दुआऎं [कविता] - किरण सिन्धु
रचनाकार परिचय:- किरण सिन्धु, उत्तर प्रदेश की मूल निवासी हैं। आपकी शिक्षा झारखण्ड में तथा विवाह बिहार में हुआ। वर्तमान में आप मुंबई में अवस्थित हैं। आपको परिवार और परिवेश में बचपन से ही साहित्य प्रेम का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ। श्रधेय गुरुजनों की कृपा से जो भी ज्ञानार्जन हुआ उसके सहारे अध्यापन के क्षेत्र में २५ वर्षों तक सुदृढ़ रूप से खड़ी रही। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति किशोरावस्था से ही प्रेम रहा है.दुआएँ होठों से नहीं आँखों से बोलती हैं.
कभी किसी भूखे बच्चे को,
पेट भर खाना खिला कर तो देखो,
कभी किसी बूढे - बेसहारे को,
कुछ कदम साथ चल कर,
रास्ता पार करा कर तो देखो,
कभी किसी अबला की लुटती अस्मत को,
अपनी शराफत और भरोसे की चादर,
ओढ़ा कर तो देखो.
इनकी आँखों में इक नमी सी तैर जाती है,
एक ऐसा नूर जो दिल की गहराइयों में समा कर,
अन्दर तक उजाला भर दे.
एक ऐसे रिश्ते की बुनियाद,
जो सभी रिश्तों से ऊपर है.
दुआओं से इंसान को रूहानी ताकत मिलती है,
ये वो नेमत है जो किसी बाजार में नहीं बिकती है.









8 comments:
दुआओं से इंसान को रूहानी ताकत मिलती है,
ये वो नेमत है जो किसी बाजार में नहीं बिकती है.
सही कहा किरण जी।
संवेदनाओं से भरी बहुत अच्छी रचना।
दुआओं में बहुत असर होता है, बहुत सुन्दर कविता।
एक ऐसा नूर जो दिल की गहराइयों में समा कर,
अन्दर तक उजाला भर दे.
एक ऐसे रिश्ते की बुनियाद,
जो सभी रिश्तों से ऊपर है.
दुआओं से इंसान को रूहानी ताकत मिलती है,
ये वो नेमत है जो किसी बाजार में नहीं बिकती है.
बहुत अच्छी कविता है।
बहुत अच्छी कविता, बधाई।
संवेदनशील लेखन.. सचमुच दिल से निकली दुआओं में बहुत असर होता है... जितनी बटोरी जा सकें बटोर लेनी चाहिये.
जहाँ काम न करे दवा , काम करे दुआ
फुँफा करे जब धुनाई ,छुडाये तब बुआ
बहुत अछि कविता के लिए बधाई .
निशा
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