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शनिवार, ६ जून २००९

पुरस्कारों की दौड़ और हिन्दी कविता [आलेख] - राम शिव मूर्ति यादव

पुरस्कारों की समाज में प्राचीनकाल से ही एक लम्बी परम्परा रही है। उत्कृष्ट व सृजनात्मक कार्य को सम्मानित-पुरस्कृत करके जहाँ सम्बन्धित व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं अन्य लोगों हेतु यह एक नजीर भी पेश करता है। पुरस्कार भावनात्मक, आर्थिक या अन्य किसी भी रूप में हो सकते हैं। सभ्यता के विकास के साथ ही पुरस्कारों के रूप, उद्देश्य व प्रयोजन में भी मात्रात्मक परिवर्तन होते गये। हिन्दी कविता भी पुरस्कारों से अछूती नहीं है। कभी-कभी तो कविता स्वयं किसी के सम्मान में कही जाती है, यहाँ पर कविता स्वयं में पुरस्कार बन जाती है। 

कविता को पुरस्कृत करना मानवीय संवेदनाओं और अनुभूतियों की पहचान को दर्शाता है। कविता कई तत्वों से संचालित होती है और आधुनिक दौर में एक तत्व पुरस्कार भी शामिल हो गया है। स्वान्त:सुखाय लिखकर पन्ने फाड़ने वाले कवि अतीत की चीज हो गये हैं, अब तो कविता बाकायदा लिखी ही नहीं जाती, बल्कि प्रायोजित भी की जाती है। आज की कविता स्वानुभूति मात्र नहीं होती बल्कि इसमें सहानुभूति का तत्व भी जुड़ गया है। कविता संवेदनाओं, स्वानुभूति और सहानुभूति की त्रिविलि में एक बाजार तैयार करती है। बाजार की इस दौड़ में कविता की पहचान सिर्फ पाठक और श्रोता ही नहीं बल्कि पुरस्कार और सम्मान भी निर्धारित करते हैं।
साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-
श्री राम शिवमूर्ति यादव समाज शास्त्र में काशी विद्यापीठ वाराणसी से स्नातकोतर हैं तथा देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनकी रचनायें छपती रही हैं| बेव पर इनकी रचनायें साहित्य कुंज, रचनाकार, हिन्दी नेस्ट, स्वर्गविभा, कथाव्यथा, वांग्मय पत्रिका पर उपलब्ध हैं| सामाजिक व्यवस्था एंव आरक्षण (१९९०) प्रकाशित हो चुकी है तथा लेखों का एक अन्य संग्रह प्रेस में है|

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा "ज्योतिवा फुले फ़ेलोशिप सम्मान" से सम्मानित तथा राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भारती ज्योति" से सम्मानित।

सम्प्रति: उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृति के पश्चात स्वतन्त्र लेखन व अध्ययन एंव समाज सेवा|

हिन्दी कविता में आज पुरस्कारों की भीड़ सी हो गई है और इसे लेने वालों में भी होड़ मची है। कभी पुरस्कारों की राजनीति राजधानियों में ही दिखती थी परन्तु अब तो लगता है कि पुरस्कारों का भी विकेन्द्रीकरण हो गया है। राजधानियों से ज्यादा साहित्यिक संस्थायें तेजी से उभरते नगरों और कस्बों में विद्यमान हैं। इन संस्थाओं के लिए पुरस्कार एक ऐसी वस्तु के समान है, जिसके माध्यम से वे लोगों को सम्मानित कर स्वयं उपकृत होते हैं, कारण इनके पीछे लोगों से प्राप्त धनराशि। वस्तुत: पुरस्कार बटुये में रखे उन सिक्कों की तरह हो गये हैं, जिन्हें किसी मंदिर में चढ़ाकर ईश्वर को सम्मानित किया जाता है, परन्तु इसके पीछे अपनी दानशीलता का ढिंढोरा पीटकर स्वयं को सम्माननीय बनाने की भावना छुपी होती है।

