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रविवार, १९ जुलाई २००९

हृदय की मौन भाषा चाहिये [कविता] - सुशील कुमार

[अपने एक दुश्मन-दोस्त के लिये...]

कविता के लिये
सिर्फ़ शब्द नहीं मुझे
हृदय की मौन भाषा चाहिये
मन की अदृश्य लिपियों में गढ़ी
सुगबुगाते हुए और
अभिव्यक्ति को बेचैन
भावों के अनगिन तार दे दो मुझे

कविता के लिये
मात्र आँखों का कँवल नहीं
उसका जल चाहिये मुझे
उसमें बिहरते सपनों की टूटन
की कोई आवाज़ सुनाओ मुझे

सुबह से शाम तक
दो जून रोटी के वास्ते
जिन कायाओं ने रच रखी है
पूरी दुनिया में श्रम का संगीत
उसका नाद चाहिये, ताल चाहिये

मुझे स्वेद से लथ-पथ बेकसों की
बेकली भी चाहिये
अपनी कविता के लिये

और चाहिये गगनचुंबी इमारतों में बैठी
मजबूर उन वेश्याओं
की कराह अपनी कविता के लिये
जो इस गिरती रात के साथ, सुनो...
कितनी गहरी और घनी होती जा रही है !

अनकही बहुत सी कहनी है
अपनी कविता में मुझे
इसलिये सिर्फ़ शब्दों का इन्द्रजाल नहीं
शब्दों की तह में पैठे
अनुभव-अनुभाव चाहिये

मुझे नहीं चाहिये
दराजों में दीमक चाट रहे वे अधमरे शब्द
जिनसे मयखाने में बैठ रोज़ लिखी जा रही
जनवाद की बेहद झूठी कवितायें

कविता में तो मुझे
ज़िन्दा टटका लोक के ठेठ शब्द चाहिये
आहत आत्माओं का
अनाहत स्वर और नव लय चाहिये
* * * * *

17 टिप्पणियाँ:

अविनाश वाचस्पति July 19, 2009 9:10 AM  

यह कविता है
या कवितानुमा पत्र
या उद्गार हैं हृदय के।

विश्‍वास है कि
इस कविता से
दुश्‍मनी बदलेगी दोस्‍ती में


वैसे रहना चाहिए
इसका भी वजूद
तभी भाव उकरते हैं
उकेरे जाते हैं
कुरेदे जाते हैं।

जो तिलमिलाते हैं
वे कविता लिखते हैं
और
चुप भी रहते हैं वही
ऐसी है यह बही
जो लगती है सही
और होती है सदा सही।

राह नई है
राह कठिन है
पर जिसे मान रहे हो दुश्‍मन
वही तुम्‍हारे मन का सच्‍चा दोस्‍त है
झांक कर देख लो
पहचान लो अपना मन।

सुनीता शानू July 19, 2009 7:59 AM  

बहुत सुन्दर कविता है...मगर दुश्मन दोस्त के लिये...?

अनिल कुमार July 19, 2009 9:16 AM  

पूरी आत्मा से लिखी गयी कविता है, बहुत खूब सुशील जी।

अनन्या July 19, 2009 2:43 PM  

मुझे नहीं चाहिये
दराजों में दीमक चाट रहे वे अधमरे शब्द
जिनसे मयखाने में बैठ रोज़ लिखी जा रही
जनवाद की बेहद झूठी कवितायें

गंभीर और सशक्त।

Anshu Bharti July 19, 2009 4:37 PM  

बहुत मार्मिक और ह्र्दय्हारिणी कविता लगी सुशील कुमार जी।

Ashok July 19, 2009 4:40 PM  

बेहतरीन और लाजबाव।-अशोक सिंह,जनमत शोध संस्थान,दुमका।

rekhamaitra July 19, 2009 5:49 PM  

waqayee ye sab cahiye kavita ke liye par kya ye sahaj hee uplabdh naheen hain ?kavta sundar hai !badhaaee!

