कहानी के स्वरूप के विषय में अनेक कहानीकारों ने विविध प्रकार की परिभाषायें प्रस्तुत की है -

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डा. वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा. वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

विदेशी विद्वानों के अनुसार
पाश्चात्य आलोचक हडसन के अनुसार - ‘‘कहानी उसी को कहेंगे जो एक बैठक में सरलता से पढ़ी जा सके।’’ आर. फ्रांसिस फोस्टर के अनुसार - ‘‘कहानी जीवन की महत्वपूर्ण घटना एवं विषम परिस्थितियों का संक्षिप्त विवरण और मनुष्य के भीतर स्थित आधारभूत गुणों को प्रदर्शित करती है।’’ एच. जी. वेल्स के अनुसार - ‘‘कहानी को आकार में अधिक से अधिक इतना बड़ा होना चाहिये कि वह सरलता से बीस मिनट में पढ़ी जा सके।’’ सर हूफ वाल्पोल के अनुसार - ‘‘कहानी-कहानी होनी चाहिये अर्थात उसमें घटित होने वाली वस्तुओं का ऐसा लेखा जोखा होना चाहिये जो घटना और आकस्मिकता से परिपूर्ण हो। उसमें प्रगति का ऐसा अप्रत्याशित विकास हो जो कुतूहल के द्वारा सार और संतोष को पूर्ण आस्था तक ले जाये।’’
भारतीय विद्वानों के मतानुसार
प्रेमचन्द्र - ‘‘कहानी एक रचना है, जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा विन्यास सब उसी भाव को पुष्ट करते है।’’ जयशंकर प्रसाद - ‘‘सौन्दर्य की एक झलक का चित्रण करना और उसके द्वारा रस की सृष्टि करना ही कहानी का उद्देश्य है।’’ राय कृष्ण दास - ‘‘कहानी मनोरंजन के साथ-साथ किसी न किसी सत्य का उद्घाटन करती है तथा आख्यायिका में सौन्दर्य की एक झलक का रस है।“ जैनेन्द्र कुमार - ‘‘कहानी एक भूख है जो निरंतर समाधान पाने की कोशिश में रहती है। हमारे अपने सवाल होते हैं शंकायें होती है, चिन्ताएँ होती है और हम उनका उत्तर उनका समाधान खोजने का, पाने का सतत प्रयत्न करते रहते है। हमारे प्रयोग होते रहते है। उदाहरणों और मिशालों की खोज होती रहती है। कहानी उस खोज के प्रयत्नों का एक उदाहरण है। वह एक निश्चित उत्तर ही नहीं देती, पर यह अलबत्ता कहती है कि शायद उस रास्ते मिले। वह सूचक होती है, कुछ सुझाव देती है और पाठक अपनी चिन्तन क्रिया से उस सूझ को ले लेते हैं।“

इस प्रकार समाज की विषमताओं को देखते हुये कहानीकारों ने अनेक प्रकार की कहानी समाज के सामने प्रस्तुत की। कहानियों में उच्च मानववाद का प्रतिपादन किया किन्तु यह मानववाद यथार्थ के सहारे आदर्श की ओर विकसित हुआ है। समाज के निम्न वर्ग की अनेक प्रकार की समस्यायें उसके जीवन के विभिन्न प्रकार के रूपों को प्रस्तुत करते हुये आदर्शवाद का संकेत करते हैं। उनकी दृष्टि इतनी पैनी है कि समाज का कोई रूप उनसे छिपा नहीं है जैसे - ताँगे वाला, किसान, श्रमिक, विद्यार्थी, डाक्टर, वकील, व्यापारी, अधिकारी आदि के विविध रूपों को वे अपनी कहानी के माध्यम से चित्रित करने में पूर्णतया सफल रहे हैं।
