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गुरुवार, २२ जनवरी २००९

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक [काव्य-पाठ] - डॉ० कुँअर बेचैन


कुछ समय पूर्व साहित्य शिल्पी पर हमने सुप्रसिद्ध कवि डॉ० कुँअर बेचैन जी की आवाज़ में उन्हीं का एक खूबसूरत गीत "नदी बोली समन्दर से" प्रस्तुत किया था. आज फिर एक बार हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, कुँअर साहब की एक गज़ल जिसमें उन्होंने जीवन की कुछ सच्चाइयों और कुछ मासूम भावनाओं को बड़े ही मोहक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है.

गज़ल के बोल हैं:

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक
चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलो तक

प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर
ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक

प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली
कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक

माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी
मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक

मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा
बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक

हम तुम्हारे हैं 'कुँअर' उसने कहा था इक दिन
मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक

तो लीजिये पेश है, यह गज़ल:




23 comments:

राजीव तनेजा २२ जनवरी २००९ ८:०३ AM  

कुँवर बेचैन जी की इस गज़ल का आनंद मैँ प्रत्यक्ष रूप से भी सुनीता(शानू) जी के कवि सम्मेलन में ले चुका हूँ।साहित्य शिल्पी को इसे प्रस्तुत करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

नंदन २२ जनवरी २००९ ८:१२ AM  

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक

डॉ. कुँवर बेचैन की पसंदीदा ग़ज़लों मेंसे एक है। उनकी आवाज में सुनने का आनंद ही अलग है। साहित्य शिल्पी का धन्यवाद।

Umesh २२ जनवरी २००९ ८:२२ AM  

ज़िंदगी, प्रेम, रिश्ते और उनसे जुड़ी भावनाओं को बहुत खूबसूरत ढंग से गज़ल में पिरोया गया है.
इस खूबसूरत गज़ल को सुनवाने के लिये डॉ० कुँअर बेचैन और साहित्य शिल्पी, दोनों का आभार!

रितु रंजन २२ जनवरी २००९ ८:२४ AM  

कुँवर साहब की यह मन को छू जाने वाली ग़ज़ल है।

चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलो तक

जवाब नहीं इसमें प्रयुक्त एक एक पंक्ति का। सुनने का आनंद आ गया।

बेनामी २२ जनवरी २००९ ८:५५ AM  

Very Nice presentation.

Alok Kataria

निधि अग्रवाल २२ जनवरी २००९ ८:५७ AM  

मैं कुँवर साहब की बडी प्रशंसक हूँ। इनके लेखन और प्रस्तुतिकरण दोनो का जवाब नहीं।

अविनाश वाचस्पति २२ जनवरी २००९ ९:३० AM  

डॉ. साहब की रचना
और गायन की सरंचना
का वाकई जवाब नहीं
रूह तक को चैन
आ जाता है
कुंअर बेचैन के
काव्‍य पाठ को सुनकर
मन एक असीम आनंद
से भर जाता है।

पंकज सक्सेना २२ जनवरी २००९ ९:३७ AM  

डॉ. कुँअर बैचैन वर्तमान के उन शायरों में हैं को इस काल की शायरी का मापदंड कहे जायेंगे। उन्हे सुनवाने का आभार।

अभिषेक सागर २२ जनवरी २००९ ९:४० AM  

बहुत अच्छी ग़ज़ल है। बधाई।

Udan Tashtari २२ जनवरी २००९ ९:५२ AM  

डॉक्टर की यह गज़ल सामने सुन चुका हूँ मगर हर बार नई लगती है. बहुत आभार इसे उपलब्ध कराने का.

अनिल कुमार २२ जनवरी २००९ १०:०० AM  

प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली
कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक

आज दिन बन गया दॉ. साहब को सुन कर। यह है कविता जो सीधे मन के भीतर उतरे और वहीं रह जाये।

दृष्टिकोण २२ जनवरी २००९ ११:०२ AM  

आनंद आ गया। वाह!!!

रचना सागर २२ जनवरी २००९ १:१५ PM  

इस ग़ज़ल को सुनने का अलग ही आनंद है। कुअर बेचैन जी का आभार।

makrand २२ जनवरी २००९ २:२४ PM  

bahut karnpriya gajal

सतपाल २२ जनवरी २००९ २:२९ PM  

bahut hii umda ghazal..har she'r kabilr taarif hai.
घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक
bahut umda!! ghazal.

शोभा २२ जनवरी २००९ ४:१६ PM  

कुँवर जी की आवाज़ में कविता का आनन्द दुगुना हो गया। साहित्य शिल्पी को इस प्रस्तुति के लिए बधाई।

PRAN SHARMA २२ जनवरी २००९ ४:२१ PM  

ACHCHHEE RACHNA PADHNE YAA SUNNE
SE HAR BAAR AANAND DETEE HAI.JANAAB
KUNWAR BECHAIN KEE YE GAZAL KAALJAYEE HAI.

Arvind Mishra २२ जनवरी २००९ ४:२७ PM  

आभार !

योगेश समदर्शी २२ जनवरी २००९ ७:१५ PM  

एक बात कहना चाहता हूं कि पेड जितना घना होता है उतना ही ज्यादा छाया और सुकुंन देने वाला होता है. साहित्य शिल्पी पर आने वाले डाक्टर साहब जैसे कवियों की रचनाओ को हम साहित्य की डगर पर आने वाले लोगों को बार बार पढना चाहिये और समझना चाहिये कि जो लिखता है वह स्वभाव से भी बहुत विस्तृत होना चाहिये सरल होना चाहिये उम्दा मिसाल पेश करती यह रचना साहित्य शिल्पी पर भाव की पुन: सुंदर बरसात कर गई... बधाई हो... डाक्टर साहब को इस उत्तम रचना के लिये....

श्रद्धा जैन २२ जनवरी २००९ ७:३४ PM  

kunwar ji ko padhna bahut achha laga

har sher kamaal har sher apne aap main itna pura ki dil wah wah kar utha

घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी
ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` २२ जनवरी २००९ ९:४९ PM  

आ. कुँवर जी को पहली बार सुना.
बेहद सुर मेँ, सही शब्दोँ का चयन !
लिहाजा, असर, देर तक,
जहन मेँ छाये रहा
बहुत सुँदर..
प्रस्तुति के लिये
साहित्य शिल्पी को बधाई व आभार !
-लावण्या

महावीर २३ जनवरी २००९ १:१६ AM  

डॉ. कुंअर साहब की ग़ज़ल हमेशा ही आनंद का अनुभव देता है। शब्दों को सुर में बांध कर तो डॉ. साहेब ने दिल पर गहरी छाप छोड़ दी जिसे बार बार सुन कर भी दिल नहीं भरता।

Vijay Kumar Sappatti २४ जनवरी २००९ १०:३२ AM  

bahut sundar prastuthi .. sahitya shilpi ko badhai

vijay

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नाटक पर स्थायी स्तंभ:
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