जीवन रीत [गीत] - शशि पाधा

अब न गाऊँगी मैं फिर से
अश्रु भीगा वेदन गीत।
रचनाकार परिचय:-अब तक आपके दो काव्य-संकलन “पहली किरण” और “मानस-मन्थन” प्रकाशित हो चुके हैं और एक अन्य प्रकाशनाधीन है। पिछले पाँच वर्षों से आप विभिन्न जाल-पत्रिकाओं से भी प्रकाशित हो रहीं हैं।
सागर तीरे चलते -चलते
जोड़ूँगी मोती और सीप|
लहरों की नैया पर बैठी
छू लूँगी उस पार का द्वीप|
अब न पूछूँगी मैं मन से
किसकी हार-किसकी जीत।
ओस कणों में घोल के किरणें
रँग लूँगी अँगना और द्वार|
इन्द्रधनु ले आऊँ नभ से
बिखरा दूँ सतरँगी हार|
छेड़ूँगी वीणा पर फिर से
राग-रंजित सुर संगीत।
डाली पर एकाकी कोयल
करूण स्वरों में गाये गान|
जाऊँ गले लगाऊँ, पूछूँ
कैसे हो यह पीर निदान|
बाँध के सावन ला दूँ उसको
जानूँ वो ही मन का मीत।
जिन रिश्तों ने तोड़ी डोरी
भूलूँ वो सूरत अनजान|
अँधियारों में संग चलें जो
कर लूँगी उनसे पहचान|
नयी दिशाएँ पंथ सँवारे
नूतन होगी जीवन रीत|
फिर से न गाऊँगी मैं अब
अश्रु भीगा वेदन गीत|






7 comments:
सुन्दर , संतुलित वेदना पूर्ण गीत के लिए बढ़ायी |
अवनीश तिवारी
vedna ke bin adhura geet hai
vedna ke bin adhuri prit hai
vedna hi nam hai us pyar ka
jo hmare geet ka sngeet hai
sundr rchna
dr. ved vyathit
wahwa...achhi rachna....badhai...
kya sunder geet hai bhavpurn shbdon se susajit
saader
rachana
जिन रिश्तों ने तोड़ी डोरी
भूलूँ वो सूरत अनजान|
अँधियारों में संग चलें जो
कर लूँगी उनसे पहचान|
ब्अहुत सुन्दर गीत।
Nice Poem
Alok Kataria
अँधियारों में संग चलें जो
कर लूँगी उनसे पहचान|
बहुत ही सुंदर गीत के लिए बधाई !
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