रात बीती जा रही है [गीत (स्वर व संगीत: कुमार आदित्य विक्रम)] - महेन्द्र भटनागर

वरिष्ठ कवि श्री महेन्द्र भटनागर के गीत व कवितायें स्वर शिल्पी पर आप पहले भी सुनते रहे हैं। इसी क्रम में आज प्रस्तुत है एक गीत; बोल हैं:
याद रह रह आ रही है, रात बीती जा रही है
ज़िंदगी के आज इस सुनसान में
जागता हूँ मैं तुम्हारे ध्यान में
सृष्टि सारी सो गई है, भूमि लोरी गा रही है
झूमते हैं चित्र नैनों में कई
गत तुम्हारी बात हर लगती नई
आज तो गुज़रे दिनों की बेरुखी भी भा रही है
बह रहे हैं हम समय की धार में
प्राण रखना पर भरोसा प्यार में
कल खिलेगी उर-लता जो किस कदर मुरझा रही है
तो आइये सुनते प्रियतम की सुधियों में डूबा हुआ कुमार आदिन्य विक्रम का संगीतबद्ध व गाया हुआ यह गीत (गीत सुनने के लिये नीचे दिये गये प्लेयर में चटखा लगायें):
रचनाकार परिचय:-




12 comments:
Good Composition
Alok Kataria
बहुत सुँदर गीत और उतना ही अच्छा सँगीत!
काव्य की दृष्टि से महेन्द्र जी के अच्छी रचना है जिसे आदित्य जी नें अपने स्वर से सजा दिया है।
बह रहे हैं हम समय की धार में
प्राण रखना पर भरोसा प्यार में
कल खिलेगी उर-लता जो किस कदर मुरझा रही है
niji rup se ye panktiya bahut achhi lagi
बह रहे हैं हम समय की धार में
प्राण रखना पर भरोसा प्यार में
कल खिलेगी उर-लता जो किस कदर मुरझा रही है
बहुत अच्छा लगा। कई बार सुना सुबह से।
सुरवद्ध सुन्दर रचना.
आदित्य जी के गाये कई गीत साहित्य शिल्पी पर है उनमें यह सबसे अच्छा लगा। वे बहुत अच्छे गायक हैं। आवाज में गहरायी व मधुरता है।
मन को शांति देने वाला गीत है। बहुत अच्छा लगा इसे सुनना।
बहुत सुन्दर गीत!
अच्छा गीत सुनवाया।
आनंद आ गया
गज़ल तो सुन्दर है ही , उसकी प्रस्तुति भी प्रभावी है।
बहुत ही सुंदर गीत और उतना ही सुंदर संगीत-संयोजन। बधाई स्वीकारें!
एक टिप्पणी भेजें