दाल ने मुर्गी को पछाड़ा [व्यंग्य] - अविनाश वाचस्पति
रचनाकार परिचय:-पहले दे दाल में पानी मुहावरे काफी प्रचलन में रहे हैं। जूतियों में दाल बंटना ने दाल को दलित श्रेणी में शुमार कर दिया था परन्तु अब दालों का दाना दाना दमदार हो गया है। किसी की क्या मजाल कि जो इनकी शान में, इनके टूटे दाने के बारे में भी हल्की ब्यानबाजी कर सके। जो भी ऐसा करने की सोचेगा उसकी पूरी की पूरी बाजी उलट जाएगी। कह सकते हैं कि दालों के रेट बढ़ने से बहुत ही आवश्यक वस्तुओं के रेट भी बढ़े जा रहे हैं। दालों के रेट अपने आप बढ़ रहे हैं यह स्वंयभूत ऐसी प्रक्रिया है जो इससे जुड़े लोगों का उनके जीवन में ही भूत बना रही है। जबकि ये सब जानते हैं कि भूत न दाल खाते हैं न भात पर जो अपने जीवन में दाल भात न खा पाएं वे अवश्य भूत बनते हैं। ऐसी कई प्रमाण मिले हैं।
दालों की कीमतों को बिना धक्का दिए ही बढ़ने में जा आनंद आ रहा है, वो अनुभूत है पर दुखद है। वैसे एक सच्चाई जान लें कि एक व्यक्ति कितनी दाल खाता है, रेट बढ़ने के बाद तो मुट्ठी भर दाल भी नहीं खा पाता है। एक मुट्ठी दाल पूरे परिवार के लिए काफी हो रही है जबकि रेट बढ़ने से पहले दो या तीन मुट्ठी में काम चल रहा होगा। वो तो पानी भी खुलकर नहीं मिल रहा है नहीं तो दाल में पानी दे देकर काफी अतिथियों तक निबटाया जाता रहा है। आपने सुना ही होगा तीन बुलाए तेरह आए और बुलाने वाले को अपनी तेरहवीं नहीं करवानी है तो दे दाल में पानी। पर आजकल पानी भी जान पड़ता है, हड़ताल पर है। जहां होना चाहिए वहां नहीं होता और जहां नहीं होना चाहिए वहां भरपूर होता है। दाल और पानी में यही भेद है। आप चाहें तो दाल को अधिक दाम देकर अपना बना सकते हैं, गोदामों में बसा सकते हैं पर अगर आपने पानी के साथ ऐसा किया तो वो जरूर आपको डुबा ही देगा, या कह सकते हैं कि डुबाकर ही मानेगा।
अब ये सलाह दी जा सकती है दालों को दिल पर न लें। इससे दिल का खतरा बढ़ रहा है। जल्द ही दालों का खाना डॉक्टरों द्वारा सलाहा जाएगा। आप सिर्फ पांच दाने मूंग की दाल का दिन में एक बार सेवन करें अथवा आपके नेत्रों की ज्योति के विकास के लिए दिन में तीन बार अरहर की 100 ग्राम कच्ची दाल का दर्शन मुफीद रहेगा। अभी अरहर में अरहरापन आया है। जल्दी ही चने की दाल में चनापन (कड़ापन), मसूर की दाल (कसूरवार) बनाएंगी। अवाम को इनसे न उलझने की चेतावनी दी जाती है।
और साज सज्जा वाले चिल्ला चिल्लाकर कहेंगे कि उबले चावलों के उपर दस दाने अरहर के सजाने से जो अरहरापन आ जाता है। वो सोने के हार में रत्नों के पचास नग सजाने में भी नहीं आता। इसलिए दाल अब दलित नहीं रही। दाल स्वर्णता को प्राप्त हो चुकी है और इसे इसके वर्तमान सिंहासन से उतारना किसी के बूते की बात नहीं और यही अरहरापन लुभा गया है मुझको।





13 comments:
सही भी है मुर्गी से मंहगी दाल है भैय्या
दाल ने मुर्गी को नहा पछाड़ा बल्कि
मुर्गी ने दाल को पछाड़ दिया।
बधाई।
दाल ऐसा शेयर बन चुकी है जिसकी कीमत गिरती नहीं है और काबू में नहीं आ रही है....Mano dal nahin Swine-flu ho gai ho...bahut khub Avinash ji...majedar likha.
महिमा अनंत दाल की ....
Nice one.
Alok Kataria
मजेदार..अब तो लोग कहेंगे की घर की मुर्गी दाल बराबर,
वाह रे महंगाई कहावत भी बदल कर रख दी...
बढ़िया लेख..बधाई!!!
"दाने-दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम"...
ब इस पुरानी कहावत के असलियत में सच होने का समय आ गया है...
दर असल ये हो इतनी मँहगी गई है कि वो दिन दूर नहीं जब कोटा सिस्तम के तहत एक आदमी को दाल का एक दाना दिया जाएगा और उस दाने पे धोखे से कोई दूसरा लंपट कब्ज़ा ना जमा ले...इसलिए हर दाने पे उसके मालिक का नाम गुदवाया जाएगा...
तभी असल में ये पुरानी कहावत सत्यापित होगी कि..."दाने दाने पे लिखा है उसे खाने वाले का नाम"....
bahut khoob.....kya baat hai....
sundar......
kya kahen kuch kaha jaata naheen
daal bin bhee to raha jaata naheen
सचमुच मँहगायी अब चिंताजनक स्तर तक पहुँच गयी है। उसपर सबसे बडी शर्म है कि नेताओं को उन राज्यों में मँहगायी कम करने के चिंता है जहाँ चुनाव होने वाले हैं। शर्म खादी चमडी वालों को पता नहीं कब आयेगी।
आह... अरहर की दाल .. और वह भी अविनाश जी के लेख में .... क्यों जले पर नमक छिड़्कते हैं मित्रवर ... आह
- वाह अविनाश जी !
आपका व्यंग्य तो जानदार है ही , यहां जो आपकी फोटो खींचकर लगायी गयी वह भी कम शानदार नहीं है।भाई अविनाश जी। थोड़ी और लम्बी की जाती तो और भी मजा आ जाता।
sabka ek din aa hi jaata hai ki surkhiyon men pahunch jata hai aaj bari daal ki hai kaha gaya hai ghoore ke bhi din phirate hain to koi nayee baat nahi hai agar lahasun pyaaj chini aadi ka wakt aa sakata hai to daal ko mauka mila hai to itana hangama kyon ho raha hai
sabka ek din aa hi jaata hai ki surkhiyon men pahunch jata hai aaj bari daal ki hai kaha gaya hai ghoore ke bhi din phirate hain to koi nayee baat nahi hai agar lahasun pyaaj chini aadi ka wakt aa sakata hai to daal ko mauka mila hai to itana hangama kyon ho raha hai
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