‘‘कथा साहित्य के आदि छोर को पकड़ने की इच्छा रखने वाले पाठकों की कसौटी में खरी उतरने वाली कहानियाँ मानवता के आदि ग्रन्थ वेदों तक में भी मिलती हैं, परन्तु इस कला का परिपूर्ण विकास आधुनिक युग की देन है।’’(1) कहानी से नयी कहानी तक की विकास यात्रा वस्तुत: नूतन भाव-भूमियों के अन्वेषण का एक साहित्यिक अनुष्ठान है। यथार्थ तो यह है कि आधुनिक व्यस्त एवं गतिशील जीवन के विविध परिवेशों के पकड़ने में अनेक सुविख्यात कहानीकार तक असफल हो रहे हैं।’’(2) जिस गति से जीवन भाग रहा है उसी गति से नयी कहानी का कथ्य, शिल्प, बिम्ब, यथार्थ एवं भाव बोध भी भाग रहा है। इस स्थिति में आधुनिक कहानीकार अनुभूतियों की समसामयिकता को जितना भी पकड़ पाता है उसे वह पाठक तक संप्रेषित कर देता है। आज अपने अभावों की पूर्ति एवं इच्छाओं की तृप्ति हेतु प्रत्येक मनुष्य संघर्षरत है। नयी कहानी ने इसी संघर्षरत मनुष्य को पकड़ा है।
मानव विद्रोह की चीख पुकार और परिवर्तित परिवेश की विसंगतियों ने कहानीकारों को उसका दायित्वबोध करते हुए आधुनिक व्यक्ति के हृदय, मस्तिष्क चेतना और अन्त: चेतना की सूक्ष्म विवेचना का अवसर दिया। ‘‘स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सार्थक कहानी लेखन की दिशा में एक गम्भीर और महत्वपूर्ण प्रयास होने के कारण नयी कहानी आन्दोलन से सम्बद्ध लेखकों ने अनेक सशक्त कहानियाँ लिखीं। यही नहीं उन्होंने सामाजिक यथार्थ के कुछ ऐसे आयामों को रेखांकित किया जिनकी ओर पहले के लेखकों का ध्यान पूरी तरह नहीं गया था।(3) नये कहानीकारों का अनुभव यदि एक सीमित दायरें में होता तो वह जीवन सत्य को इतनी सूक्ष्मता से कभी नहीं पकड़ पाता जितना कि पकड़े हुए है। जीवन सत्य की सूक्ष्म पकड़ के कारण ही नयी कहानी आज भी जीवन की मुख्य धारा से अनुस्यूत है तथा विभिन्न विकृतियों से उत्पीड़ित होने के पश्चात् भी आदमी का आत्म सम्मान उसके अचेतन में अकुण्ठित ही है। इस दृष्टि से नयी कहानी व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व का सही बोध करा सकी तो यही मोड़ किसी भाषा और उसके साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ‘‘आधुनिक कहानी यथार्थबोध की जटिलतम समस्याओं से निरन्तर अनुप्राणित है।’’(4) ‘‘आधुनिक कहानीकार के लिए कहानी अभिव्यक्ति होती है मात्र घटना नहीं।’’(5)
स्वतंत्रता के उपरांत सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, वैयक्तिक शैक्षणिक एवं राजनैतिक दृष्टि से आदमी के जीवन में जो अराजकता एवं अशांति आयी उसके कारण चारों ओर सताया हुआ आदमी ही दृष्टिगोचर होता है, निरन्तर बढ़ते हुए भ्रष्टाचार एवं स्वार्थ ने आदमी के अस्तित्व, सम्बन्धों एवं विश्वास पर जमकर प्रहार किये। ‘‘नयी कहानी हिन्दी कहानी का इतिहास नहीं है, यह कहानी के विकास की शृंखला की एक कड़ी है।’’(6)
स्वातन्त्रयोत्तर भारतीय समाज में एक बड़ा परिवर्तन यथार्थ रुप में कहानी चित्रण था। ‘‘सामाजिक एवं पारिवारिक सम्बन्धों में आने वाले परिवर्तन को लेकर जो कहानियाँ लिखी गयीं, उनमें पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले वे पात्र हैं, जो अभी तक परम्परागत जीवन मूल्यों से चिपटे हुए हैं।(7)
