अभिव्यक्ति [कविता] - शकुंतला तरार

रचनाकार परिचय:-
पहाड़ों के बीच से निकलती है
इक नदी
निस्छल,
निर्मल
शीतल जलधारा लिये
अपनी मौज में वह बहती जाती है
तट पर आये लोगों को
अपनी शीतलता से ठंडक पहुंचाती
ठीक उसी तरह वह भी
जीवन की कुटिलता से परे
उन्मुक्त,निर्द्वन्द्व
निष्कपट भाव से निकलती है घर से
तो
न जाने कितने लोगों की आंखों को
पहुंचाती है ठंडक
कुछ की आंखों में
उसकी खूबसूरती की प्रशंसा
कुछ की या ज्यादा की आंखें
वासनामयी
परन्तु उसे इन सबसे, कोई सरोकार नहीं
वह चलती जाती राह अपनी
वह जा रही है देखो
अरे भई कहां ?
महुआ बीनने,
नशा यहां तीन गुना हो गया है
मदमाता यौवन,
महुआ,
और वसन्त
तीनों ने
जीवन को
नई अभिव्यक्ति दी है
मानो।








9 टिप्पणियाँ:
khoobsurat...
चित्र खींचती हुई कविता है मंत्रमुग्ध हो गयी।
बहुत अच्छी कविता, बधाई। स्वागत साहित्य शिल्पी पर।
ठीक है |
सच कहूँ तो आप का परिचय पढ़ आपसे और उम्मीद करता हूँ |
कुछ और बेहतर भेजिए तो और मजा आये |
अवनीश तिवारी
वह जा रही है देखो
अरे भई कहां ?
महुआ बीनने,
नशा यहां तीन गुना हो गया है
मदमाता यौवन,
महुआ,
और वसन्त
तीनों ने
जीवन को
नई अभिव्यक्ति दी है
प्रभावी अभिव्यक्ति है।
Nice Poem. Thanks.
Alok Kataria
ताजगी है कविता में।
नमस्कार शकुन्तला जीएक भुत ही सुन्दर रचना है ,,, जीवन की सच्चाई को जिस तरह से आप ने नदी के माध्यम से व्यक्त किया है बेहतरीन है , एक शिक्षा प्रद कविता है जो ये सिखाती है , की जीवन में निर्बाध गति से बढ़ते रहो जीवन में आयी चमक दमक को स्थायी न समझ कर , और आये दुखो को भी अस्थाई मान कर जीवन के पथ पर बढ़ते चलो इस पथ पर अगर लोग तुमारी बुराईया या अच्छाईयो को बाधा चढा कर भी कहे तो उनसे बिना प्रभावित हुए बढ़ते रहो अपने लक्ष पे एक नदी की भाति
मेरा प्रणाम स्वीकार करे
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084
तुलना को नये अर्थ प्रदान करती
एक बेहतरीन ताजा प्रस्तुति
कवयित्री को बधाई
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