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गुरुवार, ६ अगस्त २००९

अभिव्यक्ति [कविता] - शकुंतला तरार

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रचनाकार परिचय:-

१९५६ में कोण्डागांव (बस्तर) में जन्मी श्रीमती शकुंतला तरार एक वरिष्ठ कवयित्री और स्वतंत्र पत्रकार हैं। "बस्तर का क्रांतिवीर- गुण्डाधुर", "बस्तर की लोककथायें" आदि कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। हल्बी भाषा में इनकी हाइकू रचनाओं का एक संग्रह भी प्रकाशित है।

पहाड़ों के बीच से निकलती है
इक नदी
निस्छल,
निर्मल
शीतल जलधारा लिये
अपनी मौज में वह बहती जाती है
तट पर आये लोगों को
अपनी शीतलता से ठंडक पहुंचाती

ठीक उसी तरह वह भी
जीवन की कुटिलता से परे
उन्मुक्त,निर्द्वन्द्व
निष्कपट भाव से निकलती है घर से
तो
न जाने कितने लोगों की आंखों को
पहुंचाती है ठंडक
कुछ की आंखों में
उसकी खूबसूरती की प्रशंसा
कुछ की या ज्यादा की आंखें
वासनामयी
परन्तु उसे इन सबसे, कोई सरोकार नहीं
वह चलती जाती राह अपनी

वह जा रही है देखो
अरे भई कहां ?
महुआ बीनने,
नशा यहां तीन गुना हो गया है
मदमाता यौवन,
महुआ,
और वसन्त
तीनों ने
जीवन को
नई अभिव्यक्ति दी है
मानो।

9 टिप्पणियाँ:

Kavi Kulwant August 6, 2009 1:53 PM  

khoobsurat...

अनन्या August 6, 2009 2:37 PM  

चित्र खींचती हुई कविता है मंत्रमुग्ध हो गयी।

अभिषेक सागर August 6, 2009 2:40 PM  

बहुत अच्छी कविता, बधाई। स्वागत साहित्य शिल्पी पर।

अवनीश एस तिवारी August 6, 2009 3:31 PM  

ठीक है |
सच कहूँ तो आप का परिचय पढ़ आपसे और उम्मीद करता हूँ |

कुछ और बेहतर भेजिए तो और मजा आये |

अवनीश तिवारी

निधि अग्रवाल August 6, 2009 4:14 PM  

वह जा रही है देखो
अरे भई कहां ?
महुआ बीनने,
नशा यहां तीन गुना हो गया है
मदमाता यौवन,
महुआ,
और वसन्त
तीनों ने
जीवन को
नई अभिव्यक्ति दी है

प्रभावी अभिव्यक्ति है।

बेनामी August 6, 2009 4:14 PM  

Nice Poem. Thanks.

Alok Kataria

रचना सागर August 6, 2009 4:18 PM  

ताजगी है कविता में।

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) August 6, 2009 10:46 PM  

नमस्कार शकुन्तला जीएक भुत ही सुन्दर रचना है ,,, जीवन की सच्चाई को जिस तरह से आप ने नदी के माध्यम से व्यक्त किया है बेहतरीन है , एक शिक्षा प्रद कविता है जो ये सिखाती है , की जीवन में निर्बाध गति से बढ़ते रहो जीवन में आयी चमक दमक को स्थायी न समझ कर , और आये दुखो को भी अस्थाई मान कर जीवन के पथ पर बढ़ते चलो इस पथ पर अगर लोग तुमारी बुराईया या अच्छाईयो को बाधा चढा कर भी कहे तो उनसे बिना प्रभावित हुए बढ़ते रहो अपने लक्ष पे एक नदी की भाति
मेरा प्रणाम स्वीकार करे
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

अविनाश वाचस्पति August 9, 2009 9:48 AM  

तुलना को नये अर्थ प्रदान करती
एक बेहतरीन ताजा प्रस्‍तुति
कवयित्री को बधाई

नवम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

कविता:-ओम प्रकाश शर्मा, मोहिन्दर कुमार, तेजेन्द्र शर्मा, श्यामल सुमन, शिशिर दूत फिर आया [आज राजाभाई कौशिक के जन्म दिवस पर विशेष प्रस्तुति] - राजाभाई कौशिक,
कहानी:-
गज़ल:-
जीवन परिचय:-
नज़म:-
काव्यालोचना:-

साहित्य समाचार:-बाजारवाद पर "हमकलम" की गोष्ठी - एक रिपोर्ट,

गीत:-

कवि चर्चा:-
साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव:-
साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव समारोह/ काव्य गोष्ठी/ ब्लॉगर्स महा सम्मेलन - रिपोर्ट, " हिन्दी दिवस और साहित्य शिल्पी का आज जन्मदिवस" [आज साहित्य शिल्पी का स्थापना दिवस है] - विशेष प्रस्तुति, " साहित्य शिल्पी वार्षिकोत्सव समारोह/ काव्य गोष्ठी/ ब्लॉगर्स महा सम्मेलन की रिपोर्ट, समाचार माध्यमों एवं विभिन्न ब्ळोग मंचों पर।,

नवम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': अलंकार परिणाम यदि, कार्य सके संधान -काव्य का रचना शास्त्र: ३५,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:-
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [धर्म-आध्यात्म पर स्थायी स्तंभ] - अजय कुमार:-
कार्टून:-
अभिषेक तिवारी:सप्ताह-1, सप्ताह-2 सुरेश शर्मा की कूची से [कार्टून] - 10सुरेश शर्मा की कूची से [कार्टून] - 11
लघु कथा:- एकलव्य - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ,
डायरी:-
पेंटिंग:- मंजीत सिंह के चित्र [ई-प्रदर्शनी]:-
यात्रा वृतांत:-

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