........प्रात: 6.00 बजे से:- देखा है मैंने [बाल-कविता] - जूही तिवारी.......अपरान्ह 1.00 बजे से:- सप्ताह का कार्टून......

सोमवार, ३ अगस्त २००९

जीवन तो चलता रहता है [कविता] - गौरव शुक्ला

Photobucket

चाहे कोई साथ निभाए
आए कोई या मत आए।
दीप जलाकर बैठे कोई,
या फिर कोई उसे बुझाए।
किसकी राह निहारे सूरज,
वह हर पल चलता रहता है
जीवन तो चलता रहता है।
रचनाकार परिचय:-

गौरव शुक्ला कुछ समय पूर्व तक कवि और पाठक दोनों ही के रूप में अंतर्जाल पर बहुत सक्रिय रहे हैं।

अपनी सुंदर और भावपूर्ण कविताओं, गीतों और गज़लों के लिये पहचाने जाने वाले गौरव को अपने कुछ व्यक्तिगत कारणों से अंतर्जाल से दूर रहना पड़ा। साहित्य शिल्पी के माध्यम से एक बार फिर आपकी रचनायें अंतर्जाल पर आ रही हैं।

आँख लगे तो नींद भी आए,
नींद लगे तो स्वप्न सताए।
एक परी आए धीरे से,
हाथ पकड़ ले और उठाये।
भोर हुए तक साथ हमारे,
दीपक भी जलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।

एक पखेरू एक ठिकाना,
और वहीं तक आना-जाना।
शीतल-शीतल छांव घनेरी,
सौंप दिया है आबो-दाना।
भीतर जैसे पंख पसारे,
पंछी है पलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।

धड़कन थोड़ी साँस जरा सी
थोड़ी खुशियाँ और उदासी,
अँखियाँ फिर भी प्यासी-प्यासी।
बेदर्दी है समय निगोड़ा
यह सबको छलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।

10 comments:

अवनीश एस तिवारी ३ अगस्त २००९ १:१४ PM  

चाहे कोई साथ निभाए
आए कोई या मत आए।
दीप जलाकर बैठे कोई,
या फिर कोई उसे बुझाए।
किसकी राह निहारे सूरज,
वह हर पल चलता रहता है
जीवन तो चलता रहता है।


-- बहुत खूब


अवनीश तिवारी

दिगम्बर नासवा ३ अगस्त २००९ ४:२१ PM  

sach kaha hai....जीवन तो चलता रहता है.....Lajawaab abhivyakti

अनन्या ३ अगस्त २००९ ४:३४ PM  

धड़कन थोड़ी साँस जरा सी
थोड़ी खुशियाँ और उदासी,
अँखियाँ फिर भी प्यासी-प्यासी।
बेदर्दी है समय निगोड़ा
यह सबको छलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।

बहुत खूब गौरव जी, बेमिसाल रचना।

बेनामी ३ अगस्त २००९ ५:३९ PM  

Nice Poem. Thanks.

Alok Kataria

rachana ३ अगस्त २००९ ९:०२ PM  

sunder abhivyakti
sur me saje to kya hi baat ho
rachana

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ४ अगस्त २००९ ७:२६ AM  

जीवन दर्शन का पुट लिए मधुर गीत.

मोहिन्दर कुमार ४ अगस्त २००९ १:०९ PM  

बहुत ही सुन्दर और मर्म स्पर्शी विचारों से ओतप्रोत है यह रचना... गौरव जी बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढी...कैसे हैं आप ? कोई फ़ोन नंबर जिस पर आप से सम्पर्क हो सके.. जो नंबर मेरे पास है वह लगता नहीं है

sudhir saxena 'sudhi' ५ अगस्त २००९ १२:१५ AM  

एक पखेरू एक ठिकाना,
और वहीं तक आना-जाना।
शीतल-शीतल छांव घनेरी,
सौंप दिया है आबो-दाना।
भीतर जैसे पंख पसारे,
पंछी है पलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।
गौरव शुक्ला जी को
भावपूर्ण और इतनी सुंदर कविता के लिए बधाई!
सुधीर सक्सेना 'सुधि' जयपुर

KK Yadav ५ अगस्त २००९ १०:१३ AM  

एक पखेरू एक ठिकाना,
और वहीं तक आना-जाना।
शीतल-शीतल छांव घनेरी,
सौंप दिया है आबो-दाना।
भीतर जैसे पंख पसारे,
पंछी है पलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।
....Bahut sundar bhavabhivyakti..badhai !!

अजय कुमार ५ अगस्त २००९ २:२३ PM  

एक पखेरू एक ठिकाना,
और वहीं तक आना-जाना।
शीतल-शीतल छांव घनेरी,
सौंप दिया है आबो-दाना।
भीतर जैसे पंख पसारे,
पंछी है पलता रहता है।
जीवन तो चलता रहता है।
भावपुर्ण अच्छी कविता...

जनवरी-2010 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': समासोक्ति -काव्य का रचना शास्त्र: ४४,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1,
लघु कथा:-
डायरी:-
पेंटिंग:- [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

जनवरी -2010 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:-
श्रद्धांजलि:-
साक्षात्कार:-
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP