आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकीनन्दन खत्री का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। अंग्रेजी शासन में जिस समय हिन्दी बनाम उर्दू की बहस शुरू हुई, उस समय हिन्दी के पक्ष को सशक्त करने वालों में राजा शिवप्रसाद, लक्ष्मण सिंह, भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र के साथ-साथ बाबू देवकीनन्दन खत्री का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। यद्यपि खत्री जी ने तो राजा शिवप्रसादसितारेहिन्दकी तरह शासन-तंत्र में हिन्दी को प्रवेश दिलाने में कोई प्रत्यक्ष योगदान दिया और ही राजा लक्ष्मण सिंह और भारतेन्दु मंडल के रचनाकारों की तरह हिन्दी का महिमामंडन और उर्दू का विरोध किया। परंतु उन्होंने अपनी रचनाओं (विशेषकरचन्द्रकान्ताऔरचन्द्रकान्ता-संतति”) द्वारा जितने पाठकों को हिन्दी भाषा और उसकी लिपिदेवनागरीसे जोड़ा, उसकी संख्या शायद अब तक के किसी भी साहित्यकार से अधिक है। उस दौर में जब नौकरियों आदि के लिये देश में फ़ारसी का ज्ञान आवश्यक था जिसके चलते अधिकांश युवा इसी की शिक्षा प्राप्त करने पर जोर दे रहे थे, अनेक लोगों ने सिर्फचन्द्रकान्ताऔरचन्द्रकान्ता-संततिपढ़ने के लिये नागरी सीखी और एक बार इस बृहत उपन्यास के बहाने हिन्दी से जुड़ने के बाद स्थाई रूप से इसी के हो गये।

रचनाकार परिचय:-

अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा आपकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।

आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।

बाबू देवकीनन्दन खत्री के पिता लाला ईश्वरदास उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में मुलतान से आकर काशी में बस गये थे। सन १८६१ में समस्तीपुर (बिहार) में जन्मे देवकीनन्दन माँ-बाप के इकलौते पुत्र थे। बचपन का इनका अधिकांश समय अपनी ननिहाल पूसा (बिहार) में बीता। बाद में यहीं टिकारी रियासत में इन्होंने व्यापार आरंभ कर दिया। टिकारी नरेश इनके अच्छे मित्र थे। उनकी असमय मृत्यु के बाद खत्री जी ने टिकारी छोड़ दिया और काशी गये। काशी नरेश भी अपने बहनोई (टिकारी नरेश) के मित्र को बहुत मानते थे और उन्हीं के प्रभाव से खत्री जी ने चकिया-नौगढ़ के जंगलों का ठेका प्राप्त कर लिया।

ठेकेदारी के अपने काम के कारण उनका अधिकांश समय प्रकृति की गोद में बीतता था। इस दौरान ये इधर-उधर घूम कर जंगल की शोभा देखते रहते। पुराने किलों और खंडहरों में भी इनकी खासी रूचि थी। बहुभाषाविद और सुपठित युवा देवकीनन्दन ने इस समय का सदुपयोग करने के लियेचन्द्रकान्तालिखना आरंभ किया। अपनी रूचि और बचपन से ही राज-परिवारों से संपर्क के कारण आपको इनके कार्य-व्यवहारों का तो अच्छा ज्ञान था ही; अत: इन्हीं को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।चन्द्रकान्ताऔर उसके बादचन्द्रकान्ता-संततिकी लोकप्रियता ने आपको अभूतपूर्व ख्याति प्रदान की। इस बीच जंगल का ठेका किसी कारणवश इन्हें छोड़ना पड़ा और वे वापस आकर काशी के लाहौरी टोले के अपने पैतृक निवास में रहने लगे परंतु इससे इनके रचनाकर्म में कोई व्यवधान नहीं आया। अपने आखिरी समय तक भी खत्री जी लिखते रहे और अंत मेंचन्द्रकान्ता-संततिकी कड़ी में से हीभूतनाथके अतिरिक्तवीरेन्द्रवीर और एक कटोरा खूनतथागुप्त-गोदनानामक उपन्यास अधूरे छोड़ अगस्त, १९१३ को स्वर्गवासी हुये।भूतनाथके : खंड वे लिख चुके थे जिसे बाद में २१ खंडों में उनके यशस्वी पुत्र बाबू दुर्गाप्रसाद खत्री ने पूरा किया।

