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रविवार, १३ दिसम्बर २००९

'कान्त' पत्थर वोट का संसद से चलाया जायेगा [ग़ज़ल] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

Ghazal by Shrikant Mishra 'Kant'रचनाकार परिचय:-
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का जन्म 10 अक्तूबर 1959 को हुआ। आप आपात स्थिति के दिनों में लोकनायक जयप्रकाश के आह्वान पर छात्र आंदोलन में सक्रिय रहे।

आपकी रचनाओं का विभिन्न समाचार पत्रों, कादम्बिनी तथा साप्ताहिक पांचजन्य में प्रकाशन होता रहा है। वायुसेना की विभागीय पत्रिकाओं में लेख निबन्ध के प्रकाशन के साथ कई बार आपने सम्पादकीय दायित्व का भी निर्वहन किया है।

वर्तमान में आप वायुसेना मे कार्यरत हैं तथा चंडीगढ में अवस्थित हैं।
तुम हमारे जख्म फिर से मत कुरेदो
वक्त का मरहम हटाया जायेगा

लहू से लोहित हुयी सरयू अभी मैली पड़ी
आज क्या फिर से वही लोहू बहाया जायेगा

तारीख़ के पन्नों से निकली धुंध फिर सबओर है
राम को घर से हटा बाब़र बिठाया जायेगा

उनको अब तो छोड़ दो दो जून रोटी के लिये
टूटी ठेलों को कहीं फिर से जलाया जायेगा

पड़ोसी वाशिद की आंखें आज फिर ये पूंछतीं
भूखे बच्चों को तेरे घर पे सुलाया जायेगा

भरोसा अब कांच की उन बन्द खिड़की के सहन
’कान्त’ पत्थर वोट का संसद से चलाया जायेगा

तुम हमारे जख्म फिर से मत कुरेदो
वक्त का मरहम हटाया जायेगा

3 comments:

vedvyathit १३ दिसम्बर २००९ ९:०७ AM  

ram ko fir se hta babr bithaya jayega aap ke shbd vrtman schchai ko vykt kr rhe hai swarth ke liye neta kuchh bhi kr skte hain kash inhe ye bat smjh aa jati to vishv men manvta jivit ho jati
dr ved vyathit

नंदन १३ दिसम्बर २००९ १:१३ PM  

तुम हमारे जख्म फिर से मत कुरेदो
वक्त का मरहम हटाया जायेगा

अच्छा कहा है

मोहिन्दर कुमार १४ दिसम्बर २००९ ९:४९ AM  

श्रीकान्त जी,
बहुत ही सुन्दर विचारों को आपने अपनी इस रचना में पिरोया है.. आज का सत्य यही है. धर्म जैसी पूजनीज वस्तु को भी अपने राजनैतिक सवार्थों के लिये प्रयोग किया जा रहा है.

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
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फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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