वर्तमान समय में विषमताओं के तमाम तथ्यों को न निगल सकने के कारण जहाँ नई पीढ़ी अभाव, अनास्था, निराशा एवं कुंठा के क्षणों को जीने के लिए विवश हुई, वहाँ शिक्षातन्त्र की रोटी खाने वाले बुद्धिजीवी प्रजातन्त्र का खुला तमाशा देखकर भी कुछ न कर सकने की स्थिति में हैं। इस प्रकार इस असंतुष्ट आदमी की अनास्था, कुंठा विद्रोह एवं प्रतिकार की भावना ही नयी कहानी का कथ्य है। ‘‘स्वतंत्रता के बाद तरुण लेखकों की नई पीढ़ी ने एक नये समाज को देखा जिसमें भेड़िया-संघर्ष, अवसरवादिता और स्वार्थपरता का बोलबाला था - हर स्थिति में सत्ता हासिल हो, इसमें योग्यता या अयोग्यता का कोई सवाल नहीं - क्या यही हमारी स्वतंत्रता का वास्तविक रुप है ?’’(8)
आजादी के उपरान्त पुरुषों के समान ही स्त्रियों को भी समानाधिकार मिला तो उनके जीवन में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। जब उनके पैरों से बन्धन की बेड़ियाँ खुल गयीं तो उनका कार्यक्षेत्र मात्र गृहस्थी तक ही सीमित नहीं रहा। नये कहानीकारों ने प्राय: अपने-अपने दृष्टिकोणों से इन स्त्रियों के जीवन को आधार बनाकर अनेक कहानियाँ लिखीं ऐसी कहानियाँ जो नौकरीपेशा स्त्री के जीवन की सच्चाई से भरी हुई हैं। उसमें मोहन राकेश कृत - ‘‘एक और जिन्दगी, सुहागनें, मिसपास’’, कमलेश्वर कृत - ‘‘तलाश’’, राजेन्द्र यादव कृत - ‘‘खेल, प्रतीक्षा, छोटे-छोटे ताजमहल टूटना’’, ऊषा प्रियम्बदा कृत - ‘‘नींद, झूठा दर्पण, पूर्ति, एक और विदाई, नागफनी के फूल,’’ मन्नू भण्डारी कृत - ‘‘क्षय, जीती बाजी की हार’’, शांति मेहरोत्रा कृत - ‘‘महल एक औरत, मार्कण्डेय कृत - ‘‘एक दिन की डायरी’’, निर्मल वर्मा कृत - ‘‘परिन्दे, एक पुष्प एक नारी’’, शिवप्रसाद कृत - ‘‘धरातल’’, आदि उल्लेखनीय हैं।
आज विद्रोह का यह बिन्दु प्रत्येक मनुष्य के भीतर है विगत वर्षों की अधिकांश कहानियों में विद्रोह का यह बिन्दु पूर्णत: उभर कर आया है। ‘‘आज की सामाजिक एवं मानवीय संवेदनाएँ और परिस्थितियाँ अपनी आस्थाओं मूल्यों तथा विश्वासों के सहारे जीने वाले लोगों को उखाड़ फेंकने की चेष्टा करती है।’’(9)
आधुनिक कहानीकार प्राचीन लेखकों की तरह रस उत्पत्ति के लिए ही कहानियों की सृष्टि नहीं करता, न ही मध्ययुगीन कहानीकारों की तरह अस्वाभाविक कौतूहलता की अस्वाभाविक घटनाओं को लेकर वर्णन करता है। वर्तमान कहानीकार आज का संघर्षशील व्यस्त और दुखी मानव है जिसके सामने समस्याओं, चिन्ताओं और समाधानों का ढेर है। आज कहानी मनोरंजन के साथ किसी न किसी सत्य का भी उद्घाटन करती है। वैज्ञानिक युग का मानव पूर्णरुपेण स्वतंत्र है, आधुनिक कहानी साहित्य इसी वैयक्तिकता को महत्व देता है। आज का प्रत्येक कहानीकार अपनी कहानियों में व्यक्तिगत मान्यताओं धारणाओं और चिन्ताओं को मूर्तरुप देने की चेष्टा करता है। वह वर्तमान को भूलकर केवल भविष्य की काल्पनिक शांति में ही मन नहीं रमाता। वह अपने युग और उसमें उभरती नयी मान्यताओं के प्रति सचेत है। कहानी व्यक्ति व समाज की होती है, उसके कार्य, कारण और सम्बन्ध की होती है। ‘‘आज की कहानी के रुप एवं स्वरुप में तीव्र गति से परिवर्तन दिखाई देता है, परन्तु कहानी कला के मूल तत्वों में परिवर्तन नहीं है।’’(10)
आज विशिष्ट पात्रों को न चुनकर सामान्य मानव को ही संघर्ष एवं युग की चेतना का प्रतीक माना जाता है। कहानियों का सम्बन्ध यदि जीवन से है तो पात्र भी यथार्थ जीवन के होने चाहिये। कहानी के चरम उद्देश्य तक में आज मानवता और मानव मूल्य है, उनकी व्याख्या है। उद्देश्य इतना सपाट सीमित या यांत्रिक नहीं होता कि कहानी के विषय में समाहित हो सके।
