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मंगलवार, २ फरवरी २०१०

बनने का श्रेय..............! [कविता] - जूबी मंसूर

बार- बार बिछुड़ने पर
समझाता हूं स्वयं को एक वाक्य से.....
रुदन बनने का श्रेय, मिला तेरे विश्वास से
माना कि, पीड़ा का परिचायक हूँ
पर साथी भी तो हूँ तेरा
कारण अकारण आ जाना
क्या सम्बन्ध साक्ष्य नहीं मेरा
निनाद हूँ टूटे भावों का
क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
अतीत की अकुलाहट
बीता ! वर्तमान हूँ
विडम्बना है जीवन की
मेरी मृत्यु ही मेरा जीवन है
कि चक्षु पे गिरते ही
हस्तों से तू उठाता है
यें असीम प्रेम ही तो है मेरा
तेरी हर पीड़ा अपनाता हूँ
जब भी रहोगे शोक में
सर्वप्रथम मैं आता हूँ
बार-बार बिछुड़ने पर
स्वयं को मैं समझाता हूँ ........

----------

रचनाकार - जूबी मंसूर



12 comments:

संजय भास्कर २ फरवरी २०१० १:२३ PM  

अरे ये तो बहुत सुन्दर कविता है !

संजय भास्कर २ फरवरी २०१० १:२३ PM  

Behad sundar likha hai..

अनन्या २ फरवरी २०१० १:४८ PM  

जब भी रहोगे शोक में
सर्वप्रथम मैं आता हूँ
बार-बार बिछुड़ने पर
स्वयं को मैं समझाता हूँ ........

बहुत सुन्दर

बेनामी २ फरवरी २०१० ३:२९ PM  

Shabash!

Shakti

अवनीश एस तिवारी २ फरवरी २०१० ४:४२ PM  

सुन्दर रचना | बधाई |
लेकिन १ शब्द नहीं जमा - जैसे - कि चक्षु पे गिरते ही (पे)

अवनीश तिवारी

बेनामी २ फरवरी २०१० ५:३२ PM  

Nice Poem.

Alok Kataria

श्रद्धा जैन २ फरवरी २०१० ७:३४ PM  

क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
अतीत की अकुलाहट
बीता ! वर्तमान हूँ
विडम्बना है जीवन की
मेरी मृत्यु ही मेरा जीवन है
कि चक्षु पे गिरते ही
हस्तों से तू उठाता है
यें असीम प्रेम ही तो है मेरा
तेरी हर पीड़ा अपनाता हूँ
जब भी रहोगे शोक में
सर्वप्रथम मैं आता हूँ
बार-बार बिछुड़ने पर
स्वयं को मैं समझाता हूँ ........



bahut gahri abhivayakti

vedvyathit २ फरवरी २०१० १०:३८ PM  

jo gir gye
vo kho gye
girte hee
jmi doj ho gye
jo girne se rh gye
ve moti ho gye
moti ko sheje rkhna
use kleje me
chhipaye rkhna
kyon ki
haathon me
ve kb aate hain
najok hain bhut hi
hath ke
chhute hee tut jate hain

vedvyathit २ फरवरी २०१० १०:४० PM  

jo gir gye
vo kho gye
girte hee
jmi doj ho gye
jo girne se rh gye
ve moti ho gye
moti ko sheje rkhna
use kleje me
chhipaye rkhna
kyon ki
haathon me
ve kb aate hain
najok hain bhut hi
hath ke
chhute hee tut jate hain
[email protected]

रंजना ३ फरवरी २०१० १२:०४ AM  

वाह...अद्वितीय...अप्रतिम ....
मर्म को छू गयी आपकी यह रचना...अनुपम बिम्ब प्रयोग और उसका अद्भुत विस्तार किया आपने...

Neelesh K. Jain ३ फरवरी २०१० १:२७ PM  

क्षोभ नहीं मैं साक्ष्य हूँ
अतीत की अकुलाहट
बीता ! वर्तमान हूँ

apoorv abhivyakti

neelesh Jain
www.yoursaarathi.blogspot.com

सुरेश यादव ३ फरवरी २०१० ११:११ PM  

सुन्दर रचना के लिए बधाई.

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