PRAN SHARMA July 19, 2009 5:12 PM  

SUSHEEL KUMAAR JEE KEE KAVITA
ACHCHHEE LAGEE HAI.UNKEE KAVITA
PADHKAR VIKHYAAT SHAIR AKBAR
ALLAHBADI KAA SHER YAAD AA GAYAA
HAI MUJHE----
MAANEE KO CHHODKAR
JO HON NAAZUK BAYAANIYAN
VO SHER NAHIN ,RANG
HAI LAFZON KE KHOON KAA

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ July 19, 2009 9:23 PM  

...... सुन्दर ... रचना के माध्यम से रचनाकारों के अंतर्मन को झिझोड़्ने के लिये एक सकारात्मक आह्वान.... आभार.

अनिल कुमार July 20, 2009 8:24 AM  

सुशील जी सबसे बडी बात है कि मैनें जो कुछ आपके विषय में विचार बनाये थे उसके विपरीत यह कविता है -

मुझे नहीं चाहिये
दराजों में दीमक चाट रहे वे अधमरे शब्द
जिनसे मयखाने में बैठ रोज़ लिखी जा रही
जनवाद की बेहद झूठी कवितायें

ये पंक्तियाँ आपके साहस का परिचय दे रही हैं। यह सच उजागर होने से साहित्य का भला होने लगेगा।

दिलीप कवठेकर July 19, 2009 11:11 PM  

दुश्मन दोस्त हो या दोस्त दुश्मन, दिल के छालों की तपन एक सी है.

आकांक्षा~Akanksha July 20, 2009 10:34 AM  

मुझे नहीं चाहिये
दराजों में दीमक चाट रहे वे अधमरे शब्द
जिनसे मयखाने में बैठ रोज़ लिखी जा रही
जनवाद की बेहद झूठी कवितायें
...Kuchh alag mijaj ki kavita..pasand ayi !!

मोहिन्दर कुमार July 20, 2009 12:16 PM  

सुन्दर कविता है सुशील जी,
शब्द कोई भी हों.. कविता कमजोर या सशक्त हो सकती है झूठी नहीं :) आपकी कविता काफ़ी सशक्त है इस बार. बधाई

Vidhu July 20, 2009 1:11 PM  

अनकही बहुत सी कहनी है
अपनी कविता में मुझे
बहुत सुन्दर कविता

सबद-लोक July 20, 2009 2:19 PM  

अनिल कुमार जी,
आप मेरी कविता के गंभीर पाठकों में से एक हैं।इसलिये मन हो आया कि आपसे बात करूं। मैं आप पर इस नाते उतनी ही श्रद्धा भी करता हूँ। देखिये, कविता में शब्द-यात्रायें हमेशा अनंतिम रहती हैं। जिस-जिस पड़ाव से गुज़रता हूँ, उससे जो इन्द्रिय ग्रहण करता है और मन जिस चीज़ को मथता है, उस पर हृदय जब अपना हाथ रख देता है तब मैं कविता कर डालता हूँ। अभी तो उस कविता को प्रिंट-पत्रिका में भेजा भी नहीं है,वह इतनी ताज़ा है। हाँ-
इस दीवार से एक
हर रोज़
खिड़की खुलती है
जिससे होकर एक दृश्य
गुजरता है हरदम
जिसकी कौंध
जब चमकती है मन में
तब वह कागज पर
झड़ती है शब्द के कुछ
अनछूये पहलुओं को लेकर
जिससे शायद मेरी कविता
बन जाती है।

अनिल जी,आप अपना ईमेल आई डी मेरे ई-पते पर भेज दें ताकि आप से संपर्क कर सकूँ।धन्यवाद।
सुशील कुमार ( [email protected])

दिव्य नर्मदा July 20, 2009 8:43 PM  

आपकी रचनाओं का पाठक और प्रशंसक तो मैं भी हूँ...इस सशक्त रचना के लिए साधुवाद.

परमजीत बाली August 2, 2009 3:51 PM  

बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': अलंकार दृष्टान्त को जानें, लें आनंद -काव्य का रचना शास्त्र: ३९,
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अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
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अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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दिसम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

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