आजकल तो बिना किसी उद्देश्य और विचार के भी कहानीकार एक विशेष स्थिति को चित्रित कर देता है। इनमें कोई जीवन दर्शन नहीं तब भी आनन्द है। कथानक की सत्य रुपरेखा ही यहाँ उद्देश्य है जैसे मन्नू भंडारी की ‘आकाश के आइने में’, जगदीश चतुर्वेदी की ‘मुर्दा औरतों की झील’, रेणु की ‘टेबल’, ज्ञानरंजन की ‘फैंस’ के इधर उधर’ आदि। आज की कहानी में फूटता शोर-शराबा भी बिना उद्देश्य के नहीं, वह यदि निराशा दिखाती है तो आशा और जीवन पाने की छटपटाहट भी उसमें व्याप्त है।
आज कहानियों में युग-बोध, जीवन की समस्याएं, ज्ञान, सत्य का परिचित रुप भी उपलब्ध है। वह तर्क, विचार, मनन के बाद सूक्ष्म से सूक्ष्म अंतर्दृष्टियों को हास्य व्यंग्य ओर नई सशक्त अभिव्यक्ति को भी स्पष्ट कर रही है। एक स्वतंत्र नदी की तरह अविरल मधुर धारा प्रवाहित हो रही है, होती जाएगी। नयी कहानी के विकास के मुख्य तीन पक्ष हैं। इन तीनों पक्षों का विकास एक साथ ही हुआ। इन तीनों के पूर्ण विकास से ही आधुनिक कहानी का पूर्ण विकास सम्भव हुआ। ये तीनों पक्ष क्रमश: आत्मा, रुप और शैली है।
नन्द दुलारे बाजपेयी आधुनिक कहानी के विवाद पर अपना मत स्पष्ट करते हुए बताते हैं - ‘‘नये युग की हिन्दी कहानियों के सम्बन्ध में दो बातें बड़े विश्वास के साथ और बहुत ही निर्विवाद भाव से कही जाती हैं। एक यह है कि ये कहानियाँ आधुनिक पश्चिमी कहानियों से प्रभावित हैं और उन्हीं के आधार पर लिखी जा रही हैं। दूसरी यह कि इन कहानियों का प्राचीन भारतीय कथा-साहित्य से कोई क्रमागत सम्बन्ध नहीं है किन्तु मुझे ये दोनों ही बातें सुविचारित नहीं जान पड़ती और सहसा यह मान लेने का कोई कारण नहीं दिखता।’’(11) नई हिन्दी कहानियों की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है अथवा प्राचीन कथा-साहित्य से उनका कोई तात्विक साम्य नहीं है।
आरम्भ में ही यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मेरा यह विचार देशप्रेम की किसी संकीर्ण भावना से प्रेरित होकर नहीं बनाया गया, न इसके मूल में प्राचीन-प्रियता की कोई धारणा ही है। साहित्यिक इतिहास के समस्त विद्यार्थी यह जानते हैं कि प्राचीन भारतीय कहानियाँ अपने समय के सभ्य संसार में कितना प्रभाव रखती थीं, उनका कितना ऋण संसार के कथा साहित्य पर है। यदि आज हिन्दी कहानियाँ पश्चिम से प्रेरणा ले रही हैं तो यह पूर्ववर्ती ऋण का शोध ही माना जाएगा।
उक्त स्थितियों में हम बिना किसी हिचक के वास्तविक स्थिति का उल्लेख कर सकते हैं। इन नई कहानियों का प्राचीन कहानियों से असम्बद्ध होना भी सिद्ध नहीं होता। यद्यपि विषय, शैली और उद्देश्य आदि में पर्याप्त परिवर्तन हो गया है।
संक्षेप में मैं कह सकता हूँ कि आधुनिक कहानी की यही रूपरेखा है जो क्रमश: विकसित होकर पश्चिमी साहित्य में प्रतिष्ठित हुई है। हमें यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि छोटी-छोटी कहानियाँ लिखने की यह कला हमने यूरोप से ली है। कम से कम उसका आज का विकसित रूप तो पश्चिम का ही है। हमारे यहाँ प्राचीन संस्कृत-साहित्य में भी कहानी थी, पर अनेक कारणों से जीवन की अन्य धाराओं की भांति साहित्य में भी हमारी प्रगति