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जी हाँ, कृष्ण और राधा के पवित्र प्रेम का बिगड़ा रूप ही प्यार है। कहने को तो यह प्रेम का ही पर्यायवाची है लेकिन इसके मायने माडर्न हो चले हैं जिससे आज पवित्र प्रेम के जुड़वाँ भाई प्यार को थोड़े जुदा अंदाज में देखा जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि अगर यह प्रेम न होता तो न जाने कितने बेरोजगारों की लिस्ट में और कितने नये बंदे शामिल हो जाते। प्यार का नाम सुनकर दो प्रकार के लोग इसके प्रति बेहद आकर्षित हो ही जाते हैं। इनमें पहले नंबर पर हमारे गली मोहल्ले के छैल छवीले नौजवान हैं जो प्यार को ही जीवन का फलसफा समझकर सुबह से लेकर शाम तक स्कूल कालेजों के चक्कर ऐसे लगाते हैं जैसे किसी कंपनी के लिये सर्वे का काम कर रहे हों। इस चक्कर में उनके गाड़ी का चक्का लगातार चलता रहता है और सैकड़ों रूपये हर रोज धुआँ बन कर उड़ते रहते है साथ ही टिपटाप रहने का खर्चा अलग से। और सबसे ज्यादा मजा तो उन केसों में आता है जब एक लड़की के आशिक हजार वाली स्थिति बन जाती है फिर क्या रोज रोज की गुंडागर्दी और मारपीट! लेकिन बेचारी लड़की इस सब से अंजान ही रह जाती है। खैर यही तो जवानी है जो गर्म न हुई तो फिर सब बेकार। पर इस प्यार का फायदा उठाने वाले कुछ दिमागदार लोग भी हैं जो इन्हीं की भावनाओं का लाभ उठाकर लगातार मालामाल हो रहे हैं। हाँ हाँ, सही पहचाना ये हैं हमारे मुंबइया फिल्म वाले। भई प्यार को पंफलेट के रूप में प्रचारित करना भी तो यहीं से शुरू हुआ नहीं तो न जाने कितनी प्रेम कहानियाँ इतिहास में दफन हो गईं लेकिन मजाल जो कोई फिल्म या नाटक सामने आया हो।

फिल्मों की शुरूआत तो शालीनता के साथ हुई थी लेकिन धीरे-धीरे जैसे समय सरकता गया ठीक वैसे ही इनकी शालीनता भी गायब होती रही। बात करें शालीनता के जमाने की तो उसके लिये हम सभी को गुलाब के फूल और मोमबत्ती का खासा शुक्रिया अदा करना चाहिए जब भी हीरो रोमेंटिक मूड में हीरोइन के नजदीक आता तो सीन में दो गुलाब उनका रोल अदा करते तो कभी कमरे में रोशन होती मोमबत्ती को हौले से बंद कर दिया जाता। खैर तरीका चाहे जो भी जैसे तैसे हमारे समाज की इज्जत बचा ली जाती। इसकी छाया ही हम पर पड़ती और हम अपनी पत्नी का हाथ पकड़ने में ही महीनों गुजार दिया करते और हमारी पत्नी भी दो बच्चों की अम्मा बनने के बाद भी ऐसे शर्माती जैसे अभी गोना करके आईं हों।

खैर समय बढ़ा और राजकपूर साहब ने फिल्मों में पदार्पण कर अंदर के रहस्यों को बाहर लाने का उद्घाटन किया। राज साहब वह सब कुछ सामने लाये जो गुलाब और मोमबत्ती दबा जाया करते थे। बात चाहे "मेरा नाम जोकर" की हो, "राम तेरी गंगा मैली" या "बौबी" की सभी ने रंगीन मिजाज लोगों की अंदर छुपी भावनाओं को जमकर तरजीह दी। फिर तो प्यार को बाहर लाने का एक नया तरीका सभी के सामने था जो सक्सेस का एक बेहतर फंडा भी साबित हुआ। लेकिन फिर भी भारतीय संस्कृति कुछ कपड़ों के साथ ही सही सुरक्षित थी। लेकिन जैसे ही 95 का दशक पूरा हुआ वैसे ही प्यार के रूप में बालीवुड को मिला एक नया हथियार और फिर तो हर नई फिल्म एक नये तड़क-भड़क वाले गाने के साथ कभी जाड़े में खटिया सरकाती तो कभी खुद गाना गाकर अपने शरीर का बखान करती पर्दे पर नजर आती। गाने भी ऐसे कि यदि घरवालों के सामने सुन लो तो आखें फाड़-फाड़ कर देख रहे बेटे को बहाना बनाकर भीतर भेजना पड़े।