कुछ लोग देवकीनन्दन जी की भाषा को उसमें प्रयुक्त उर्दू शब्दों की अधिकता के कारण नागरी लिपि में लिखी उर्दू तक कह कर उनकी आलोचना करते हैं, परंतु ऐसा कहने वालों को तत्कालीन परिस्थितियों पर भी विचार कर लेना चाहिए। मुस्लिम शासन के समय से उस समय तक फ़ारसी ही कई रियासतों की राजभाषा बनी हुई थी। अंग्रेज़ों ने भी सशक्त फ़ारसीदानों के प्रभाव से अरबी अक्षरों में लिखी उर्दू को ही संपर्क भाषा के रूप में बनाये रखा था। नौकरियों आदि के लिये उर्दू और फ़ारसी के ज्ञान की अनिवार्यता के चलते देश का युवा-वर्ग हिन्दी और नागरी लिपि से कटता जा रहा था। ऐसे में अधिकांश शिक्षित लोगों के लिये भी आज की अपेक्षाकृत संस्कृतनिष्ठ मानक हिन्दी को समझना आसान नहीं था। इसी से खत्री जी ने उस भाषा का प्रयोग किया जो तत्कालीन शिक्षित वर्ग में से अधिकांश के समझ में सकती थी। इस संबंध में वे लिखते हैं, “जिस प्रकार फारसी वर्णमाला उर्दू का शरीर और अरबी फारसी के उपयुक्त शब्द उसके जीवन हैं, ठीक उसी प्रकार नागरी वर्णमाला हिन्दी का शरीर और संस्कृत के उपयुक्त शब्द उसके प्राण कहे जा सकते हैं। ... शरीर में यदि आत्मा हो तो वह बेकार है और यदि आत्मा को उपयुक्त शरीर मिल कर पशु पक्षी आदि का शरीर मिल जाय तो भी वह निष्फल ही है, इसलिये शरीर बना कर फिर उसमें आत्मदेव की स्थापना ही न्याययुक्त और लाभप्रद है।

यद्यपि स्वयं खत्री जी राजा शिवप्रसाद जी कीआमफ़हमभाषा (जो प्राय: उर्दू की ओर अधिक झुकी थी) के अनुकरण की बात मानते हैं परंतु अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि उनकी भाषा शिवप्रसादीआमफ़हमज़बान से अधिक संतुलित थी। स्वयं खत्री जी की शुरूआती और बाद की भाषा में अंतर स्पष्ट नज़र आता है जो उत्तरोत्तर उर्दू-मुक्त होती चली गई है हालाँकि वह कभी भी भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली के अन्य रचनाकारों जैसी नहीं हो पाई जिसे खत्री जी दुरूह मानते हैं, “मेरे बहुत से मित्र हिन्दुओं की अकृतज्ञता का यों वर्णन करते हैं कि उन्होंने हरिश्चंद्र जी जैसे देश-हितैषी पुरुष की उत्तम पुस्तकें नहीं खरीदीं, पर मैं कहता हूँ कि यदि बाबू हरिश्चंद्र अपनी भाषा को थोड़ा सरल करते तो हमारे भाइयों को अपने समाज पर कलंक लगाने की आवश्यकता पड़ती और स्वाभाविक शब्दों के मेल से हिन्दी की पैसिंजर भी मेल बन जाती।उपरोक्त उद्धरण स्वयं खत्री जी की बाद की भाषा का एक स्पष्ट उदाहरण है जो कहीं से भी उर्दू से बोझिल नहीं है। व्याकरण की दृष्टि से भी खत्री जी की भाषा उस दौर के अन्य सभी रचनाकारों की अपेक्षा अधिक परिपक्व है। उस दौर के अन्य रचनाकारों की तरह मनमाने शब्द और वाक्य-विन्यास खत्री जी की रचनाओं में नहीं मिलते। इन तमाम बातों की ओर ध्यान देने पर खत्री जी की भाषा कहीं से भी अनुपयुक्त प्रतीत नहीं होती।

