयं को
रखे थे हरे ख़ुद कुरेद कुरेद कर!
पर वक्त भरता जा रहा है इनको
मेरे ना चाहते हुए भी!
मुझे शिकायत है वक्त से!

8 comments:

अभिषेक सागर २६ अगस्त २००९ २:१४ PM  

बहुत अच्छी कविता... बधाई

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ २६ अगस्त २००९ ३:५९ PM  

Aapki shikaayat jaayaz hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

दिव्यांशु शर्मा २६ अगस्त २००९ ४:४९ PM  

वक़्त की इस जोर ज़बरदस्ती पर हमारा ध्यान वाकई कभी नहीं जाता ... वक़्त ही नहीं मिलता .. :-) ध्यान इस और खींचने का शुक्रिया भाई .. खुबसूरत कविता ...

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ २६ अगस्त २००९ ८:५१ PM  

.....
जखम जो मैंने दिए थे स्वयं को
रखे थे हरे ख़ुद कुरेद कुरेद कर!
पर वक्त भरता जा रहा है इनको
मेरे ना चाहते हुए भी!...

बहुत ही सकारात्मक भाव ..... बढ़िया रचना शुभकामना बृजेश जी

gita pandit २७ अगस्त २००९ १२:२६ AM  

वक्त सुनता कहाँ है....भाई मेरे....

अनिल कुमार २७ अगस्त २००९ ५:२५ AM  

जखम जो मैंने दिए थे स्वयं को
रखे थे हरे ख़ुद कुरेद कुरेद कर!
पर वक्त भरता जा रहा है इनको
मेरे ना चाहते हुए भी!
मुझे शिकायत है वक्त से!

अच्छी रचना।

सुषमा गर्ग २७ अगस्त २००९ ७:४४ AM  

अच्छी प्रस्तुति

SHASHANK १६ सितम्बर २००९ ११:१६ AM  

bahut acchi kavita hai.dil ko choo gayi

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