जनाब बात यहीं तक रहती तो क्या गम था लेकिन अभी यह क्या कम था, जो रही सही कसर थी वह भी महेश भट्ट की नई खोज इमरान हाशमी ने पूरी कर दी जो हर फिल्म में चुंबनों की ऐसी श्रंखला बनाते हैं कि यदि फिल्म को बीच में उसी सीन से देख लिया जाये तो इसे निश्चित ही ए-ग्रेड दे दिया जाये। पर सिर्फ हाशमी थोड़े ही पूरा क्रेडिट लेने वाले थे सो एक से एक आइटम गर्ल मल्लिका, राखी, पायल समेत सभी नये धमाके उनका हाथ बँटाने चले आये हैं। और आज यही बने है बालीवुड का ट्रम्प कार्ड।

खैर अब इन्हें सुधारने में बहुत देर हो चुकी है और हम कर भी क्या सकते हैं? आज प्यार की आवाज इतनी बुलंद हो चुकी है कि हर कहीं से प्यार ही प्यार सुनाई देता है। अगर टीवी खोलो तो प्यार, मैसेज पढ़ो तो प्यार और तो और अब तो इसके वर्किंग-आवर्स भी बढ़ चुके हैं और रात में एफएम चलाओ तो भी कोई प्यार का सपोर्टर प्यार-प्यार चिल्लाता मिल ही जाता है। इसके लिये टिप्स कुछ इस प्रकार से दी जाती है मानो नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जा रहा हो। प्यार के उत्थान के लिये युवाओं के बीच एक से एक विचार विमर्श होते हैं। लगता है मानो आज ही यह पुन: अपने पुराने रूप में वापस आने वाला है लेकिन अफसोस तब होता है जब प्यार को प्रेम बनाने के लिये भाषण देने वाला युवा पार्क में खुले आसमान के नीचे अपनी प्रेमिका की जुल्फों की छाँव में लेटकर कह रहा होता है, "डार्लिंग! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।" और यह बुजुर्ग चुपचाप वहाँ से "कितना बदल गया इंसान" गाता हुआ गुजर जाता है।

9 comments:

  1. आज कल का प्यार यही हो गया है।समय के साथ साथ सब कुछ बदलता जाता है।

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  2. कितना बदल गया तक तो ठीक है कितना और बदलेगा भगवान भी नहीं जानते।

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  3. पंकज सक्सेना27 फ़रवरी 2009 को 1:57 pm

    प्रेम का बिगड़ा रूप आपने सही तरह से प्रस्तुत किया है। लेकिन आप पर मोराल-पुलिसिंग के आरोप लगने लगेंगे।

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  4. बहुत अच्छी व्याख्या की और अच्छा लेख लिखा है।

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  5. प्यार पर, यूँ कहा जे जो प्यार नहीं है उस पर इतनी सुन्दर व्याख्या!!! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद् !
    मेरे ब्लॉग पर भी आपका सादर आमंत्रण है.
    http:/kazhroad1.blogspot.com

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  6. LEKH BAHUT ACHCHHA LAGAA HAI.
    KITNAA BADAL GAYAA INSAAN !

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  7. सुन्दर आलेख
    समय सब कुछ बदल देता है और शायद संसार आज भी उतना ही नवीन है जितना यह उत्त्पति के समय होगा.. या उससे भी कहीं अधिक.

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