अब मुझे तू प्यार कर [कविता] - अमन दलाल
रचनाकार परिचय:-जज्बात पे मेरे रहम की नज़र कर,
इनायत हो, पाकीजा मेरे शामो-सहर कर,
मेरी दुआएं भी अब मुकम्मल हों!
मेरे दिल की जमीं पर ऐसी, नमाज़-ऐ-अज़र कर
फरियाद है, अब मुझे तू प्यार कर...
मेरे खवाबों को भी, रहमतें नवाज़ कर,
जेहन में मेरे भी, छोटा एक घर कर,
उस खुदा का रुतबा, और बढ़ा ज़रा
आकर आवाज़ मेरी, नई ग़ज़ल कर
फरियाद है, अब मुझे तू प्यार कर...
हो, न यकीं गर मुकद्दर पर,
भावो से मेरे अजान, वो गीता-उवाच कर,
मिसालों में कहीं रख छोड़ मुझे,
थाम ले दामन, दिल पर नज़रे-करम कर,
फरियाद है, अब मुझे तू प्यार कर...
अब मुझे तू प्यार कर...









6 comments:
जेहन में मेरे भी, छोटा एक घर कर,
bahut khoob
मेरे दिल की जमीं पर ऐसी, नमाज़-ऐ-अज़र कर
फरियाद है, अब मुझे तू प्यार कर...
kya baat kahi hai apne
सुधार की बहुत गुंज़ाइश है अभी!
मेरे दिल की जमीं पर ऐसी,
नमाज़-ऐ-अज़र कर फरियाद है,
अब मुझे तू प्यार कर...
sundar likha hai .....
बहुत सुन्दर। बधाई हो।
बहुत अच्छे अमन भाई... भाव उमड़ कर आ रहे हैं .. शब्दों से अधिक शिल्प को महत्व दें तो और सुन्दर परिणाम पाएंगे | :-)
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