रुक गयी। साहित्य के लिए प्राचीनकाल ने जो मर्यादायें बाँध दी थीं, उनका उल्लघंन करना वर्जित था। अतएव काव्य और नाटक की भाँति कथा में भी हम आगे न बढ़ सके। कोई वस्तु बहुत सुन्दर होने पर भी अरुचिकर हो जाती है, जब तक उसमें कुछ नवीनता न लाई जाये। एक ही तरह का काव्य, एक ही भांति के नाटक पढ़ते-पढ़ते आदमी थक जाता है और वह नयी चीज चाहता है, चाहे वह उतनी सुन्दर और उत्कृष्ट न हो। हमारे यहाँ या तो यह इच्छा हुई नहीं, या हमने उसे इतना कुचला की जड़भूत हो गई। पश्चिम प्रगति करता रहा। उसे नवीनता की भूख थी और मर्यादाओं की बेड़ियों से चिढ़। जीवन के प्रत्येक भाग में इसकी इस अस्थिरता की, असंतोष की, बेड़ियों से मुक्त हो जाने की छाप लगी हुई है। साहित्य में भी उसने क्रान्ति मचा दी। कथा-साहित्य में विकास हुआ और उसके विषय में चाहे उतना बड़ा परिवर्तन न हुआ हो, पर शैली तो बिल्कुल ही बदल गयी। ‘‘अलिफ लैला’’ उस समय का आदर्श था। उसमें रोमांस था, पर उसमें जीवन की समस्यायें न थीं, मनोविज्ञान के रहस्य न थे, अनुभूतियों की इतनी प्रचुरता न थी, जीवन अपने सत्य रुप में इतना स्पष्ट न था।’’(12)
ऊपर का यह लम्बा उद्धरण प्रेमचंद के एक प्रख्यात लेख से है। हिन्दी साहित्य के महारथियों में वे ही पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस सत्य को जाना और हिन्दी की आज की आवश्यकताओं के अनुसार कहानियाँ दीं। वर्तमान युग की जरूरतों को समझते हुए साहित्य के इस नये पाठक के मन की ही चीज उन्होंने उसे देने का प्रयास किया।
आज का कहानीकार कल्पना मात्र पर अपनी कहानी की भित्ति खड़ी न करके किसी मनोवैज्ञानिक सत्य पर उसकी नींव रखकर और कला के दूसरे उपकरणों की सहायता से उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके, सजीवता प्रदान करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नये कहानी लेखकों की एक सशक्त पीढ़ी अपनी रंगारंग अनुभूतियों को लेकर हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में आगे आयी, लेकिन नयी कविता की तरह ‘नई कहानी’ भी कोई पृथक चीज है, ऐसा भ्रम शायद कुछ इसी प्रकार के लोगों ने ही फैलाया है, जिनका न तो अपना कोई स्थिर मत है, न स्पष्ट दृष्टि। कहानी पुराने ढांचे में किसी मनोरंजक कथानक को लेकर भी लिखी जा रही है।
‘‘आधुनिक कहानी की विकास प्रक्रिया के अध्ययन से स्पष्ट है कि आधुनिक कहानी मनुष्य की समस्याओं और उसकी चेतना के विभिन्न स्तरों की कहानी है।’’(13)
आधुनिक कहानियाँ कथा साहित्य में एक नये मोड़ के आने की सूचना तो देती ही है किन्तु नये रचनात्मक परिवेश की ओर संकेत भी करती है। जो अब जीवन में आ रहा है।
नये जीवन मूल्य
अब समीक्षा के क्षेत्र में यह बात कम-बेश रुप में मान्य हो चुकी है कि जीवन-मूल्यों से कटकर तैयार हुए कलागत मूल्य न केवल अनावश्यक है बल्कि अविश्सनीय भी हैं। जीवन-मूल्यों द्वारा नियोजित मर्यादाओं के प्रति रचनाकार की स्वीकृति-अस्वीकृति अथवा तटस्थता उसकी रचना के मूल्यांकन का निकष बनती है।
‘‘मानवीय मूल्यों के सन्दर्भ में यदि हम साहित्य को नहीं समझते तो अक्सर हम ऐसी प्रतिभान योजना को प्रश्रय देने लगते हैं कि समस्त साहित्यिक अभियान गलत दिशाओं में मुड़ जाता है।’’(14)
