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बुधवार, १६ दिसम्बर २००९

वतन की याद आती है [ग़ज़ल] - देवी नागरानी


रचनाकार परिचय:-
11 मई 1949 को कराची (पाकिस्तान) में जन्मीं देवी नागरानी हिन्दी साहित्य जगत में एक सुपरिचित नाम हैं। आप की अब तक प्रकाशित पुस्तकों में "ग़म में भीगी खुशी" (सिंधी गज़ल संग्रह 2004), "उड़ जा पँछी" (सिंधी भजन संग्रह 2007) और "चराग़े-दिल" (हिंदी गज़ल संग्रह 2007) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आप वर्तमान में न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) में एक शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं।.....
जुदाई से नयन है नम, वतन की याद आती है
बहे काजल न क्यों हरदम, वतन की याद आती है

समय बीता बहुत लंबा हमें परदेस में रहते
न उसको भूल पाए हम, वतन की याद आती है

तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं
ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है

चढ़ा है इतना गहरा रंग कुछ उसकी मुहब्बत का
हुए गुलज़ार जैसे हम, वतन की याद आती है

यहाँ परदेस में भी फ़िक्र रहती है हमें उसकी
हुए हैं गम से हम बेदम, वतन की याद आती है

हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है

वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका
लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है

14 comments:

श्यामल सुमन १६ दिसम्बर २००९ ७:१२ AM  

वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका
लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है

बहुत खूब देवी जी। हर एक पंक्ति अपने आप में कीमती है। लीजिए मैं भी कोशिश करूँ-

बसे परदेश में फिर भी दिलों में शेष है जज्बा
यही भारत का है दम खम वतन की याद आती है

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

सुषमा गर्ग १६ दिसम्बर २००९ ८:०९ AM  

हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है

बहुत प्रभावी और संवेदनशील ग़ज़ल है।

बेनामी १६ दिसम्बर २००९ ८:१० AM  

Nice Gazal.

Alok Kataria

अनन्या १६ दिसम्बर २००९ १२:०२ PM  

देवी नागरानी जी गज़ल विधा में जाना माना नाम हैं। परदेस की व्यथा गज़ल बखूबी कहती है।

निधि अग्रवाल १६ दिसम्बर २००९ १:०४ PM  

तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं
ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है
अहसास से भरी ग़ज़ल है। आँख भर आती है।

योगेन्द्र मौदगिल १६ दिसम्बर २००९ १:३१ PM  

Wahwa...Behtreen GAZAL

अवनीश एस तिवारी १६ दिसम्बर २००९ २:०१ PM  

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है |
देश प्रेम से ओत - प्रोत |
बधाई |

अवनीश तिवारी
मुम्बई

अभिषेक सागर १६ दिसम्बर २००९ २:०४ PM  

बहुत अच्छी ग़ज़ल, बधाई।

नीरज गोस्वामी १६ दिसम्बर २००९ ६:५२ PM  

हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है

दीदी की ग़ज़ल पर क्या कहूँ...बहुत दिल से लिखती हैं...और जब सुनातीं है तो बस फिर पूछिए मत...सुरों की गंगा बहती है...इश्वर उन्हें हमेशा खुश रखे....
नीरज

AlbelaKhatri.com १७ दिसम्बर २००९ १२:०९ AM  

dhnya hain aap

aap ke jazbaat

aap ki lekhni

aur aapka ishq-e-vatan

___vandan is vatan ka

__vandan aap jaise hamvatan ka !!

शशि पाधा १७ दिसम्बर २००९ ५:४१ AM  

देवी जी,
मिट्टी की सोंधी सोंधी सुगन्ध सी अपने देश की याद हर पल तन और मन में बसती है और फ़ासले रुलाते हैं। इस अह्सास को संवेदनशील शब्दों में पिरो कर आपने मन और आँख दोनों ही भिगो दी। धन्यवाद इतनी सुन्दर गज़ल के लिये तथा साहित्यशिल्पी का आभार।

शशि पाधा

रितु रंजन १७ दिसम्बर २००९ ७:४८ AM  

अत्यंत संवेदनशील ग़ज़ल।

सुलभ सतरंगी २० दिसम्बर २००९ ६:०४ PM  

वतन की याद आती है...

संवेदनाओं को छुआ है आपने. दर्द बहुत है इस ग़ज़ल में...

- सुलभ

Devi Nangrani १८ जनवरी २०१० ६:२० AM  

वतन से दूर, रहकर भी मन की इस साहित्य शिल्प के माध्यम से कुछ कसक कम हो जाती है. आप सभी का प्रोत्साहन मेरी लिए बहुत ही अनमोल मार्गदर्शक है.
कभी रोता है दिल मेरा, कभी आंखें हैं होती नम
क्या मिट पायेगी ये दूरी, क्या होंगे फासले ये कम
आप सभी का हार्दिक आभार और साहित्य शिल्प के इस मंच को भी मेरा अभिनन्दन
देवी नागरानी

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': परिकरान्कुर में रखे, साभिप्राय कवि नाम.-काव्य का रचना शास्त्र: ४७,
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