देह के परिभाषा
को सोचता हूँ ;
मैं झुठला दूं !

<span title=साहित्य शिल्पी" width="130" align="left" border="0"> रचनाकार परिचय:-


विजय कुमार सपत्ति के लिये कविता उनका प्रेम है। विजय अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा हिन्दी को नेट पर स्थापित करने के अभियान में सक्रिय हैं। आप वर्तमान में हैदराबाद में अवस्थित हैं व एक कंपनी में वरिष्ठ महाप्रबंधक के पद पर कार्य कर रहे हैं।


देह की एक गंध ,
मन के ऊपर छायी हुई है !!

मन के ऊपर परत दर परत
जमती जा रही है ;
देह ….
एक देह ,
फिर एक देह ;
और फिर एक और देह !!!

देह की भाषा ने
मन के मौन को कहीं
जीवित ही म्रत्युदंड दे दिया है !

जीवन के इस दौड़ में ;
देह ही अब बचा रहा है
मन कहीं खो सा गया है !
मन की भाषा ;
अब देह की परिभाषा में
अपना परिचय ढूंढ रही है !!

देह की वासना
सर्वोपरि हो चुकी है
और
अपना अधिकार जमा चुकी है
मानव मन पर !!!

देह की अभिलाषा ,
देह की झूठन ,
देह की तड़प ,
देह की उत्तेजना ,
देह की लालसा ,
देह की बातें ,
देह के दिन और देह की ही रातें !

देह अब अभिशप्त हो चुकी है
इस से दुर्गन्ध आ रही है !
ये सिर्फ अब इंसान की देह बनकर रह गयी है :
मेरा परमात्मा , इसे छोड़कर जा चूका है !!

फिर भी घोर आश्चर्य है !!!
मैं जिंदा हूँ !!!

13 comments:

  1. देह अब अभिशप्त हो चुकी है
    इस से दुर्गन्ध आ रही है !
    ये सिर्फ अब इंसान की देह बनकर रह गयी है :
    मेरा परमात्मा , इसे छोड़कर जा चूका है !!

    फिर भी घोर आश्चर्य है !!!
    मैं जिंदा हूँ !!!

    वाह सपत्ति जी कमाल की कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी कविता है, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जीवन की दार्शनिकता से परिपूर्ण एक रचना.. आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. दुर्गंध इतनी जल्‍दी नहीं आती

    जब आती है तो देह रोकी नहीं जाती

    जला दी जाती है या

    दी जाती है दबा।


    देह ही है जो

    मन को कर देती है मौन

    फिर मन कौन ?

    उत्तर देंहटाएं
  5. सच्ची अभिव्यक्ति। बहुत अच्छी कविता है। विजय जी आपको बहुत बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. देह अब अभिशप्त हो चुकी है
    इस से दुर्गन्ध आ रही है !
    ये सिर्फ अब इंसान की देह बनकर रह गयी है :
    मेरा परमात्मा , इसे छोड़कर जा चूका है

    सच्चाई को ब्याँ करती एक खूबसूरत कविता ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. आत्‍मा न बच जाए तो देह से दुर्गंध आना ही है .. बहुत अच्‍छी रचना .. बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. विजय भाई की कविता ने मन में एक सवाल पैदा किया है। मुझे लगता है कि प्रकृति ने केवल वासना पैदा की है। प्रेम एक मानव निर्मित भावना है। नर और नारी का मानव निर्मित प्रेम तभी संपूर्ण हो पाता है जब प्राकृतिक वासना उसमें शामिल हो जाती है। आत्मा से अधिक महत्वपूर्ण शरीर है। क्योंकि हम हमेशा सुनते हैं कि अमुक की आत्मा भटक रही है। हमने कभी किसी को यह कहते नहीं सुना कि अमुक आत्मा का शरीर दफ़ना दिया गया या उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। आत्मा क्या है - एक बहस का मुद्दा है। मगर देह एक ठोस सच्चाई है।

    तेजेन्द्र शर्मा
    लंदन

    उत्तर देंहटाएं
  9. जीवन के इस दौड़ में ;
    देह ही अब बचा रहा है
    मन कहीं खो सा गया है !
    मन की भाषा ;
    अब देह की परिभाषा में
    अपना परिचय ढूंढ रही है

    वाह.....लाजवाब विजय जी.............देह की विडम्बना को झेलते हुवे..............देह के प्रभाव को रचते हुवे सुन्दर प्रभावी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  10. Dehdhari hokar deh par sirph kshobh kyon Vijay ji? kuchha karne ke liye deh to chahiye hi na? Ishvar bhi deh dharn kar dhanya hota hai.deh ka kya dosh vah to karm ka madhyam hai,jiska sarthi man hai .Isvar hai vijay ji, aaj bhi hai aur isi deh me hai. tabhi sansar me isi dah se kuchha achche karya bhi ho rahe hai.

    aapki kavita pathak ko chaitany karti hai.shubhkamnayen!

    ( Punita Thakur)

    उत्तर देंहटाएं

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