‘‘पहले जो कथाकार आदर्शों में विश्वास करता था, वही पाँचवे दशक से ही मूल्यों में विश्वास करने लगा।’’(15)
कालान्तर में इस विश्वास की परिणति नये मूल्यों की तलाश और विघटनशील मूल्यों के अस्वीकार में होती गई।
जिस समय देश के भाग्य विधाता संविधान के निर्माण में जुटे हुये थे, उस समय भारतीय जन-मानस गम्भीर चुनौतियों के दौर से गुजर रहा था। देश का भयावह विभाजन, बढ़ता हुआ औद्योगीकरण, पाश्चात्य विचारकों - डार्विन, मार्क्स, फ्रायड और सार्त्र आदि के आदर्शवाद विरोधी विचार-सूत्रों का दबाव आदि औसतन भारतीय चेतना को झकझोरने के लिये पर्याप्त थे। फलस्वरूप मानवीय सम्बन्धों का सतत् एवं स्वाभाविक रुप विकृत हो चला, रिश्तों में दरारें पड़ गयीं और पुरातन ‘‘जीवन-मूल्य’’ आधुनिकता से टकराकर या तो नष्ट हो गए या ‘‘नया चोला’’ धारण करने के लिये बाध्य हो गए।’’
जिस आदर्शपरक आस्था और अभिजात्य गौरव के प्रति मोह स्वाधीनता - संघर्ष की प्रेरक शक्ति बने थे, कलांतर में वे सब ‘‘कुन्ठा’’ और ‘‘घुटन’’ में बदल गये। ‘‘बीमार संवेदनाओं और आत्मकारी विश्वासों से जैसे समूचा वातावरण साहित्यिक हो गया।’’(16) तीव्र गति से फैलता हुआ औद्योगीकरण, बढ़ती हुयी जनसंख्या का दबाव तथा जीवन के हर क्षेत्र में प्रवेश करती हुयी राजनीति, ये सब उन आदर्शों और विश्वासों की टूटने के लिए समान रूप से उत्तरदायी हैं। जिनकी स्वतंत्रता संघर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। तब से आज तक बहुत बड़ा उलटफेर हो चुका है। हिन्दी कहानीकारों ने इस बदलते हुए माहौल पर अनेक कहानियाँ लिखी हैं जिनमें समकालीन मूल्य-बोध के सही रुप को देखा जा सकता है।
‘‘नयी कहानी’’ के संबंधों के परिवर्तित रुप, प्रेम और घृणा की सापेक्षता, अर्थहीन जीवन की समझ में भी रोमांचित सा स्पर्श, और अजनबी होते अपने ही संसार को सही अभिव्यक्ति दी है। अजनबी होते अपने ही संसार को चेतना की मार्मिक अभिव्यक्ति मन्नू भंडारी की कहानी की मूल-चेतना है।’’
स्वतंत्रता के उपरान्त लिखी गयी कहानियाँ दरअसल परम्परागत मूल्यों के प्रति विक्षोभ प्रदर्शित करती हुई नवीन जीवन मूल्यों को उभारती हैं। अधिकांश कहानियों में जीवन-मूल्य भरे हुए हैं जो पूर्णतया टूटे नहीं हैं। नवीन मूल्यों की स्थापना की ओर भी कहानीकारों ने संकेत ही किया है केवल ‘‘तलाश’’ (कमलेश्वर)’’, (दाम्पत्य)’’ (राजकमल चौधरी) और ‘‘निश्चय’’ (कुल भूषण) आदि कुछ कहानियों में नवीन मूल्यों की स्थापना का प्रयास मिलता है।’’ इस पीढ़ी के कहानीकारों में ‘‘मानवीय मूल्यों के संरक्षण, जीवनी शक्ति के परिप्रेषण एवं सामाजिक नव निर्माण की उत्कंट प्यास है। इतना ही नहीं, बल्कि आज की कहानी नई भाव भूमियों का सृजन कर रही है।’’(17)
समय-समय पर टूटते-बनते मूल्यों के अनुसार रचनाकार की दृष्टि में भी परिवर्तन होना अनिवार्य है। लेकिन जैसा कि रामकुमार ‘‘भ्रमर’’ ने लिखा है ‘‘किसी भी रचनाकार की कृति उस चिंतन सत्य से अडिग नहीं होनी चाहिये, जो निरन्तर प्रगति का एकमात्र आधार है - मनुष्य के सनातन संघर्ष के प्रति आस्थावान होकर भविष्य के प्रति पूर्ण आशावादी होना।’’(18)
