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बुधवार, १ जुलाई २००९

विशेषोक्ति कम ही मिले [काव्य का रचना-शास्त्र: १७] - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

कारण तो रहता मगर, कार्य न होता मीत.
जहाँ विशेषोक्ति वहीं, 'सलिल' अनूठी रीत..

कारण की चर्चा मिले, मगर अचर्चित कार्य.
'सलिल' विशेषोक्ति उसे, कहते काव्याचार्य..


साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।

उदाहरण :

१. नैहिन नैनन को कछु,
उपजी बड़ी बलाय.
नीर भरे नित प्रति रहे,
तऊ न प्यास बुझाय, ..

यहाँ नयनों में नीर भरा हुआ बताये जाने पर भी प्यास नहीं बुझ रही. प्यास बुझाने का कारण पानी होने पर भी प्यास बुझाने का कार्य न होने से विशेषोक्ति अलंकार है.

२. फूलहिं फलहिं न बेंत,
जदपि सुधा बरसहिं जलद.
मूरख ह्रदय न चेत,
जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम..

जल रुपी अमृत की वर्षा होने पर फलना-फूलना स्वाभाविक है, जो नहीं हो रहा. ब्रम्हा जैसा गुरु (कारण) होने पर चेतना जागना (कार्य) चाहिए पर मूर्ख की चेतना नहीं जाग रही, अतः यहाँ विशेषोक्ति अलंकार है.

३. जनता चुनती है मगर,
प्रतिनिधि मिले न एक.
जैसे नीति बना रहे,
नेता बिना विवेक.. -- सलिल

४. तू मिटा रही है खुद को,
करीब माझी खडे हैं
--श्रीमती सुधा भार्गव

५.विशेषोक्ति कम ही मिले, खोजें-पायें आप.
ज्यों दिनकर हो दिन न हो, माप मगर बिन माप..

11 comments:

निधि अग्रवाल २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

सलिल जी आपके द्वारा कविता में दी जा रही परिभाषा बहुत स्पष्ट होती है फिर भी समझने की सुविधा के लिये यदि परिभाषा गद्य में भी हो तो और सुविधाजनक होगा। बहुत अच्छा लेख है।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

कारण तो रहता मगर, कार्य न होता मीत.
जहाँ विशेषोक्ति वहीं, 'सलिल' अनूठी रीत..
रोचक अलंकार है।

सुषमा गर्ग २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

स्तुत्य प्रयास।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

Nice Article. Thanks.

Alok Kataria

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

पुन: एक संग्रहणीय आलेख। धन्यवाद सलिल जी।

Udan Tashtari २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

सलिल जी का किस बिध आभार करूँ , समझ नहीं पाता!! हमारे गुरु तो वो हैं ही.

अनन्या २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

सलिल जी के श्रम और समर्पण को प्रणाम। महत्वपूर्ण लेख है।

Nirmla Kapila २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

आप पर कोई टिप्पणी करने के लायक नहीं हूँ आपकी केलम को सलाम है
कारण तो रहता मगर, कार्य न होता मीत.
जहाँ विशेषोक्ति वहीं, 'सलिल' अनूठी रीत..
बेशक कारण आप और आपकी संवेदनायें हैं मगर सलाम आपकी कलम को है 1 है ना अनूठी रीत !!बधाई

nitesh २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

कारण तो रहता मगर, कार्य न होता मीत.
जहाँ विशेषोक्ति वहीं, 'सलिल' अनूठी रीत..

कारण की चर्चा मिले, मगर अचर्चित कार्य.
'सलिल' विशेषोक्ति उसे, कहते काव्याचार्य..

सभी उदाहरण भी अच्छे हैं।

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

बहुत अच्छा आलेख है, बधाई।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २३ नवम्बर २००९ ७:१३ PM  

आप सबका धन्यवाद.

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