कथानक शैली की दृष्टि से देखें तो खत्री जी ने अपनी अधिकांश रचनाओं में तिलिस्म, ऐयारी आदि का प्रयोग किया है। उनका ध्यान जितना कथाक्रम की तरफ रहा है, उतना भावचित्रण की ओर नहीं रहा। अपनी रचनायें में वे अनेक समांतर घटनाक्रमों और पात्रों को लेकर चलते हैं। प्राय: सभी घटनायें और पात्र कथाक्रम के लिहाज़ से समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। पात्रों और घटनाओं के इस गुंफित जंगल में विभिन्न पात्रों के भावों को चित्रित करने का बहुत कम अवकाश आप पाते हैं। इसी कमी के चलते प्रख्यात समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इनकी रचनाओं को विशुद्ध साहित्य की श्रेणी में स्वीकार करने से ही इंकार कर देते हैं। अपनी इस कमी के बावज़ूद, इस बात के लिये खत्री जी तारीफ़ आचार्य शुक्ल भी करते हैं कि उन्होंने जितने हिन्दी के पाठक तैयार किये, उतने किसी भी दूसरे रचनाकार ने नहीं किये। चन्द्रकान्ता और संतति के प्रभाव से इस तरह के तिलिस्मी और ऐयारी उपन्यासों की उस दौर में बाढ़ सी ही गई थी परंतु इनमें से कोई भी विशेष ख्याति प्राप्त नहीं कर पाया।

एक और बात जो खत्री जी को इस कोटि के कथानकों के अन्य रचनाकारों से अलग करती है, वो उनकी रचनाओं में तिलिस्म आदि के तमाम चमत्कारों को विज्ञान और तकनीक से जोड़ कर चलने की प्रवृति है। वर्तमान समय में भी जहाँ तमाम अवैज्ञानिक बातों से भरी हुईहैरी पौटरसरीखी रचनाएं बहुचर्चित और बहुपठित हैं, वहीं खत्री जी आज से सौ वर्ष से भी अधिक समय पहले तिलिस्मी कहानियों में तकनीकी कौशल का वर्णन करते हैं। उनकी रचनाओं में जब भी कोई पात्र किसी तिलिस्म को तोड़ता है तो उसे संचालित करने वाली मशीनों कल-पुर्जों को भी देखता है।चन्द्रकान्ता-संततिके अंत में ऐसे कई चमत्कारों के संभव हो सकने को लेकर दिये अपने वक्तव्य में वे एक ओर तोआक्साइड आफ नाइट्रोजन या लाफिंग गैसद्वारा तिलिस्म में दिखाये एक चमत्कार के संभव होने को इंगित करते हैं तो दूसरी ओर यह भी स्वीकार करते हैं कि विशुद्ध मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई इन रचनाओं में रचनाकार द्वारा वर्णित सभी चमत्कार संभव हों या भविष्य में विज्ञान और तकनीक के विकास से संभव हो जायें, यह भी आवश्यक नहीं है।

इन सभी पक्षों पर विचार करने पर बाबू देवकीनन्दन खत्री जी एक अत्यंत प्रतिभाशाली, भविष्यदर्शी और हिन्दी को समर्पित लेखक के रूप में ही सामने आते हैं। आज आपकी पुण्यतिथि के अवसर पर हर हिन्दी प्रेमी आपको नमन करता है!

7 comments:

  1. प्रशंसनीय आलेख -तिलिस्म साहित्य और ऐयारी जैसी अवधारणाओं के जनक देवकी अन्नदान खत्री के क्या कहने !
    आभार !

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  2. IMPORTANT ARTICLE. DEVKI NANDAN KHATRI'S NOVELS HARE MUCH BETTER THEN POTTER.

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  3. जानकारी पूर्ण लेख का बहुत धन्यवाद. दुर्लभ लेख है लोग बाबू देवकी नंदन खत्री को भुला चुके है

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  4. I remember my school days, when my gran pa gifted me "Devaki Nandan khatri Samagr", and my whole vacactions passed in reading that unqiue book, which you rightly termed as Harry Potter....

    Yeah, its TV presentation was really a bad one.

    Govt. should develop Chunar, Jamania circuit as a tourist circuit to make it more popular!

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  5. Khatri ji ke bare men pahli bar vistrit jankari padh raha hoon...Thanks !!

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  6. देवकीनन्दन जी के विषय में जानकर अच्छा लगा. दूरदर्शन पर चन्द्रकान्ता के कई एपीसोड देखे थे .

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