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9 अप्रैल, 1956 को जन्मे डॉ. वेद 'व्यथित' (डॉ. वेदप्रकाश शर्मा) हिन्दी में एम.ए., पी.एच.डी. हैं और वर्तमान में फरीदाबाद में अवस्थित हैं। आप अनेक कवि-सम्मेलनों में काव्य-पाठ कर चुके हैं जिनमें हिन्दी-जापानी कवि सम्मेलन भी शामिल है। कई पुस्तकें प्रकाशित करा चुके डॉ. वेद 'व्यथित' अनेक साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़े हुए हैं।
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विश्वरंजन का जन्म 1 अप्रैल 1952 को गया बिहार में हुआ। आपने पटना विश्वविद्यालय से बी.ए ऑनर्स की डिग्री हासिल की जिसके पश्चात आपका चयन भारतीय पुलिस सेवा में हो गया। आप मशहूर शायर फ़िराक गोरखपुरी के नाती हैं। आप देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में समादृत हैं। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं - स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी है (काव्य संग्रह), एक नयी पूरी सुबह (एकाग्र)। आपने अनेक कविताओं का अंग्रेजी, बांग्ला व तेलुगु से अनुवाद भी किया है। वर्तमान में आप छतीसगढ के पुलिस महानिदेशक हैं।
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युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा. वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।
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२८ नवम्बर, १९५१ को जिला आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) में जन्मे विभूति नारायण राय १९७५ बैच के यू.पी.कैडर के आई.पी.एस. अधिकारी हैं।
विशिष्ट सेवा के लिये राष्ट्रपति पुरुस्कार तथा पुलिस मैडल से सम्मानित श्री राय एक संवेदनशील पुलिस अधिकारी के साथ-साथ एक उच्चकोटि के कथाकार के रूप में भी जाने जाते रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास "तबादला" पर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त हुआ है। उनका उपन्यास "शहर में कर्फ्यू" हिंदी के अलावा अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी आदि में भी अनूदित हो चुका है। उनके एक अन्य उपन्यास "किस्सा लोकतंत्र" के लिये उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का भी सम्मान प्राप्त हुआ है। उपन्यासों के अलावा उनका व्यंग्य-संग्रह "एक छात्र-नेता का रोजनामचा" भी बहुत लोकप्रिय है।
वर्तमान में आप महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।
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रचनाकार परिचय:-
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो.सी. बी. श्रीवास्तव विदग्ध तथा शिक्षाविद् श्रीमती दयावती श्रीवास्तव के सुपुत्र विवेक रंजन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होते रहे हैं। आकाशवाणी व दूरदर्शन से इनकी कई रचनाओं का प्रसारण भी हुआ है।
२८ जुलाई, १९५९ को मंडला (म.प्र.) में जन्मे श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र" ने सिविल इंजीनियरिंग में रायपुर से स्नातक करने के बाद फाउंडेशन इंजीनियरिंग में भोपाल से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की तथा इग्नू से सर्टिफाइड एनर्जी मैनेजर डिप्लोमा भी प्राप्त किया।
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो.सी. बी. श्रीवास्तव विदग्ध तथा शिक्षाविद् श्रीमती दयावती श्रीवास्तव के सुपुत्र विवेक रंजन विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होते रहे हैं। आकाशवाणी व दूरदर्शन से इनकी कई रचनाओं का प्रसारण भी हुआ है।
इनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं: आक्रोश (कविता-संग्रह), रामभरोसे, कौआ कान ले गया (व्यंग्य-संग्रह), हिन्दोस्ताँ हमारा (नाटक-संग्रह) आदि। कान्हा अभयारण्य परिचायिका तथा एक अन्य कविता संग्रह प्रकाशनाधीन है।
