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2:44 pm | प्रस्तुतकर्ता
साहित्य - शिल्पी |
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गोपाल प्रसाद (RTI ACTIVIST)
मंडावली, दिल्ली - 92
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ग
4:23 pm | प्रस्तुतकर्ता
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रचनाकार परिचय:-
गीतांजलि श्री का जन्म १९५७ में हुआ। उत्तर प्रदेश में पली-बढ़ी गीतांजलि जी वर्तमान में हिन्दी की सुपरिचित कथाकार हैं। "हंस" में प्रकाशित अपनी पहली कहानी बेल-पत्र (१९८७) से अब तक वे अपनी विशेष लेखन-शैली के लिये जानी जाती हैं। इनके उपन्यास "माई" ने इन्हें साहित्यिक क्षेत्र में एक मुकाम दिलाया। इस उपन्यास का अंग्रेजी के अलावा रूसी और कोरियाई भाषा में अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त हमारा शहर उस बरस (उपन्यास), तिरोहित, वैराग्य (कहानी) आदि इनकी प्रमुख रचनायें हैं।
इंदु शर्मा कथा सम्मान के अतिरिक्त इन्हें "माई" के लिये २००१ के Crossword Book Award से भी सम्मानित किया गया है। आप संस्कृति मंत्रालय और जापान फाउन्डेशन में फैलो भी रह चुकी हैं।
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4:27 pm | प्रस्तुतकर्ता
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रचनाकार परिचय:-
गौरव शुक्ला कुछ समय पूर्व तक कवि और पाठक दोनों ही के रूप में अंतर्जाल पर बहुत सक्रिय रहे हैं।
अपनी सुंदर और भावपूर्ण कविताओं, गीतों और गज़लों के लिये पहचाने जाने वाले गौरव को अपने कुछ व्यक्तिगत कारणों से अंतर्जाल से दूर रहना पड़ा। साहित्य शिल्पी के माध्यम से एक बार फिर आपकी रचनायें अंतर्जाल पर आ रही हैं।
गौरव शुक्ला कुछ समय पूर्व तक कवि और पाठक दोनों ही के रूप में अंतर्जाल पर बहुत सक्रिय रहे हैं।
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8:41 pm | प्रस्तुतकर्ता
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मेजर गौतम राजरिशी का जन्म १० मार्च, १९७६ को सहरसा (बिहार) में हुआ। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी व भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरांत वर्तमान में आप कश्मीर में पदस्थापित हैं।
गज़ल व हिन्दी-साहित्य के शौकीन गौतम राजरिशी की कई रचनायें कादम्बिनी, हंस आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।
अपने ब्लाग "पाल ले एक रोग नादाँ" के माध्यम से वे अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं।
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2:44 pm | प्रस्तुतकर्ता
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जान पाऊँ, तो संभवतः 'उस' को जान पाऊँ जो अभीष्ट है।
लेखनी ही माध्यम है इस खोज की। साहित्य साधना है, कर रही हूँ, फलेच्छा क्योंकि गीता - धर्म नहीं है, इसलिये गीता पंडित साधना - रत है ।
केवल रसिक हूँ, अतः समय और अवसर मिलते ही संगीत-कार्यक्रमों में सम्मिलित होने की उत्कंठा बनी रहती है। यदा-कदा नाटकों मे मंच-स्पर्श भी किया । घर की दीवारों पर लगे तैल-चित्रों में अपने ही विचारों को चित्रित कर पाने में अंशतः सफलता मिली । यूँ सफलता तो सागर-शोधन की तरह है।
एम.ए.इंग.(लिट.) और फिर एम.फिल.(लिंग्विस्टिक्स) किया, किंतु रूप गृहिणी का ही है।
श्रद्धेय जनक, प्रसिद्ध कवि श्री "मदन शलभ" का वरद-हस्त इस विधा में रत रहने की प्रेरणा रहा है। किसी गीत के पहले दो बोल पिता ने घुट्टी में दे दिये होंगे..... उसी गीत को पूर्ण करने के प्रयास मे लगी हूँ । वो जहाँ हैं, वहीं से मेरे स्व-धर्म और स्व-कर्म पर दृष्टि रखें।
मेरी प्रथम काव्य-पुस्तक छपने के लियें तैय्यार है...कब....समय मैं भी नहीं जानती...आप सभी की शुभ-कामनाओं की इच्छुक हूँ।
देरी से ही सही अब मन बस लिखते रहना चाहता है.....क्योंकि........
ऐसे सौरभ की घड़ी, फिर से ना आये क्या पता,
आज है जो गीत-सरिता, कल भी होगी क्या पता,
बाँध लो मन इन पलों को,आज शब्दों के वसन में,
और उतारो गीत में फिर, प्रीत की आकाश - गंगा ॥
आज है जो गीत-सरिता, कल भी होगी क्या पता,
बाँध लो मन इन पलों को,आज शब्दों के वसन में,
और उतारो गीत में फिर, प्रीत की आकाश - गंगा ॥
शेष माँ शारदे के हाथ ।
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