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Saturday, August 8, 2009

जोगन [कविता] - विजय कुमार सपत्ति



मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !
तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !!
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !


रचनाकार परिचय:-

विजय कुमार सपत्ति के लिये कविता उनका प्रेम है। विजय अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा हिन्दी को नेट पर स्थापित करने के अभियान में सक्रिय हैं। आप वर्तमान में हैदराबाद में अवस्थित हैं व एक कंपनी में वरिष्ठ महाप्रबंधक के पद पर कार्य कर रहे हैं।

तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे
सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे
तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

मेरे नैनो में बस तेरी ही तो एक मूरत है
सावंरा रंग लिए तेरी ही मोहनी सूरत है
तू ही तो एक युगपुरुष रे ,हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

बावरी बन फिरू , मैं जग भर रे कृष्णा
गिरधर नागर कहकर पुकारूँ तुझे कृष्णा
कैसा जादू है तुने डाला रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ;हे घनश्याम मेरे !

प्रेम पथ ,ऐसा कठिन बनाया ; मेरे सजना
पग पग जीवन दुखो से भरा ; मेरे सजना
कैसे मैं तुझसे मिल पाऊं रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

7 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार August 8, 2009 1:40 PM  

बेहतरीन कविता। लय का अद्भूत संयोजन। काफ़ी मेहनत की है इस बार सपत्ति जी ने। मेरी बधाई स्वीकारें हृदय से।

Nirmla Kapila August 8, 2009 2:43 PM  

बहुत सुन्दर भजन विजय जी को बधाई

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) August 8, 2009 5:08 PM  

विजय जी प्रणाम बहुत ही सुन्दर और भाव पूर्ण भजन है मित्र मई तो नित आप का नया ही रूप देखता हूँ क्रष्ण भक्ति से सरो बोर हो गया

मेरी बधाई और प्रणाम स्वीकार करे

सादर

प्रवीण पथिक

९९७१९६९०८४

KK Yadav August 8, 2009 6:14 PM  

प्रेम पथ ,ऐसा कठिन बनाया ; मेरे सजना
पग पग जीवन दुखो से भरा ; मेरे सजना
कैसे मैं तुझसे मिल पाऊं रे , हे श्याम मेरे !
मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे
....Bahut khub..badhai.

अविनाश वाचस्पति August 9, 2009 9:45 AM  

जन जन के भजने योग्‍य
सुंदर मनभावन भजन।

दिगम्बर नासवा August 9, 2009 2:44 PM  

प्रेम के pavitr बंधन में rachi आपकी लाजवाब रचना vijay जी ............बहुत सुन्दर लिखा है

मोहिन्दर कुमार August 10, 2009 10:37 AM  

विजय जी इस भावपूर्ण भजन को लिखने के लिये बधाई...

अक्टूबर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': वदाभास पुनरुक्त है, अलंकार ज्यों फूल- काव्य का रचना शास्त्र: ३०, वीप्सा घृणा-विरक्ति है- काव्य का रचना शास्त्र: ३१,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:- अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार,

अक्टूबर-2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-

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