मिरी जाँ तेरी आँख खुलने से पहले
चला हूँ मैं ये रात ढलने से पहले!

मैं पत्तों से थोड़ी सी शबनम उठा लूँ,
मैं सूरज की पेहली किरण को चुरा लूँ

रचनाकार परिचय:-


धीरज आमेटा का तखल्लुस 'धीर' है। आप राजस्थान के उदयपुर शहर के रहने वाले हैं। वर्तमान में आप गुड़गाँव (हरियाणा) में एक हार्डवेयर कम्पनी में इन्जिनियर हैं। आप अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।


किसी फूल की खिल-खिलाती हँसी को,
किसी खेत की लह-लहाती छवी को!

चहकते हुए पंछियों की सदाएं,
ठुमकती हुई हिरणियों की अदाएं!

भरी दो-पहर में इक अम्बिया की छाया,
महकती हवा और नदिया की धारा!

जो हो जाये फिर शाम को लाल अम्बर
मैं थोड़ा सा सिन्दूर उस का चुरा कर!

ज़रा अपनी आँखों की डिबिया में भर लूँ,
मैं पलकों के पीछे इन्हें क़ैद कर लूँ!

इसी आशियाने में चन्दा निकलते,
मैं आ जाउँगा लौट कर शाम ढलते!

तेरे ख्वाब का शहर इन से सजा के,
तेरी रात के घर की रंगत बढा के!

तेरे चेहरे को रात भर मैं तकुंगा
तेरी नींद की पासबानी करुंगा!

यही सोच कर आज घर से चला हूँ,
मेरी जाँ तेरी आँख खुलने से पहले!
चला हूँ मैं ये रात ढलने से पहले!

11 comments:

  1. रहे हम नफस आपकी शादो ख़ूररम
    न हो ज़िंदगी मेँ उसे कोई भी ग़म

    यही है दुआ मेरी धीरज अमेटा
    मेज़ाजे मुहब्बत कभी हो न बरहम

    अहमद अली बर्क़ी आज़मी

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी अब तक दो ग़ज़लें साहित्य शिल्पी पर पढी हैं और इससे ही आपकी प्रतिभा का अंदाजा लग जाता है। यह नज़्म बेमिसाल है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी अब तक दो ग़ज़लें साहित्य शिल्पी पर पढी हैं और इससे ही आपकी प्रतिभा का अंदाजा लग जाता है। यह नज़्म बेमिसाल है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. खूबसूरत नज़्म के लिये बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  5. धीरज जी आपकी ग़ज़लों का दीवाना तो था ही , इस अद्‍भुत नज़्म ने दीवानगी और बढ़ा दी है...
    बहुत सुंदर रचना सर...इश्क की नयी ऊँचाइयों पे ले जाती हुई

    उत्तर देंहटाएं
  6. धीर-- नाम जैसी गहरी और नदी जैसी तरल रचना...

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  7. डुबा दिया...डुबा दिया...मजा आ गया।

    उत्तर देंहटाएं
  8. sabhee mitroN ko meraa namaste!
    is pur_khuloos himmat_afzaayee par aap sabhee ka tah e dil se shukra_guzaar huN.
    Sahitya shilpi manch kaa aabhaar!

    -Dheeraj Ameta "Dheer"

    उत्तर देंहटाएं

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