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गुरुवार, २१ मई २००९

आँखें तब आँसू भर लातीं [कविता] - अजय यादव


प्रियतम की यादों से अलंकृत
उसकी पग-ध्वनि से आंदोलित
मन-वीणा की तारें झंकृत
होकर प्रिय को पास बुलातीं
आँखें तब आँसू भर लातीं

रचनाकार परिचय:-

अजय यादव अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा आपकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।

आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं

सांसारिक कार्यों से बोझिल
दिन भर हँसते हैं सबसे मिल
हृदय टूटता रहता तिल-तिल
रातें दाह और भड़कातीं
आँखें तब आँसू भर लातीं

खिली चाँदनी है अंबर में
दीप प्रकाशित हैं घर-घर में
लेकिन मेरे कातर उर में
दुख की अंधियारी गहराती
आँखें तब आँसू भर लातीं

17 टिप्पणियाँ:

अनिल कुमार May 21, 2009 7:03 AM  

खिली चाँदनी है अंबर में
दीप प्रकाशित हैं घर-घर में
लेकिन मेरे कातर उर में
दुख की अंधियारी गहराती
आँखें तब आँसू भर लातीं

बहुत खूब। छायावा की छाप है।

Udan Tashtari May 21, 2009 7:35 AM  

वाह अजय!! बहुत खूब प्रयास है. बहुत शुभकामना!!

बेनामी May 21, 2009 7:56 AM  

Nice Poem. Thanks.

Alok Kataria

अनन्या May 21, 2009 8:48 AM  

अजय जी भाषा और काव्य सौष्ठव की दृष्टि से कविता बार बार पढी जा सकती है।

अभिषेक सागर May 21, 2009 12:52 PM  

बहुत अच्छी कविता अजय जी, बधाई।

nitesh May 21, 2009 12:32 PM  

"आँखे तब आँसू भर लाती"
बहुत सुन्दर अजय जी।

रंजना May 21, 2009 3:50 PM  

वाह !! काव्य सौन्दर्य ने मुग्ध कर लिया ...बहुत बहुत सुन्दर कविता....

दृष्टिकोण May 21, 2009 11:15 AM  

बहुत अच्छी कविता या कहूँ कविता जैसी कविता है।

निधि अग्रवाल May 21, 2009 1:32 PM  

बहुत अच्छी श्रंगार रस की प्रस्तुति है।

पंकज सक्सेना May 21, 2009 4:59 PM  

बहुत खूब। भीतर उतर कर कविता लिखी है।

मोहिन्दर कुमार May 21, 2009 5:16 PM  

प्यार और विरह के भावों से सजी सुन्दर कविता.

अवनीश एस तिवारी May 21, 2009 6:23 PM  

एक मीठा , सुन्दर गीत है |
बधाई |

अवनीश तिवारी

Suman May 21, 2009 10:15 PM  

good

राजीव तनेजा May 22, 2009 7:18 AM  

विरह की वेदना से परिपूर्ण रचना...

बधाई ....

Vijay Kumar Sappatti May 22, 2009 1:06 PM  

ajay ji , aap jab bhi likhate ho , bus kaamal ka hi likhte ho .. prem ras me doobi hui ye rachna , prem aur vurah ke bhaavo ko kitni acchi tarah se ujagar karti hai ..

bhai , do baar padh chuka hoon , maza aa gaya
meri dil se badhai sweekar karen ...

vijay

देवेश वशिष्ठ ' खबरी ' May 23, 2009 6:35 AM  

कवि का नाम भूल गया हूं- किसी कवि सम्मेलन में सुना था- बोल याद रह गए हैं- भावसाम्य के रूप में वही लिख रहा हूं-

ना रही वो बात, ना मौसम रहा
साथ खुशियों का बहुत ही कम रहा...
हर तरफ से चोट ही खाने लगे,
क्या करें, तब गीत हम गाने लगे...

आपको पढ़ता हूं तो जयशंकर याद आते हैं, क्यों ये पता नहीं...
सादर,
खबरी
http://deveshkhabri.blogspot.com/

दिगम्बर नासवा May 27, 2009 5:18 PM  

खिली चाँदनी है अंबर में
दीप प्रकाशित हैं घर-घर में

गीत की तरह लय और छंद में, सुर और ताल में गाया जा सकता है ये मधुर गीत..............लाजवाब है अजय जी

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': अलंकार दृष्टान्त को जानें, लें आनंद -काव्य का रचना शास्त्र: ३९,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
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विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-
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