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गुरुवार, १ जनवरी २००९

नदी बोली समन्दर से [गीत] - स्वर व रचना - डॉ० कुँअर बेचैन


कुछ समय पूर्व साहित्य शिल्पी के हमारे कुछ साथियों ने सुप्रसिद्ध कवि डॉ० कुँअर बेचैन जी से उनके घर पर मुलाकात की और उनका साक्षात्कार लेने के दौरान उन्हें साहित्य शिल्पी से परिचित कराया। इस का विवरण हम अपनी पूर्वप्रकाशित रिपोर्ट में दे चुके हैं। मुलाकात के दौरान उस समय हमारे हर्ष का पारावार न रहा जब वे हमारे कार्य को देखते हुये हमें अपना रचनात्मक सहयोग देने को भी तैयार हो गये।

इस सिलसिले की शुरुआत करने के लिये हमने उनकी ही आवाज़ में एक गीत रिकार्ड किया जिसे हम आज आपको सुनवाने या यूँ कहें कि दिखाने जा रहे हैं। हमें विश्वास है कि आज नववर्ष पर हमारे नये शिल्पी और सम्माननीय कवि श्री कुँअर बेचैन जी का ये गीत आपको एक सुखद प्रेमानुभूति से सराबोर कर देगा।

गीत के बोल हैं:

नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ।
मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही ही रुबाई हूँ।।

मुझे ऊँचाइयों का वो अकेलापन नहीं भाया;
लहर होते हुये भी तो मेरा मन न लहराया;
मुझे बाँधे रही ठंडे बरफ की रेशमी काया।
बड़ी मुश्किल से बन निर्झर, उतर पाई मैं धरती पर;
छुपा कर रख मुझे सागर, पसीने की कमाई हूँ।।

मुझे पत्थर कभी घाटियों के प्यार ने रोका;
कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।

पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।

तो आइये डॉ० कुँअर  बेचैन जी को गाते हुये देखते हैं और सुनते हैं ये गीत:



यदि धीमे कनेक्शन या किसी अन्य कारणवश आपको वीडियो देखने में दिक्कत हो तो आप इसका आडियो नीचे के प्लेयर से सुन भी सकते हैं:

21 comments:

अनुज २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

झूम गये हम तो, क्या अंदाज है बेचैन साहब का - मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही ही रुबाई हूँ।

दृष्टिकोण २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

वीडियो को बफर होने में समय तो लगा लेकिन सुनने के बाद महसूस हुआ कि कविता पढने और सुनने में कितना अंतर है। डॉ. कुँवर बेचैन को नव वर्ष की शुभकामनायें।

बेनामी २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

Dr. Baichain is ultimate. No words to describe this poem.

Alok Kataria

अभिषेक सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

बहुत अच्छा गीत है, बहुत बधाई।

पंकज सक्सेना २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

सुनाने का अंदाज निराला है और पंक्तियाँ भी खूब हैं।

पहन कर चाँद की नथनी, सितारों से भरा आँचल;
नये जल की नई बूँदें, नये घुँघरू नई पायल;
नया झूमर नई टिकुली, नई बिंदिया नया काजल।
पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।

नंदन २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

देखने के लिये लम्बी प्रतीक्षा लग रही है, वीडियो धीमे कम्यूटर नेटवर्क पर भी चल सकें, एसा कोई उपाय कीजिये। कुवर साहब का कोई जवाब नहीं है, मेरा पसंदीदा गीत आपने प्रस्तुत किया है।

कभी कलियों कभी फूलों भरे त्यौहार ने रोका;
मुझे कर्तव्य से ज़्यादा किसी अधिकार ने रोका।
मगर मैं रुक नहीं पाई, मैं तेरे घर चली आई;
मैं धड़कन हूँ मैं अँगड़ाई, तेरे दिल में समाई हूँ।।

पहन आई मैं हर गहना, कि तेरे साथ ही रहना;
लहर की चूड़ियाँ पहना, मैं पानी की कलाई हूँ।

अनिल कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

राजीव जी इस साईट पर आ कर आँख खुल गयी। आपका अनुरोध स्वीकार है। इस पत्रिका का पाठक होना भी बडी बात होगी। जितनी मेहनत और जितनी उन्नत सामग्री आप लोग प्रस्तुत कर रहे हैं वह कमाल की बात है। आपको कहने की जरूरत नहीं होगी मैं नीयमित पाठक हूँ अब इस पत्रिका का। कुअर बेचैन को कई मंकों पर सुना है और वे बेहतरीन कवि और शायर हैं।

रचना सागर २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

अध्भुत गीत है। बहुत बधाई।

mehek २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

bahut sundar geet badhai

मोहिन्दर कुमार २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

साक्षात्कार के लिये जाते समय मन में बहुत से भाव थे परन्तु कुंवर जी से मिल कर मन प्रसन्नता से भर गया. जितना समय उन्होंने साहित्य शिल्पी को दिया और जिस स्नेह और आत्मियता से वह हमसे मिले व अविस्मर्णिय है. उनसे वार्तालाप करना और उनका गीत सुनना हमेशा याद रहेगा.

