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रचनाकार परिचय:-


१९५६ में कोण्डागांव (बस्तर) में जन्मी श्रीमती शकुंतला तरार एक वरिष्ठ कवयित्री और स्वतंत्र पत्रकार हैं। "बस्तर का क्रांतिवीर- गुण्डाधुर", "बस्तर की लोककथायें" आदि कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। हल्बी भाषा में इनकी हाइकू रचनाओं का एक संग्रह भी प्रकाशित है।

पहाड़ों के बीच से निकलती है
इक नदी
निस्छल,
निर्मल
शीतल जलधारा लिये
अपनी मौज में वह बहती जाती है
तट पर आये लोगों को
अपनी शीतलता से ठंडक पहुंचाती

ठीक उसी तरह वह भी
जीवन की कुटिलता से परे
उन्मुक्त,निर्द्वन्द्व
निष्कपट भाव से निकलती है घर से
तो
न जाने कितने लोगों की आंखों को
पहुंचाती है ठंडक
कुछ की आंखों में
उसकी खूबसूरती की प्रशंसा
कुछ की या ज्यादा की आंखें
वासनामयी
परन्तु उसे इन सबसे, कोई सरोकार नहीं
वह चलती जाती राह अपनी

वह जा रही है देखो
अरे भई कहां ?
महुआ बीनने,
नशा यहां तीन गुना हो गया है
मदमाता यौवन,
महुआ,
और वसन्त
तीनों ने
जीवन को
नई अभिव्यक्ति दी है
मानो।

9 comments:

  1. चित्र खींचती हुई कविता है मंत्रमुग्ध हो गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी कविता, बधाई। स्वागत साहित्य शिल्पी पर।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ठीक है |
    सच कहूँ तो आप का परिचय पढ़ आपसे और उम्मीद करता हूँ |

    कुछ और बेहतर भेजिए तो और मजा आये |

    अवनीश तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  4. वह जा रही है देखो
    अरे भई कहां ?
    महुआ बीनने,
    नशा यहां तीन गुना हो गया है
    मदमाता यौवन,
    महुआ,
    और वसन्त
    तीनों ने
    जीवन को
    नई अभिव्यक्ति दी है

    प्रभावी अभिव्यक्ति है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. नमस्कार शकुन्तला जीएक भुत ही सुन्दर रचना है ,,, जीवन की सच्चाई को जिस तरह से आप ने नदी के माध्यम से व्यक्त किया है बेहतरीन है , एक शिक्षा प्रद कविता है जो ये सिखाती है , की जीवन में निर्बाध गति से बढ़ते रहो जीवन में आयी चमक दमक को स्थायी न समझ कर , और आये दुखो को भी अस्थाई मान कर जीवन के पथ पर बढ़ते चलो इस पथ पर अगर लोग तुमारी बुराईया या अच्छाईयो को बाधा चढा कर भी कहे तो उनसे बिना प्रभावित हुए बढ़ते रहो अपने लक्ष पे एक नदी की भाति
    मेरा प्रणाम स्वीकार करे
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

    उत्तर देंहटाएं
  6. तुलना को नये अर्थ प्रदान करती
    एक बेहतरीन ताजा प्रस्‍तुति
    कवयित्री को बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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