Photobucket

प्रियतम की यादों से अलंकृत
उसकी पग-ध्वनि से आंदोलित
मन-वीणा की तारें झंकृत
होकर प्रिय को पास बुलातीं
आँखें तब आँसू भर लातीं

रचनाकार परिचय:-


अजय यादव अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा आपकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।

आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं

सांसारिक कार्यों से बोझिल
दिन भर हँसते हैं सबसे मिल
हृदय टूटता रहता तिल-तिल
रातें दाह और भड़कातीं
आँखें तब आँसू भर लातीं

खिली चाँदनी है अंबर में
दीप प्रकाशित हैं घर-घर में
लेकिन मेरे कातर उर में
दुख की अंधियारी गहराती
आँखें तब आँसू भर लातीं

17 comments:

  1. खिली चाँदनी है अंबर में
    दीप प्रकाशित हैं घर-घर में
    लेकिन मेरे कातर उर में
    दुख की अंधियारी गहराती
    आँखें तब आँसू भर लातीं

    बहुत खूब। छायावा की छाप है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह अजय!! बहुत खूब प्रयास है. बहुत शुभकामना!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. Nice Poem. Thanks.

    Alok Kataria

    उत्तर देंहटाएं
  4. अजय जी भाषा और काव्य सौष्ठव की दृष्टि से कविता बार बार पढी जा सकती है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी कविता या कहूँ कविता जैसी कविता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. "आँखे तब आँसू भर लाती"
    बहुत सुन्दर अजय जी।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी कविता अजय जी, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी श्रंगार रस की प्रस्तुति है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह !! काव्य सौन्दर्य ने मुग्ध कर लिया ...बहुत बहुत सुन्दर कविता....

    उत्तर देंहटाएं
  10. पंकज सक्सेना21 मई 2009 को 4:59 pm

    बहुत खूब। भीतर उतर कर कविता लिखी है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. प्यार और विरह के भावों से सजी सुन्दर कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  12. एक मीठा , सुन्दर गीत है |
    बधाई |

    अवनीश तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  13. विरह की वेदना से परिपूर्ण रचना...

    बधाई ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. ajay ji , aap jab bhi likhate ho , bus kaamal ka hi likhte ho .. prem ras me doobi hui ye rachna , prem aur vurah ke bhaavo ko kitni acchi tarah se ujagar karti hai ..

    bhai , do baar padh chuka hoon , maza aa gaya
    meri dil se badhai sweekar karen ...

    vijay

    उत्तर देंहटाएं
  15. कवि का नाम भूल गया हूं- किसी कवि सम्मेलन में सुना था- बोल याद रह गए हैं- भावसाम्य के रूप में वही लिख रहा हूं-

    ना रही वो बात, ना मौसम रहा
    साथ खुशियों का बहुत ही कम रहा...
    हर तरफ से चोट ही खाने लगे,
    क्या करें, तब गीत हम गाने लगे...

    आपको पढ़ता हूं तो जयशंकर याद आते हैं, क्यों ये पता नहीं...
    सादर,
    खबरी
    http://deveshkhabri.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  16. खिली चाँदनी है अंबर में
    दीप प्रकाशित हैं घर-घर में

    गीत की तरह लय और छंद में, सुर और ताल में गाया जा सकता है ये मधुर गीत..............लाजवाब है अजय जी

    उत्तर देंहटाएं

आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

पुस्तकालय

~~~ साहित्य शिल्पी का पुस्तकालय निरंतर समृद्ध हो रहा है। इन्हें आप हमारी साईट से सीधे डाउनलोड कर के पढ सकते हैं ~~~~~~~

डाउनलोड करने के लिए चित्र पर क्लिक करें...

आइये कारवां बनायें...

साहित्य शिल्पी, हिन्दी और साहित्य की सेवा का मंच, एक ऐसा अभियान.. जो न केवल स्थापित एवं नवीन रचनाकारों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा अपितु अंतर्जाल पर हिन्दी के प्रयोग और प्रोत्साहन का एक अभिनव सोपान भी है, अपने सुधी पाठको के समक्ष कविता, कहानी, लघुकथा, नाटक, व्यंग्य, कार्टून, समालोचना तथा सामयिक विषयो पर परिचर्चाओं के साथ साहित्य शिल्पी समूह आपके समक्ष उपस्थित है। यदि राष्ट्रभाषा हिदी की प्रगति के लिए समर्पित इस अभियान में आप भी सहयोग देना चाहते हैं तो अपना परिचय, तस्वीर एवं कुछ रचनायें हमें निम्नलिखित ई-मेल पते पर प्रेषित करें।
sahityashilpi@gmail.com
आइये कारवां बनायें...

Followers

Google+ Followers

Get widget