‘‘कतिपय आधुनिकतावादी रामकुमार ‘‘भ्रमर’’ के कथन को परम्परावादी ठहराते हुये उसकी सार्थकता को संदेहास्पद सिद्ध करने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि भारतीय परम्परा न केवल कुछ सामाजिक आदर्शों और मूल्यों के प्रति दुहराया गया विश्वास है अपितु उन मूल्यों की अस्वीकृति भी है जो अनुपयोगी सिद्ध हो जाते हैं।(19)
अत: परम्परा से कटे हुए मानवीय मूल्य न केवल अयथार्थ होते हैं बल्कि नाकाफी भी। हमें आश्वत होना चाहिए कि सातवें - आठवें दशक के कहानीकार समकालीन जीवन-मूल्यों की यथार्थ एवं ईमानदार अभिव्यक्ति के नियामक सिद्ध हुए हैं।
इस प्रकार नए तथ्य, नए प्रयोग और नव-जीवन मूल्यों द्वारा नई कहानी ने कथा साहित्य को नई अर्थवत्ता तथा कला-संचेतना प्रदान की है जो नितांत नई उपलब्धि है। उक्त रचना धर्म को देखते हुए जैनेन्द्र जी का यह आपेक्ष कि नयी कहानी एक संघीय संज्ञा है, सटीक बैठता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

1. आधुनिक कथा साहित्य - गंगाप्रसाद पाण्डेय, पृ. 19
2. समकालीन हिन्दी साहित्य : नयी कहानी प्रश्न और उपलब्धियाँ - प्रवीण नायक, पृ. 61
3. जनवादी हिन्दी कहानी का विकास एक परिप्रेक्ष्य - आनंद प्रकाश, पृ. 58
4. नयी कहानियाँ - परमानन्द श्रीवास्तव, पृ. 33
5. परम्परा का नया मोड़ : रोमांटिक यथार्थ (नई कहानी संदर्भ व प्रकृति) पृ. 228
6. नयी कहानी : प्रतिनिधि हस्ताक्षर - डा. वेदप्रकाश अमिताभ, पृ. 128
7. समकालीन हिन्दी कहानी और मूल्य संघर्ष की दिशा - डा. सविता जैन, पृ. 121
8. स्वतंत्रता के बाद की कहानी : नई कहानी दशा दिशा सम्भावना, श्रीमती विजय चौहान, पृ. 223
9. धर्मयुग - हिन्दी पत्रिका - 16 अक्टूबर, 1979
10. स्वातन्त्रयोत्तर हिन्दी कहानी - कृष्णा अग्निहोत्री, पृ. 12
11. आधुनिक साहित्य - नन्ददुलारे बाजपेयी - पृ. 239
12. हिन्दी कहानी - एक अन्तरंग परिचय, उपेन्द्रनाथ अश्क, पृ. 17-18
13. कहानी के तत्व : भगवतीचरण वर्मा, पृ. 29
14. मानव मूल्य और साहित्य : धर्मवीर भारती, पृ. 155
15. समकालीन कहानी : दिशा और दृष्टि (सं. धनन्जय) : डा. बच्चन सिंह का निबन्ध गुमशुदा पहचान : तलाश की प्रतिक्रिया, पृ. 89
16. समकालीन कहानी : समांतर कहानी : समांतर से पूर्व कहानी में यथार्थ, जीवन : पृ. 21
17. कहानी नयी कहानी : डा. नामबर सिंह : पृ. 24
18. गिरिस्तन - (कहानी संग्रह) पृ. 166
19. श्री कान्त वर्मा : आलोचना अंक, 16 जनवरी-मार्च, 1972

8 comments:

  1. कहानी के स्वरूप व संवेदना विषय को तराश कर लिखा है डॉ. वीरेन्द्र नें। शोध और विचारों का सटीक सम्मिश्रण।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ग्यानवर्द्धक आलेख है वीरेन्द्र जी का धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  3. Thanks Virendra ji. Its a comprehensive article.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  4. वीरेन्द्र जी आपकी सामग्री बहुत दुर्लभ व समग्र है। आपने मुझ जैसे विद्यार्थी को बहुत लाभ पहुँचाया।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वीरेन्द्र जी आपने संदर्भों के साथ अपना आलेख लगाया है। आपके रिसर्च और आपका लेखन दोनों ही परिपक्व हैं।

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget