इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे,
इनती खुशियाँ भी न देना, दुःख पर किसी के हंसी आने लगे ।

नहीं चाहिए ऐसी शक्ति जिसका निर्बल पर प्रयोग करूँ,
नहीं चाहिए ऐसा भाव किसी को देख जल-जल मरूँ ।
ऐसा ज्ञान मुझे न देना अभिमान जिसका होने लगे,
ऐसी चतुराई भी न देना लोगों को जो छलने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।

इतनी भाषाएँ मुझे न सिखाओ मातृभाषा भूल जाऊं,
ऐसा नाम कभी न देना कि पंकज कौन है भूल जाऊं ।
इतनी प्रसिद्धि न देना मुझको लोग पराये लगने लगे,
ऐसी माया कभी न देना अंतरचक्षु भ्रमित होने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।

ऐसा भग्वन कभी न हो मेरा कोई प्रतिद्वंदी हो,
न मैं कभी प्रतिद्वंदी बनूँ, न हार हो न जीत हो।
ऐसा भूल से भी न हो, परिणाम की इच्छा होने लगे,
कर्म सिर्फ करता रहूँ पर कर्ता का भाव न आने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।

ज्ञानी रावण को नमन, शक्तिशाली रावण को नमन,
तपस्वी रावण को स्विकरूं, प्रतिभाशाली रावण को स्विकरूं ।
पर ज्ञान-शक्ति की मूरत पर, अभिमान का लेपन न हो,
स्वांग का भगवा न हो, द्वेष की आँधी न हो, भ्रम का छाया न हो,
रावण स्वयम् का शत्रु बना, जब अभिमान जागने लगे ।
इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे ।
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रचनाकार परिचय:

नाम : प्रकाश पंकज (पंकज)

जन्म : मुजफ्फरपुर, बिहार.

उम्र : २४

शिक्षा : बिरला प्रोद्योगिकी संस्थान , मेसरा, रांची से मास्टर ऑफ़ कंप्यूटर एप्लिकेशन्स।

वर्त्तमान में कोलकाता में एक बहूराष्ट्रीय कम्पनी में सॉफ्टवेर इंजिनियर के रूप में कार्यरत । अनेकों ब्लोग्स, ईपत्रिकाओं आदि में नीयमित लेखन।

5 comments:

  1. अच्छी भावना से लिखी हुई कविता

    उत्तर देंहटाएं
  2. इतनी भाषाएँ मुझे न सिखाओ मातृभाषा भूल जाऊं,
    ऐसा नाम कभी न देना कि पंकज कौन है भूल जाऊं इतनी प्रसिद्धि न देना मुझको लोग पराये लगने लगे,
    ऐसी माया कभी न देना अंतरचक्षु भ्रमित होने लगे ।
    इतनी ऊँचाई न देना ईश्वर कि धरती पराई लगने लगे

    बढ़िया... बहुत बढ़िया कविता....धन्यवाद पंकज जी

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यबाद देता हूँ साहित्यशिल्पी और इनके पाठकों को जिन्हों ने मुझ जैसे नवजात को अवसर दिया !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत हीअच्छी कविता है,मेरी जो भी अच्छे खूबी है,वो आपको ऐसी और सारी कविता लिखने में सहायक हों

    उत्तर देंहटाएं

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