विभिन्न पुरुस्कारों से सम्मानित श्री विवेक रंजन २००५ से हिन्दी ब्लागिंग से जुड़े हैं और अपना चिट्ठा "विवेक के व्यंग" चला रहे हैं।
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8:51 pm | प्रस्तुतकर्ता
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विजय कुमार सपत्ति के लिये कविता उनका प्रेम है। विजय अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा हिन्दी को नेट पर स्थापित करने के अभियान में सक्रिय हैं। आप वर्तमान में हैदराबाद में अवस्थित हैं व एक कंपनी में वरिष्ठ महाप्रबंधक के पद पर कार्य कर रहे हैं।
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10:06 am | प्रस्तुतकर्ता
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सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में आप प्रकाशित होते रहे हैं। पिछले सत्रह वर्षों से आप प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका "सूत्र" का संपादन कर रहे हैं।
आपको प्राप्त सम्मानों में पं गंगाधर सामंत स्मृति पुरस्कार तथा दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रमुख हैं।
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7:28 pm | प्रस्तुतकर्ता
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विश्वदीपक “तनहा” का जन्म बिहार के सोनपुर में २२ फरवरी १९८६ को हुआ था। सोनपुर हरिहरक्षेत्र के नाम से विख्यात है, जहाँ हरि और हर एक साथ एक हीं मूर्त्ति में विद्यमान है और जहाँ एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है। पूरा क्षेत्र मंदिरों से भरा हुआ है। इसलिए ये बचपन से हीं धार्मिक माहौल में रहे, लेकिन कभी भी पूर्णतया धार्मिक न हो सके। पूजा-पाठ के श्लोकों और दोहों को कविता की तरह हीं मानते रहे। पर इनके परिवार में कविता, कहानियों का किसी का भी शौक न था। आश्चर्य की बात है कि जब ये आठवीं में थे, तब से पता नहीं कैसे इन्हें कविता लिखने की आदत लग गई । फिर तो चूहा, बिल्ली, चप्पल, छाता किसी भी विषय पर लिखने लगे। इन्होंने अपनी कविताओं और अपनी कला को बारहवीं कक्षा तक गोपनीय ही रखा । तत्पश्चात मित्रों के सहयोग और प्रेम के कारण अपने क्षेत्र में ये कवि के रूप में जाने गये । बारहवीं के बाद इनका नामांकन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के संगणक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग में हो गया । कुछ दिनों तक इनकी लेखनी मौन रही,परंतु अंतरजाल पर कुछ सुधि पाठकगण और कुछ प्रेरणास्रोत मित्रों को पाकर वह फिर चल पड़ी । ये अभी भी क्रियाशील है। इनकी सबसे बड़ी खामी यह रही है कि इन्होंने अभी तक अपनी कविताओं को प्रकाशित होने के लिये कहीं भी प्रेषित नहीं किया।साहित्य शिल्पी पर इनकी रचनाओ के लिये यहाँ क्लिक करें।
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विपुल शुक्ला का जन्म गाडरवारा जिला नरसिहपुर मे 28 मार्च 1988 को हुआ। कवि की पूरी शिक्षा-दीक्षा भोपाल के निकट होशंगाबाद मे हुई। इन्होनें जिस विद्यालय मे शिक्षा ग्रहण की उसी विद्यालय में इनकी माताश्री श्रीमती आभा शुक्ला हिन्दी की शिक्षिका थी। इसीलिये बचपन से ही हिन्दी विषय पर बहुत ध्यान दिया जाता था। अपनी पहली कविता इन्होनें विद्यालय की पत्रिका "प्रगति" के लिये कक्षा ग्यारहवीं में लिखी। उन दिनो अक्सर पाठ्यक्रम की किताब में कविताओं की किताब रखकर पढा करते थे और पकड़े जाने पर माताश्री से डाँट भी खाते थे। इनके अनुसार काव्य प्रतिभा इन्हें अपनी माँ से विरासत मे मिली है। विपुल हिंद-युग्म के यूनिकवि रह चुके हैं तथा वर्तमान में आई.पी.एस. एकेडेमी, इन्दौर में रसायन अभियांत्रिकी चतुर्थ वर्ष के छात्र हैं।
पता:- ३९ प्रगति नगर, इंदौर
दूरभाष :- 9926363028
ई मेल :[email protected]
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