आभार

अजय यादव २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

डॉ. कुँअर बेचैन निस्संदेह वर्तमान दौर के सर्वश्रेष्ठ कवि और शायरों में से एक हैं. प्रेम और संवेदना के बारीक धागों से बुनी गई उनकी रचनायें किसी का भी मन मोह सकतीं हैं. काव्य-पाठ की उनकी शैली भी उन्हें लोकप्रिय बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है.
प्रस्तुत वीडियो में ये दोनों ही बातें हैं जो इसे संग्रहणीय बना देतीं हैं. साहित्य शिल्पी परिवार में डॉ. कुँअर बेचैन जी का हार्दिक स्वागत और इस सुंदर रचना के लिये बधाई!

अतुल्य २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

डॉ. कुँअर बेचैन जी को सुनना अपने आप में एक स्वर्गिक अनुभव है. उनकी आवाज के तरन्नुम ने कविता की खूबसूरती को और भी बढ़ा दिया है. सुंदर कविता सुनाने का आभार!

साहित्य शिल्पी पर आपकी अन्य रचनाओं की भी प्रतीक्षा रहेगी!

निधि २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

कई बार सुनने की कोशिश कर चुकी थी लेकिन वीडियो में दिक्कत हो रही थी। ऑडियो लगा कर आपने अच्छा काम किया है। अच्छा लगा कुवर बैचैन को सुनना।

विश्व दीपक ’तन्हा’ २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

कई कोशिशों के बावजूद विडियो नहीं देख पाया। लेकिन ओडियो सुनकर दिल को सुकून मिला। लीजेंड्स पर कोई टिप्पणी नहीं करते इसलिए "बेचैन" साहब की लेखनी के बारे में कुछ कह नहीं सकता।

साहित्य-शिल्पी की पूरी टीम को बधाई।

-तन्हा
वैसे हाँ, सभी मित्रों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Umesh २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

कुँअर बेचैन जी को सुनना बहुत अच्छा लगा. साहित्य शिल्पी को इस प्रस्तुति के लिये आभार और बेचैन जी को बधाई एक सुंदर रचना के लिये!

Vir २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

बहुत सुंदर मानवीकरण! बहुत अच्छी प्रस्तुति!
आभार!

श्रद्धा जैन २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

Dr. kunavar bachin ji ko padna aur sunna bhaut achha laga inhe padna aur in jaise mahan kavi se milna sobhgya ki baat hai aap inse mil sake aur aapke dawara inse chhoti si mulakaat bahut sukhad rahi

रितु रंजन २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

कुँअर बेचैन जी की यह कविता अनेको बार सुनी और मैं तनहा जी की इस बात से सहमत हूँ कि लीजेंड्स पर क्या टिप्पणी की जाये, जिन्हे सुन पाना ही सौभाग्य है।

अल्पना वर्मा २३ नवम्बर २००९ ६:४९ PM  

प्रस्तुत ' नदी और सागर का प्रेम गीत बहुत ही सुंदर रचना है.
गीत में --
'अपनी उलझनों के हल मिले..
'उसके खारेपन में भी कोई कशिश होगी'.....बहुत ही खुबसूरत है.
कविवर के स्वर में उनकी यह रचना सुनना एक सुखद अनुभव रहा.
डॉ. कुँवर बेचैन जी और साहित्य शिल्पी के परिवार के सभी सदस्यों को नव वर्ष की शुभकामनायें।
आभार सहित.

Vijay Kumar Sappatti २३ नवम्बर २००९ ६:५० PM  

sahitya shilpi team ko is prayaas ke liye bahut bahut badhai ..

dr. kunwar baichen ji ko sunna apne aap mein ek naya experiment hai ..

aapka
vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

प्रमोद कुमार शर्मा १८ मार्च २०१० २:०० AM  

बहुत अच्छा गीत है। कवि से सुन कर तो और भी सुंदर लगा।

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
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अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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