शरद सुहावन, मधु मन भावन [कविता] - लावण्या शाह
चाँद उग़ आया पूनम का !
शरद ऋतु के स्वच्छ गगन पर,
चाँद उग़ आया पूनम का !
सरस युगल सारस - सारसी का,
तैर रहा, झिलमिल जल पर !
खेत खलिहानोँ मेँ पकी फसल-
मुस्कान रँगे मुख, कृषक - वधू के
व्रत त्योहार - रास युमना तट
रुन झुन , रुन झुन, झाँझर के स्वर!
धरती डोली, हौले हौले, बहे पवन
-मुस्काता, बन, शशि, चँचल, हिरने पर !
फैलाती चाँदी सी- शरदिया चाँदनी
मँदिरोँ मेँ बज रहे - शँख ढफ
पखावज, मँजीरे धुन,कीर्तन के सँग!
आई शरद ऋतु मन भावन,
व्रत त्याहारोँ से घर आँगन पावन,
नवरात्र रास, माँ सिँहधारिणी सौम्य सुहावन!
करवा चौथ, दशहरा, आए पाप नशावन !
खनन्` - खनन्` मँजीर बज रहे
धमक -धमक रास की रार मची
-चरर्` चरर्` तैली का बैल चला
-सरर्` सरर्` चुनरी लिपटी रमणी पर -
शक्ति आह्वान करो! माँ भवानी सुमरो !
अम्बिका, वरदायिनी, कल्याणी, कालिका, पूजो!
घर - घर मेँ ज्योत, प्रखर कर लो !
शरद शारदा - वीणापाणि माँ सरस्वती भजो !
हरो तिमिर आवरण माँ, कृपा कर दो !
बिखरा दो, उज्जवल प्रकाश अवनी पर माँ !
शारदीय पूर्ण चन्द्र ज्योत्सना फैला दो माँ !
स्वागत, मँगल आगमन शरद - चँद्रिका माँ !
कृपा सिँधु, कमलिनी, सुमधुर स्मित बिखरा दो माँ !
जग तारिणी, सिँह आसनी ममता का कर, धर दो माँ !
जन - जन - के दु:ख हर, शीतल कर दो माँ!
कात्यायनी नमोस्तुते ! हे अम्बिके, दयामयी नमोस्तुते!
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मनभावन!
(उग ना कि उग़!)
Pran Sharma says
Manbhaatee kavita ke liye
Lavanya jee ko badhaaee.
शोभा says
बिखरा दो, उज्जवल प्रकाश अवनी पर माँ !
शारदीय पूर्ण चन्द्र ज्योत्सना फैला दो माँ !
स्वागत, मँगल आगमन शरद - चँद्रिका माँ !
कृपा सिँधु, कमलिनी, सुमधुर स्मित बिखरा दो माँ !
जग तारिणी, सिँह आसनी ममता का कर, धर दो माँ !
जन - जन - के दु:ख हर, शीतल कर दो माँ!
कात्यायनी नमोस्तुते ! हे अम्बिके, दयामयी नमोस्तुते
अति सुन्दर। वीर रस से परिपूर्ण कविता ।
mehek says
bahut khubsurat
योगेन्द्र मौदगिल says
वाहवा.. बहुत सुंदर कविता के लिये बधाई स्वीकारें.
नीरज गोस्वामी says
अद्भुत शब्द...लाजवाब भाव....बेमिसाल रचना...वाह. लावण्या दी आप का जवाब नहीं...
नीरज
महावीर says
काव्य-कला पक्ष और भाव पक्ष दोनों ही के स्तर इस कविता में लावण्य जी की अन्य कविताओं की भांति अपना महत्व बनाए हुए हैं। बहुत सुंदर!
राजीव तनेजा says
लावण्या जी को सुन्दर रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई
रितु रंजन says
बिखरा दो, उज्जवल प्रकाश अवनी पर माँ !
शारदीय पूर्ण चन्द्र ज्योत्सना फैला दो माँ !
स्वागत, मँगल आगमन शरद - चँद्रिका माँ !
कृपा सिँधु, कमलिनी, सुमधुर स्मित बिखरा दो माँ !
जग तारिणी, सिँह आसनी ममता का कर, धर दो माँ !
जन - जन - के दु:ख हर, शीतल कर दो माँ!
कात्यायनी नमोस्तुते ! हे अम्बिके, दयामयी नमोस्तुते!
कितना सुन्दर शब्द संयोजन, बहुत प्रभावी रचना है।
नंदन says
जब भी यह भाषा और एसी उत्कृष्ट रचना दृष्टिगोचर होती है मन कह उठता है अभी साहित्य जीवित है।
अजय यादव says
सुंदर रचना!
Vijay Kumar Sappatti says
mere paas shabd hi nahi hai ,is kavita ki taarif karne ke liye , sirf itna kahunga ki amulya. shandaar prastuti .
poore mausam , khil uthen hai , jag jaag utha hai , in fact sansaar hai hi itna khoobsurat ..
dil ko bada sakun mila .....
bahut bahut badhai lavanya ji ..
aur likhiye ..
may god bless you.
regards
vijay
रचना सागर says
बहुत अच्छी कविता, संग्रह रखने योग्य।
मोहिन्दर कुमार says
सुन्दर शब्द भावों का संगम.. कर्ण प्रिय प्रसार
अभिषेक सागर says
बहुत अच्छी कविता है, बधाई।
बेनामी says
Poem has height and depth.
Alok Kataria
पंकज सक्सेना says
भाषा और भाव की उत्कृष्टता है आपकी रचना में।
Dr. Sujit Kumar Bajpayee says
साहित्य शिल्पी एसी ही उत्कृष्ट रचनाओं के प्रकाशन के कारण चर्चा में है। लावण्या जी की रचना अनुपम है।
राजीव रंजन प्रसाद says
कविता की उत्कृष्टरा निर्विवाद है। मैं इसमें प्रयुक्त ध्वनि-स्वरों से नितांत प्रभावित हुआ। रुन झुन , रुन झुन, खनन्` - खनन्`, धमक -धमक,सरर्` सरर्`...इन शब्दों नें कविता को प्रवाह प्रदान किया है।
***राजीव रंजन प्रसाद
गीता पंडित (शमा) says
बहुत सुंदर....
लावण्य जी
बधाई स्वीकारें.
लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` says
आप सभी के स्नेह
व प्रोत्साहन से
अभिभूत हूँ
लिखती रहूँगी ..
माँ शारदा की कृपा
आप सब
पर बनी रहे
इस सद्` आशा सहित
विनीत,
- लावण्या
अल्पना वर्मा says
बिखरा दो, उज्जवल प्रकाश अवनी पर माँ !
शारदीय पूर्ण चन्द्र ज्योत्सना फैला दो माँ !
स्वागत, मँगल आगमन शरद - चँद्रिका माँ !
कृपा सिँधु, कमलिनी, सुमधुर स्मित बिखरा दो माँ !
सुंदर कविता !
बहुत-बहुत बधाई
नया समाज says
बधाई स्वीकारें.
लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` says
आप सभी का धन्यवाद !