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गुरुवार, ९ जुलाई २००९

मौसम के मस्तक पर [कविता] - दीपक गुप्ता


रचनाकार परिचय:-

दीपक गुप्ता [का जन्म 15 मार्च 1972 को दिल्ली में हुआ। आप दिल्ली विश्वविद्यालय से कला में स्नातक हैं। आपकी प्रकाशित कृति हैं:- सीपियों में बंद मोती (कविता संग्रह) - 1995; आप की रचनायें देश के सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व टेलीविजन कार्यक्रमों में प्रसारित होती रही हैं।
मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं

अक्सर मुझ्सरे बतियाता है
मस्त हवाओं का हरकारा
आते जाते बतला जाता
क्या है प्रियतम हाल तुम्हारा

झंझाओं को झेल रही है
नित दीपक की जलती बाती
कितना जीवन शेष अभी है
मन ही मन मैं आंक रहा हूं

तन की तन से दूरी है पर
मन का है मन से चिर बंधन
मेरी सांसों मे सुरभित है
तेरी सांसों का ही चंदन

अब तो सावन की रितु भी
मुझको बिलकुल नहीं सुहाती
नीर लिये नयनों के नभ में
कल्पित सपने टांक रहा हूं

मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं

12 comments:

दिव्यांशु शर्मा ९ जुलाई २००९ २:४० PM  

एक अच्छी कोशिश .. हिंदी विरह गीत कम ही देखने को मिलते हैं आज कल ..
शुरुआत बहुत सुघड़ और समर्पण से युक्त है |
"मौसम के मस्तक पर मैंने नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में बादल का मन झांक रहा हूं"
और अंत में भी वेदना की अभिव्यक्ति बड़ी ही कलात्मक और स्पर्श करने वाली है ,,
"नीर लिये नयनों के नभ में कल्पित सपने टांक रहा हूं"|
पता नहीं क्यूँ पर अन्तरो के भावः इन पंक्तियों से मेल नहीं खा रहे ..(मेरे ख्याल में )
उदाहरण :
तन की तन से दूरी है पर
मन का है मन से चिर बंधन
मेरी सांसों मे सुरभित है
तेरी सांसों का ही चंदन
यहाँ कवि आशावादी नज़र आता है और दैहिक नैकट्य पर आत्मिक नैकट्य को बेहतर मानता है .. जो की हल्का सा सूफी झुकाव का है |
अगली ही पंक्ति
"अब तो सावन की रितु भी मुझको बिलकुल नहीं सुहाती"
कुछ अलग सा भाव ले कर उठती है जो मुझे असमंजस में डाल गयी .....
दीपक भाई से उन के विचार जानना चाहूँगा इस पर..
बहर हाल .. इस गीत के लिए बधाई ..

निधि अग्रवाल ९ जुलाई २००९ ३:०३ PM  

मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं

बहुत खूब दीपक जी।

सुभाष नीरव ९ जुलाई २००९ ३:३९ PM  

दीपक जी का यह गीत बहुत अच्छा लगा। बधाई !

अभिषेक सागर ९ जुलाई २००९ ३:४० PM  

बहुत सुन्दर गीत, बधाई।

Udan Tashtari ९ जुलाई २००९ ६:१३ PM  

मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं

-बेहतरीन रचना!

राजीव तनेजा ९ जुलाई २००९ ६:१५ PM  

सुन्दर रचना

gita pandit ९ जुलाई २००९ ६:३५ PM  

झंझाओं को झेल रही है
नित दीपक की जलती बाती
कितना जीवन शेष अभी है
मन ही मन मैं आंक रहा हूं


अति सुंदर.....

दीपक जी !
आभार........

श्रद्धा जैन ९ जुलाई २००९ ७:२९ PM  

मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं
Itna sunder geet bahut bhaav purn man ki sari baaten kah di

Aapko padhna bahut achha laga

अर्चना तिवारी ९ जुलाई २००९ ९:४९ PM  

अब तो सावन की रितु भी
मुझको बिलकुल नहीं सुहाती
नीर लिये नयनों के नभ में
कल्पित सपने टांक रहा हूं....

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

AlbelaKhatri.com ९ जुलाई २००९ ११:४४ PM  

mausam ke
mastak par jab
likhdee jaati paati

patjhadi
rut bhi aaye toh
use utaar nahin paati

saans ka chandan
samooche nandan van par bhaari hai
kyonki priye ki
deh piya ko pranon se bhi pyari hai

_______badhaai deepakji
bahut bahut badhaai !

GEET AAPKA DIL ME UTAR GAYA
AAJ MAN AANAND SE BHAR GAYA

KK Yadav १० जुलाई २००९ ५:२८ PM  

मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूं....Sumadhur shabd..bade sundar bhav...!!

ACHARYAJI KAHI ११ जुलाई २००९ ५:४३ PM  

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