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सोमवार, ५ अक्तूबर २००९

क्या .. तुम हो ........ [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

कवि के स्वर में


Photobucket रचनाकार परिचय:-

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का जन्म 10 अक्तूबर 1959 को हुआ। आप आपात स्थिति के दिनों में लोकनायक जयप्रकाश के आह्वान पर छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे।

आपकी रचनाओं का विभिन्न समाचार पत्रों, कादम्बिनी तथा साप्ताहिक पांचजन्य में प्रकाशन होता रहा है। वायुसेना की विभागीय पत्रिकाओं में लेख निबन्ध के प्रकाशन के साथ कई बार आपने सम्पादकीय दायित्व का भी निर्वहन किया है।

वर्तमान में आप वायुसेना मे कार्यरत हैं तथा चंडीगढ में अवस्थित हैं।

घर के कोनों में
बंद रोशनदान से
फूटती किरण .....
चमकती स्वर्णरेखा ......
मकड़ी के जालों पर
पड़ती है जब
स्मृति की धूप ....
कुलबुलाने लगता है
कीड़े जैसा फंसा मन
तड़प तड़प कर
दम तोड़ देता है
चंचल उन्मुक्त मन

स्मृतियां .....
सदैव नहीं होतीं
फूलों का सुखद स्पर्श
कैक्टस की तीखी चुभन
और कटुता का बिषदंश
गला देता है कई बार
सुनहरे व्यक्तित्व के
स्वर्णिम पल

स्वत्वाहूत काल कोठरी
में नूतन विचार ...
जैसे स्वच्छ बयार
मकड़ी के जाले
बुहारने लगते हैं
बिना किसी आहट के
चुपचाप ..... दबेपांव
और फिर
अवसाद की अर्गला पर
हल्की सी ... दस्तक
जीवन की सांध्य बेला में
क्या .. तुम हो.
’चिरनिद्रा’
चिरंतन सत्य ...

16 comments:

ओम आर्य ५ अक्तूबर २००९ २:१९ PM  

एक जीवंत कविता ............जो गहरे उतरी!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ५ अक्तूबर २००९ ३:०६ PM  

गहरे अर्थों वाली रचना। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

बेनामी ५ अक्तूबर २००९ ४:३३ PM  

Kavita yahi hai

Shakti

रंजना [रंजू भाटिया] ५ अक्तूबर २००९ ५:२५ PM  

बहुत सुन्दर सच के करीब गहरे भाव वाली रचना है यह शुक्रिया इसको पढ़वाने के लिए

Anamika ५ अक्तूबर २००९ १०:४७ PM  

मन ke अंतर्नाद को, स्मृतियों को सुंदर शब्दों में ढाला है..बहुत अच्छी रचना..

सुषमा गर्ग ६ अक्तूबर २००९ ७:३० AM  

और फिर
अवसाद की अर्गला पर
हल्की सी ... दस्तक
जीवन की सांध्य बेला में
क्या .. तुम हो.
’चिरनिद्रा’
चिरंतन सत्य ...

सफल अभिव्यक्ति

rajiv singh renusagar ६ अक्तूबर २००९ २:५२ PM  

sundar rachna hai badhayee

Kiran Sindhu ६ अक्तूबर २००९ ४:३० PM  

श्रीकांत जी,
स्मृति की व्याख्या के लिए मन के कैनवास पर जो शब्द - चित्र आपने उभारा है, उसमे जीवन के यथार्थ के रंग दिखाई दे रहे हैं. एक दार्शनिक अभिव्यक्ति,अति सुन्दर रचना के लिए बधाई!
-----किरण सिन्धु.

Dr. Sudha Om Dhingra ६ अक्तूबर २००९ ८:२२ PM  

सुन्दर भावों की भरपूर आवाज़ में बेहतरीन अभिव्यक्ति

indira kriShna ६ अक्तूबर २००९ १०:१८ PM  

samvedanaon ko jivant karati kavita ke liye dhanyawad

अल्पना वर्मा ७ अक्तूबर २००९ ११:३३ AM  

स्मृतियां .....
सदैव नहीं होतीं
फूलों का सुखद स्पर्श'
बहुत खूब!
स्मृतियों पर लिखी यह कविता..बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति hai..
-आप की आवाज़ में सुनना और भी अच्छा लगा.
abhaar

मोहिन्दर कुमार ७ अक्तूबर २००९ १:४० PM  

सुन्दर भाव भरी रचना जिसे सस्वर सुनने में बहुत ही आनंद आया.

निशा ७ अक्तूबर २००९ ११:०५ PM  

आपकी आवाज में कविता सुन्ने में बहुत आनंद आया . बधाई .
निशा

शशि पाधा ८ अक्तूबर २००९ ६:४४ AM  

स्मृतियां .....
सदैव नहीं होतीं
फूलों का सुखद स्पर्श
कैक्टस की तीखी चुभन
और कटुता का बिषदंश
गला देता है कई बार
सुनहरे व्यक्तित्व के
स्वर्णिम पल
अन्तर्मन की उहापोह से जूझती अत्यन्त गहरी अभिव्यक्ति । एक चिरन्तन सत्य !धन्यवाद इतनी सुन्दर रचना के लिये।
शशि पाधा

Vijay Kumar Sappatti ८ अक्तूबर २००९ २:४६ PM  

shrikaant ji

namaskar

is kavita ko padhne aur sunne me jo ahsaas jaage unko main shabdo me bayan nahi kar sakta ..

Meri badhai sweekar karen..

regards

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

बेनामी ८ अक्तूबर २००९ ५:३६ PM  

श्रीकान्त जी

कविता पढ़्ते हुये सुनना बहुत ही अच्छा लगा. आपकी कविता मन को बहुत ही गहरे तक छूती है

आभार

ज्योत्सना

जनवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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