हमारी आज़ादी और तीन गीत - देवमणि पाण्डेय
रचनाकार परिचय:-हर दिन सूरज उम्मीदों का नया सवेरा लाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है
बरसों बीते फिर भी बस्ती
अँधकार में डूबी है
कभी-कभी लगता है जैसे
यह आज़ादी झूठी है
आँखों का हर ख़्वाब अचानक अश्कों में ढल जाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है
हाथ बँधे है अब नेकी के
सच के मुँह पर ताला है
मक्कारों का डंका बजता
चारों तरफ़ घोटाला है
खरा दुखी है खोटा लेकिन हर सिक्का चल जाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है
देश की ख़ुशहाली में शामिल
आख़िर ख़ून सभी का है
मगर है लाठी हाथ में जिसके
हर क़ानून उसी का है
वही करें मंजूर सभी जो ताक़तवर फरमाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है
जनतंत्र में आम आदमी (2)
रोज़ सुबह उगता है सूरज शाम ढले छुप जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है
दर-दर ठोकर खाए जवानी
कोई काम नहीं मिलता
आज भी मेहनत-मज़दूरी का
पूरा दाम नहीं मिलता
कौन हवस का मारा है जो हक़ सबका खा जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है
क्या बतलाएं स्वप्न सुहाने
जैसे कोई लूट गया
मँहगाई के बोझ से दबकर
हर इक इन्सां टूट गया
रोज़ ग़रीबी-बदहाली का साया बढ़ता जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है
किसे पता कब देश में अपने
ऐसा भी दिन आएगा
काम मिलेगा जब हाथों को
हर चेहरा मुस्काएगा
आज तो ये आलम है बचपन भूखा ही सो जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है
जनतंत्र में आम आदमी (3)
दुनिया बदली मगर अभी तक बैठे हैं अँधियारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में
हर ऊँची दहलीज़ के भीतर
छुपा हुआ है धन काला
घूम रहे बेख़ौफ़ सभी वो
करते हैं जो घोटाला
कर्णधार समझे हम जिनको शामिल हैं बटमारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में
जो सच्चे हैं वो चुनाव में
टिकट तलक न पाते हैं
मगर इलेक्शन जीत के झूठे
मंत्री तक बन जाते हैं
जिन पर हमको नाज़ था वो भी खड़े हुए लाचारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में
जिनके मन काले हैं उनके
तन पर है उजली खादी
भ्रष्टाचार में डूब गए जो
बोल रहे हैं जय गाँधी
ऐसे ही चेहरे दिखते हैं रोज सुबह अख़बारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में









12 comments:
किसे पता कब देश में अपने
ऐसा भी दिन आएगा
काम मिलेगा जब हाथों को
हर चेहरा मुस्काएगा
आज तो ये आलम है बचपन भूखा ही सो जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है
तीनों ही गीत आजादी को सार्थक बनाने की आवश्यकता बयान कर रहे हैं।
देवमणि जी आपके गीत हृदयस्पर्शी हैं।
Dil ko chhute geet.
ऐसे ही चेहरे दिखते हैं रोज सुबह अख़बारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में
विचारों और उर्जा से भरी हुई कवितायें।
सच का आईना दिखलाती हुई रचनायें. आभार
कर्णधार समझे हम जिनको शामिल हैं बटमारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में
सभी अच्छी रचनायें।
मेरी निजी सोच, स्वाद और पसंद के गीत पढ कर अच्छा लगा. बहुत दिनों बाद ऐसा पढा. जन- गण- और मन को तलाशती आपकी रचनाएं बहत वजनदार हैं. आपको उत्तम रचनाओं के लिये बधाई...
सार्थक रचनाकर्म हेतु बधाई.
Pandey ji
Namaskaar.
Bahut khoob.
Teen kavitayen nahi yeh ek granth likha h aapne.
If you permit then I will like to send these poem to P.M. and President of India.
Also to the Governor of my state Haryana.
They must know.
Thanks
Provide email facility.
Thnaks again
Ramesh Sachdeva
[email protected]
bahut sundar....
man ko choo gayeen...
.badhaee aapko
वो गीत जो मन में सीधे उतर जायें..आभार
कविताओं में जीवन-वास्तव का सही चित्रण हुआ है।
कविताएँ मार्मिक हैं। प्राजंल अभिव्यक्ति देखकर लगता है, हिन्दी में कविता वापस आ रही है।
*महेंद्रभटनागर, ग्वालियर — २
फ़ोन : ०७५१-४०९२९०८
एक टिप्पणी भेजें