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Saturday, December 6, 2008

प्रेमगीत [कविता] - श्यामल सुमन

मिलन में नैन सजल होते क्यों, विरह में जलती आग.
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

आए पतंगा, बिना बुलाए, कैसे दीप के पास.
क्या चिंता, परिणाम की उसको, पिया मिलन की आस.
जिद है मिलकर, मिट जाने की, यह कैसा अनुराग..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

मीठे स्वर का, मोल तभी तक, संग बजाते हों साज.
वीणा की वाणी होती क्या, तबले में आवाज.
सुर सजते जब, चोट हो तन पे, और ह्रदय पर दाग..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

देखे चाँद को, रोज चकोरी, क्या बुझती है प्यास.
कमल खिले, निकले जब सूरज, होते अस्त उदास.
हँसे कुमुदिनी, चंदा के संग, रोये सुमन का बाग़..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

11 टिप्पणियाँ:

शोभा December 6, 2008 4:25 PM  

बहुत सुन्दर लिखा है। वाह!

रंजना December 6, 2008 5:26 PM  

वाह ! अतिसुन्दर सुकोमल भावों की मनमोहक अभिव्यक्ति मन को छु गई.इस सुंदर कविता की लिए आपका साधुवाद .

नंदन December 6, 2008 7:29 PM  

देखे चाँद को, रोज चकोरी, क्या बुझती है प्यास.
कमल खिले, निकले जब सूरज, होते अस्त उदास.
हँसे कुमुदिनी, चंदा के संग, रोये सुमन का बाग़..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

बहुत प्रभावी भाषा, अच्छी रचना।

गीता पंडित (शमा) December 6, 2008 8:28 PM  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

बहुत सुन्दर भाषा.....


सुर सजते जब, चोट हो तन पे, और ह्रदय पर दाग..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..


वाह...

अभिषेक सागर December 6, 2008 9:11 PM  

श्यामल जी बहुत अच्छी कविता के लिये बधाई।

yogesh samdarshi December 6, 2008 9:21 PM  

संदर प्रेम गीत भई वाह मजा आ गया

देखे चाँद को, रोज चकोरी, क्या बुझती है प्यास.
कमल खिले, निकले जब सूरज, होते अस्त उदास.
हँसे कुमुदिनी, चंदा के संग, रोये सुमन का बाग़..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

अति संदर बधाई

श्यामल सुमन December 7, 2008 8:15 AM  

शोभा जी, रंजना जी, नंदन जी, गीता जी, अभिषेक जी एवं योगेश जी,

प्रोत्साहन हेतु आप सबको हार्दिक धन्यवाद। यही स्नेह बनाये रखें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

सुशील कुमार December 7, 2008 2:21 PM  

ओस की ताजा बूँदों सी यह प्रेम-कविता है।

विश्व दीपक ’तन्हा’ December 7, 2008 2:56 PM  

हँसे कुमुदिनी, चंदा के संग, रोये सुमन का बाग़..
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग..

सच में बहुत हीं सुंदर प्रेमगीत है।
बधाई स्वीकारें।

-तन्हा

मोहिन्दर कुमार December 8, 2008 12:40 PM  

बहुत सही कहा आपने सुमन जी... प्यार देने का नाम है... पाने का नहीं.. "प्रेम है दीपक राग"

दो आत्माओं की एकरूपता में ही प्रेम निहित है..

श्यामल सुमन December 9, 2008 3:18 PM  

आप सबका प्यार और समर्थन मिला। यह मेरा सौभाग्य। स्नेह बनाये रखें।


सादर
श्यामल सुमन
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श्रद्धांजलि:- "हिन्दी चेतना" की ओर से फ़ादर कामिल बुल्के को श्रद्धाँजलि - शशि पाधा, डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' नहीं रहीं [श्रद्धांजलि] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल",
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