कुछ क्षणिकायें [कविता] - देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
निकम्मा
मत धोना चेहरा अपना,
रास्ते की धूल और पसीना...
चिपका रहने देना।
हो सके तो लगा लेना कुछ और कालिख...
ये लोग निकम्मा कहते हैं...
रचनाकार परिचय:-सीख
इस बार मत दिखाना चीरकर अपना सीना...
मत बताना कि जी नहीं सकोगे उसके बिना...
या बताना भी तो...
थोड़ा-थोड़ा।
मुझे तो ये जमाना बंदर की तरह नचाता है...
श्श्श्श
एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
गर्द-मिट्टी-धूल
सालों ने नहीं उठा, नहीं धुला
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।
श्श्श्श-2
चुप...
बोलना मत कुछ...
चुपचाप निकल जाना...
पैर बचाकर।
और आंखें..?
उन्हें भी मत देखने देना कुछ
देखोगे तो लोग दीवाना कहेंगे...
बोलोगे तो पागल कहलाओगे।
दीवानों और पागलों को पत्थर मारते हैं लोग।









14 टिप्पणियाँ:
भई वाह!
एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
गर्द-मिट्टी-धूल
सालों ने नहीं उठा, नहीं धुला
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।
बहुत खूब।
बहुत अच्छी क्षणिकायें, बधाई।
देवेश भाई का अपना एक हस्ताक्षर है जो कि इतनी कम उम्र में कम ही कवियों में दीखता है ... कविताओं में एक आक्रामकता एक व्यंग्य है जो काफी प्रभावी है ... बैक स्लैप काफी तीखा है ... बहुत सुन्दर ....
गहरी क्षणिकायें हैं, सभी बेहतरीन।
इस सुन्दर क्षणिकाओं के लिए बधाई!
ताजगी है क्षणिकाओं में।
देवेश जी बहुत बेहतरीन इतनी मर्म स्पर्शी रचना के लिए आप का बहुत बहुत धन्यबाद
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084
एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
गर्द-मिट्टी-धूल
सालों ने नहीं उठा, नहीं धुला
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।
बहुत अच्छी क्षणिकायें...
बधाई.....
बढ़िया लिखा है भाई।
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सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।
सभी क्षणिकायें गम्भीर हैं ... उपरोक्त पंक्तियों ने विशेष प्रभावित किया.
बहुत बढिया क्षणिकाएं हैं बधाई।
sari chhadikayen achchhi hain .soch aur shbd snyojan bahut khoob hai
rachana
बढ़िया क्षणिकाएं..
एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
तथा
देखोगे तो लोग दीवाना कहेंगे...
बोलोगे तो पागल कहलाओगे।
दीवानों और पागलों को पत्थर मारते हैं लोग।
क्या खूब कहा है...
बहुत -बहुत बधाई!
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