पुरस्कारों की दौड़ ने हिन्दी कविता को कोई सार्थक लाभ तो नहीं पहुँचाया परन्तु इसकी ओट में तमाम व्यक्ति, संस्थायें एवं शासन-प्रशासन में पदासीन लोग अवश्य लाभान्वित हो रहे हैं। आज पुरस्कार लोगों की हैसियत के आधार पर बँटने लगे हैं, जितना बड़ा नाम उतना बड़ा पुरस्कार। सरकारी संस्थाओं द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों में जाति, धर्म, क्षेत्र व सत्ताधारी दल की राजनीति इतनी बुरी तरह पैठ कर गई है कि एक बारगी सोचना पड़ता है कि इस सम्मान से साहित्य का कोई उद्धार होगा भी या नहीं। किसी ने क्या खूब कहा भी है कि उस पुरस्कार या सम्मान का कोई अर्थ नहीं, जिससे हिन्दी साहित्य की कोई कोंपल भी नहीं हिले।

पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर ही पढ़ने को मिल जाता है कि अमुक साहित्यकार किसी रोग से ग्रस्त होकर अपने अन्तिम दिन गिन रहा है और साहित्य के नाम पर रोटी सेंकने वाले मठाधीश और सरकार को उसका हाल-चाल लेने की फुर्सत ही नहीं। गौर कीजिए, जब कोई राजनैतिक व्यक्ति अस्पताल में भर्ती होता है तो सुबह से शाम तक उससे मिलने वालों की भीड़ लगी रहती है, इसमें उसके विरोधी राजनैतिक दल के भी शीर्ष नेता शामिल होते हैं। इसे चाहे राजनेताओं की एकता कहें या अवसरवादिता, दुर्भाग्यवश साहित्य के क्षेत्र में यह नजारा विरले ही मिलता है। शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाह खान की प्रतिभा की दुनिया कायल है, परन्तु जीवन के अन्तिम दिनों में जिस तरह से अपने बेटे के लिए उन्होंने एक अदद सरकारी नौकरी की सरकार से अपेक्षा की, वह इस देश की साहित्य-कला-संस्कृति का चेहरा दिखाने के लिए काफी है। असलियत यही है कि जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी सृजन में लगा दी, उनकी कोई पूछ तक नहीं जबकि राजधानियों में रहकर येन-केन-प्रकारेण तमाम सम्मानों व पुरस्कारों से नवाजे जाते लोग, विभिन्न अकादमियों में बिठाये गये लोग या साहित्य-कला-संस्कृति के नाम पर सरकारी धन पर विदेशों की सैर करते लोगों के अवदान का मूल्यांकन किया जाय तो जो सच्चाई सामने आयेगी, वह समाज को आईना दिखाने के लिए काफी है।

हम यह भूल जाते हैं कि भारत गाँवों का देश है। ग्रामीण स्तर पर जितनी प्रतिभायें सीमित संसाधनों के साथ आगे बढ़ रही हैं, यदि उन्हें समुचित मार्गदर्शन व संसाधन उपलब्ध कराये जायें तो साहित्य के क्षेत्र में तमाम नये प्रतिमान स्थापित हो सकते हैं। सवाल यह है कि यह कार्य कौन करेगा? एक व्यवस्था के तहत यह किसी व्यक्ति के बलबूते की बात नहीं। अन्तत: बात सरकार के पाले में जाती है, जहाँ वो लोग बैठे हैं जो अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने का गुमान पाले हुए हैं। ऐसे में उनसे ऐसे किसी रचनात्मक कदम की उम्मीद रखना व्यर्थ ही है।

हिन्दी कविताएं लिखी जाती रही है और लिखी जाती रहेंगी। कोई भी पुरस्कार या सम्मान कविता की आवाज को तात्कालिक रूप से भले ही दबा ले, पर कविता पुन: अपनी जीवटता के साथ खड़ी हो जाती है। यह अनायास ही नहीं है कि तमाम क्रान्तियों से पहले कविताओं के द्वारा लोगों को जागृत किया जाता है। पुरस्कार कविता की तकदीर नहीं लिखते पर इतना अवश्य है कि क्षणिक रूप में ही सही वे उसे प्रोत्साहन देते हैं। ऐसे में यदि प्रोत्साहन ही गलत लोगों को मिलने लगे तो सार्थक कविता कहाँ से उभरेगी? पुरस्कारों की राजनीति बन्द होनी चाहिए और उन्हें ही पुरस्कृत करना चाहिए, जो वाकई इसके हकदार हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य-कला-संस्कृति किसी भी समाज की रीढ़ हैं और यदि रीढ़ को ही कमजोर करने की कोशिशें की जायेंगी तो इस पर आधारित किसी भी समाज को भहराने में देरी नहीं लगेगी।

14 comments:

Dr. Brajesh Swaroop २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

वर्तमान दौर में पुरस्कारों की दौड़ और होड़ पर बेहद सारगर्भित लेख.

