क्या .. तुम हो ........ [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
रचनाकार परिचय:-बंद रोशनदान से
फूटती किरण .....
चमकती स्वर्णरेखा ......
मकड़ी के जालों पर
पड़ती है जब
स्मृति की धूप ....
कुलबुलाने लगता है
कीड़े जैसा फंसा मन
तड़प तड़प कर
दम तोड़ देता है
चंचल उन्मुक्त मन
स्मृतियां .....
सदैव नहीं होतीं
फूलों का सुखद स्पर्श
कैक्टस की तीखी चुभन
और कटुता का बिषदंश
गला देता है कई बार
सुनहरे व्यक्तित्व के
स्वर्णिम पल
स्वत्वाहूत काल कोठरी
में नूतन विचार ...
जैसे स्वच्छ बयार
मकड़ी के जाले
बुहारने लगते हैं
बिना किसी आहट के
चुपचाप ..... दबेपांव
और फिर
अवसाद की अर्गला पर
हल्की सी ... दस्तक
जीवन की सांध्य बेला में
क्या .. तुम हो.
’चिरनिद्रा’









16 comments:
एक जीवंत कविता ............जो गहरे उतरी!
गहरे अर्थों वाली रचना। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
Kavita yahi hai
Shakti
बहुत सुन्दर सच के करीब गहरे भाव वाली रचना है यह शुक्रिया इसको पढ़वाने के लिए
मन ke अंतर्नाद को, स्मृतियों को सुंदर शब्दों में ढाला है..बहुत अच्छी रचना..
और फिर
अवसाद की अर्गला पर
हल्की सी ... दस्तक
जीवन की सांध्य बेला में
क्या .. तुम हो.
’चिरनिद्रा’
चिरंतन सत्य ...
सफल अभिव्यक्ति
sundar rachna hai badhayee
श्रीकांत जी,
स्मृति की व्याख्या के लिए मन के कैनवास पर जो शब्द - चित्र आपने उभारा है, उसमे जीवन के यथार्थ के रंग दिखाई दे रहे हैं. एक दार्शनिक अभिव्यक्ति,अति सुन्दर रचना के लिए बधाई!
-----किरण सिन्धु.
सुन्दर भावों की भरपूर आवाज़ में बेहतरीन अभिव्यक्ति
samvedanaon ko jivant karati kavita ke liye dhanyawad
स्मृतियां .....
सदैव नहीं होतीं
फूलों का सुखद स्पर्श'
बहुत खूब!
स्मृतियों पर लिखी यह कविता..बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति hai..
-आप की आवाज़ में सुनना और भी अच्छा लगा.
abhaar
सुन्दर भाव भरी रचना जिसे सस्वर सुनने में बहुत ही आनंद आया.
आपकी आवाज में कविता सुन्ने में बहुत आनंद आया . बधाई .
निशा
स्मृतियां .....
सदैव नहीं होतीं
फूलों का सुखद स्पर्श
कैक्टस की तीखी चुभन
और कटुता का बिषदंश
गला देता है कई बार
सुनहरे व्यक्तित्व के
स्वर्णिम पल
अन्तर्मन की उहापोह से जूझती अत्यन्त गहरी अभिव्यक्ति । एक चिरन्तन सत्य !धन्यवाद इतनी सुन्दर रचना के लिये।
शशि पाधा
shrikaant ji
namaskar
is kavita ko padhne aur sunne me jo ahsaas jaage unko main shabdo me bayan nahi kar sakta ..
Meri badhai sweekar karen..
regards
vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com
श्रीकान्त जी
कविता पढ़्ते हुये सुनना बहुत ही अच्छा लगा. आपकी कविता मन को बहुत ही गहरे तक छूती है
आभार
ज्योत्सना
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