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शुक्रवार, १८ दिसम्बर २००९

ये ज़िंदगी [कविता] - किरण सिन्धु


साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:- किरण सिन्धु, उत्तर प्रदेश की मूल निवासी हैं। आपकी शिक्षा झारखण्ड में तथा विवाह बिहार में हुआ। वर्तमान में आप मुंबई में अवस्थित हैं। आपको परिवार और परिवेश में बचपन से ही साहित्य प्रेम का भरपूर अवसर प्राप्त हुआ। श्रधेय गुरुजनों की कृपा से जो भी ज्ञानार्जन हुआ उसके सहारे अध्यापन के क्षेत्र में २५ वर्षों तक सुदृढ़ रूप से खड़ी रही। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति किशोरावस्था से ही प्रेम रहा है. उलझनों से घिरी हुई ज़िंदगी,
दहशत से डरी हुई ज़िंदगी.

कभी दिल का दामन,कभी मन की शक्ति,
कभी उनका कहना,कभी अपनी युक्ति.
भटकते रहे हम यहाँ से वहाँ तक,
ना समाधान पाया और ना पायी मुक्ति.

तमाम कोशिशें बेकार हो रहीं,
नाउम्मीदियों से भरी हुई ज़िंदगी.

कहाँ से चले थे, कहाँ आ गए हम,
नहीं मालूम आगे कहाँ तक है जाना,
मन की थकन से टूटती साँसें,
कैसे होगा पूरा सफ़र अनजाना.

घुमावदार राहें और गहराती साँझ,
दुविधा के मोड़ पर ठहरी हुई ज़िंदगी.

उपरवाले की कृपा समझ ली,
जीवन में मैंने जब भी कुछ पाया,
मगर हादसों ने जब तोडी हिम्मत,
पूर्वजन्म का कर्मफल कहलाया.

पहेली बनकर मथती है मन को,
बेबस सी सहमी - सिहरी हुई ज़िंदगी.

मन की छवि जब कागज़ पर उतरी,
चितेरे ने उसमें रंग भरना चाहा,
मनमोहक रंगों में कूची डुबोकर,
अपनी कल्पना को साकार करना चाहा.

मगर जानता कहाँ था चितेरा,
बेरंग होगी धुली हुई ज़िंदगी.

कोई शंख शान्ति का फूँक देता,
कोई तो पुकार राहत की होती,
कोई दिव्य - रश्मि दिशाओं से आकर,
ह्रदय के तिमिर में जला देती ज्योति.

कोई मसीहा आकर थाम लेता,
जीने की ललक से भरी हुई ज़िंदगी.

6 comments:

अनन्या १८ दिसम्बर २००९ १:४५ PM  

जिन्दगी पर बहुत सुन्दर पंक्तियाँ।

सुषमा गर्ग १८ दिसम्बर २००९ २:२४ PM  

सार्थक कविता

अभिषेक सागर १८ दिसम्बर २००९ ४:०० PM  

बहुत अच्छी कविता, बधाई।

nitesh १८ दिसम्बर २००९ ४:३० PM  

कोई शंख शान्ति का फूँक देता,
कोई तो पुकार राहत की होती,
कोई दिव्य - रश्मि दिशाओं से आकर,
ह्रदय के तिमिर में जला देती ज्योति.

कोई मसीहा आकर थाम लेता,
जीने की ललक से भरी हुई ज़िंदगी.

सुन्दर अभिव्यक्ति

vishwash १९ दिसम्बर २००९ ८:३८ AM  

प्रस्तुत कविता लेखिका की सोक और उनका दर्शन प्रस्तुत करती है।

sumita १९ दिसम्बर २००९ ११:४६ AM  

बहुत ही खूबसूरत भाव.. कोई मसीहा आकर थाम लेता,जीने की ललक से भरी हुई ज़िंदगी.

फरवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

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नाटक पर स्थायी स्तंभ:
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अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
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