बाजीगर २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

ग्रामीण स्तर पर जितनी प्रतिभायें सीमित संसाधनों के साथ आगे बढ़ रही हैं, यदि उन्हें समुचित मार्गदर्शन व संसाधन उपलब्ध कराये जायें तो साहित्य के क्षेत्र में तमाम नये प्रतिमान स्थापित हो सकते हैं। सवाल यह है कि यह कार्य कौन करेगा?
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वाकई यादव जी ने एक गूढ़ प्रश्न उठाया है. इस पर विचार करने की जरुरत है.

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

बहुत खूब. आपने तो हिंदी में पुरस्कारों के नाम पर मठाधीशी कर रहे लोगों को नंगा कर दिया.

KK Yadav २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

पुरस्कारों की राजनीति बन्द होनी चाहिए और उन्हें ही पुरस्कृत करना चाहिए, जो वाकई इसके हकदार हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य-कला-संस्कृति किसी भी समाज की रीढ़ हैं और यदि रीढ़ को ही कमजोर करने की कोशिशें की जायेंगी तो इस पर आधारित किसी भी समाज को भहराने में देरी नहीं लगेगी।
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इस लेख के बहाने आपने समाज की कमजोर नब्ज पर हाथ रखा है. काश कि समाज के पहरुए इससे कुछ सीख लेते.

बाजीगर २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

ग्रामीण स्तर पर जितनी प्रतिभायें सीमित संसाधनों के साथ आगे बढ़ रही हैं, यदि उन्हें समुचित मार्गदर्शन व संसाधन उपलब्ध कराये जायें तो साहित्य के क्षेत्र में तमाम नये प्रतिमान स्थापित हो सकते हैं। सवाल यह है कि यह कार्य कौन करेगा?
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वाकई यादव जी ने एक गूढ़ प्रश्न उठाया है. इस पर विचार करने की जरुरत है.

Ratnesh २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
Ghanshyam २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

कभी-कभी तो कविता स्वयं किसी के सम्मान में कही जाती है, यहाँ पर कविता स्वयं में पुरस्कार बन जाती है...........बात तो लाख टके की है. पर इसके लिए भावनाएं भी होनी चाहिए.

डाकिया बाबू २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

Nice Article...Congts.

आकांक्षा~Akanksha २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

हिंदी साहित्य ही क्यों हर जगह पुरस्कारों की अंधी दौड़ है. इसमें आम आदमी से लेकर बड़े नाम तक शामिल हैं. यहाँ तक की भारत-रत्न से लेकर पद्म पुरस्कार तक पर प्रश्न लगते रहते हैं ??

Rashmi Singh २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

कभी पुरस्कारों की राजनीति राजधानियों में ही दिखती थी परन्तु अब तो लगता है कि पुरस्कारों का भी विकेन्द्रीकरण हो गया है। राजधानियों से ज्यादा साहित्यिक संस्थायें तेजी से उभरते नगरों और कस्बों में विद्यमान हैं। .....सही फ़रमाया आपने. इस विकेन्द्रीकरण ने तो सम्मानों की लुटिया डुबोकर रख दी है. हर कोई आपने गले में सम्मानों की माला लटकाए घूम रहा है.

युवा २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

युवा पीढी को ऐसे चाटुकारिता वाले पुरस्कारों से सावधान रहने की जरुरत है.

डाकिया बाबू २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

Nice Article...Congts.

शरद कुमार २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  

पिछले दिनों विजिटिंग कार्ड पर साहित्य-महापोध्याय लिखे एक सज्जन से मुलाकात हुयी. मैंने सोचा किसी विश्वविद्यालय की डिग्री होगी, पर बातों-बातों में पता चला एक स्थानीय संस्था ने उन्हें यह तथाकथित सम्मान प्रदान किया है....ऐसे सम्मानों पर हंसी भी आती है और विक्षोभ भी होता है. आपका लेख पढ़कर याद ताजी हो गई, सो यहाँ जिक्र कर रहा हूँ...इस सुन्दर आलेख के लिए आपको साधुवाद.

युवा २३ नवम्बर २००९ ७:१० PM  
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.

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