उत्प्रेक्षा है कल्पना [काव्य का रचना शास्त्र: 14] - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

इसमें उसकी कल्पना, उत्प्रेक्षा का मूल.
जनु मनु बहुधा जानिए, है पहचान, न भूल..
जो है उसमें- जो नहीं, वह संभावित देख.
जानो-मानो से करे, उत्प्रेक्षा उल्लेख..
रूपक के पञ्च प्रकारों की चर्चा बाद में करेंगे. अभी उत्प्रेक्षा अलंकार से साक्षात् करें.
रचनाकार परिचय:-उत्प्रेक्षा का अर्थ कल्पना या सम्भावना है. जब दो वस्तुओं में भिन्नता रहते हुए भी उपमेय में उपमान की कल्पना की जाये या उपमेय के उपमान के सदृश्य होने की सम्भावना व्यक्त की जाये तो उत्प्रेक्षा अलंकार होता है. कल्पना या सम्भावना की अभिव्यक्ति हेतु जनु, जानो, मनु, मनहु, मानहु, मानो, जिमी, जैसे, इव, आदि कल्पनासूचक शब्दों का प्रयोग होता है..
उदाहरण:
१. चारू कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिए.
लट लटकनि मनु मत्त मधुप-गन मादक मधुहिं पिए..
यहाँ श्रीकृष्ण के मुख पर झूलती हुई लटों (प्रस्तुत)में मत्त मधुप (अप्रस्तुत) की कल्पना (संभावना) किये जाने के कारन उत्प्रेक्षा अलंकार है.
२. फूले कांस सकल महि छाई.
जनु वर्षा कृत प्रकट बुढाई..
यहाँ फूले हुए कांस (उपमेय) में वर्षा के श्वेत्केश (उपमान) की सम्भावना की गयी है.
३. फूले हैं कुमुद, फूली मालती सघन वन.
फूली रहे तारे मानो मोती अनगन हैं..
४. मानहु जगत क्षीर-सागर मगन है..
५. झुके कूल सों जल परसन हित मनहूँ सुहाए.
६. मनु आतप बारन तीर कों, सिमिटि सबै छाये रहत.
७. मनु दृग धारि अनेक जमुन निरखत ब्रज शोभा.
८. तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप, उठे न चलहिं लजाइ.
मनहुँ पाइ भट बाहुबल, अधिक-अधिक गुरुवाइ..
९. लखियत राधा बदन मनु विमल सरद राकेस.
१०. कहती हुए उत्तरा के नेत्र जल से भर गए.
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए..
११. उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने लगा.
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा..
१२. तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाये.
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुं सुहाए..
१३. नित्य नहाता है चन्द्र क्षीर-सागर में.
सुन्दरि! मानो तुम्हारे मुख की समता के लिए.
१४. भूमि जीव संकुल रहे, गए सरद ऋतु पाइ.
सद्गुरु मिले जाहि जिमि, संसय-भ्रम समुदाइ..
१५. रिश्ता दुनियाँ में जैसे व्यापार हो गया।
बीते कल का ये मानो अखबार हो गया।।
-श्यामल सुमन
गृह कार्य:
रूपक और उत्प्रेक्षा में अंतर को पहचान कर उपमा, रूपक तथा उत्प्रेक्षा का समावेश करती हुई काव्य पंक्तियाँ स्वयं रचिए.




10 comments:
Salil ji ka prayas sarahniye hai aur sahaj bhi. Is prakar ki samagri prakashit karate rahein. Kripya kar ke Salil ji jaise jaankaron aur sahitya seviyoun ka e-mail id bhi prakashit karein jisse unke gyan ka ansh jigyaso pathakon ko prapt ho sake aur vey vyaktigat samasyaon ka samadhaan aise jaankaron se seedhe bhi pa sakein.
Sadhuhvaad!
Neelesh K. Jain
Mumbai
[email protected]
संजीव सलिल जी आपके हर आलेख को संग्रह करने योग्य कहूंगा। आलेख का धन्यवाद।
आचार्य जी, क्या "मानो" ही उत्प्रेक्षा का मूल है? सीधे तुलना न कर मानने की वृत्ति काव्य में उत्प्रेक्षा लाती है?
हमेशा की तरह अच्छा आलेख है। यह श्रंखला स्तुत्य है।
सुन्दर प्रस्तुति | आचार्यजी का पुन: धन्यवाद |
मैंने उपमा और रूपक के लिये पंक्तियाँ रच कर भेजी थी , पिछली कक्षा में |
इसलिए इस बार केवल उत्प्रेक्षा की कोशिश कर रहा हूँ -
गुजरे बरसों में जीता रहा ,
बना पशु सिर्फ अपने लिए,
देखें इस बरस क्या जीता हूँ ,
बन मानव सबके लिए ?
अपनी ( मनुष्य ) की तुलना पशु से की है |
क्या सही है ?
अवनीश तिवारी
सुन्दर प्रस्तुति | आचार्यजी का पुन: धन्यवाद |
मैंने उपमा और रूपक के लिये पंक्तियाँ रच कर भेजी थी , पिछली कक्षा में |
इसलिए इस बार केवल उत्प्रेक्षा की कोशिश कर रहा हूँ -
गुजरे बरसों में जीता रहा ,
बन पशु सिर्फ अपने लिए,
देखें इस बरस क्या जीता हूँ ,
बन मानव सबके लिए ?
अपनी ( मनुष्य ) की तुलना पशु से की है |
क्या सही है ?
अवनीश तिवारी
निधि जी !
आप सही हैं. जब तुलना न कर एक में दूसरे की उपस्थति की कल्पना किसी आधार पर की जाये,
जब किसी वस्तु में किसी अन्य भिन्न वस्तु की उपस्थिति की कल्पना की जाये या किसी वस्तु में किसी दूसरी वस्तु के होने की कल्पना की जाये या एक वस्तु में सादृश्य के आधार पर दूसरी वस्तु होने की सम्भावना व्यक्त की जाये तो उत्प्रेक्षा अलंकार होता है.
खट्टे आम को कहें आम नहीं मानो इमली है, इमली जैसा आम, जनु, जानो, मनु, मनहु, मानहु, मानो, जिमी, जैसे, इव, आदि कल्पना सूचक शब्द ही उत्प्रेक्षा की पहचान हैं
अवनीश जी!
उक्त को देखें.
गुजरे बरसों में जीता रहा ,
सिर्फ अपने लिये मानो पशु हूँ.,
इस बरस जीता हूँ सबके लिए ,
ज्यों मानव हूँ.
नितेश जी!
सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
संजीव सलिल जी, विलंब से उपस्थ्ति के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ। राजीव जी आपसे भी क्षमा। राजीव जी का मेल मिला जिसमें इस अंक पर मेरी अनुपस्थ्ति से नाराजगी थी। नेट की अनीयमितता से यह हुआ।
आचार्य जी का आलेख मुझसे या मेरे संकलन से छूटना संभव भी नहीं था।
sarahana hetu sabhee ko dhanyavad.
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