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Tuesday, August 25, 2009

कुछ क्षणिकायें [कविता] - देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

निकम्मा
मत धोना चेहरा अपना,
रास्ते की धूल और पसीना...
चिपका रहने देना।
हो सके तो लगा लेना कुछ और कालिख...
ये लोग निकम्मा कहते हैं...


रचनाकार परिचय:-

देवेश वशिष्ठ उर्फ खबरी का जन्म आगरा में 6 अगस्त 1985 को हुआ। लम्बे समय से लेखन व पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडे रहे हैं। आपने भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रिकारिता विश्वविद्यालय से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की और फिर देहरादून में स्वास्थ्य महानिदेशालय के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने लगे। दिल्ली में कई प्रोडक्शन हाऊसों में कैमरामैन, वीडियो एडिटर और कंटेन्ट राइटर की नौकरी करते हुए आपने लाइव इंडिया चैनल में असिस्टेंट प्रड्यूसर के तौर पर काम किया। बाद में आप इंडिया न्यूज में प्रड्यूसर हो गय्रे। आपने तहलका की हिंदी मैगजीन में सीनियर कॉपी एडिटर का काम भी किया है। वर्तमान में आप पत्रकारिता व स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

सीख
इस बार मत दिखाना चीरकर अपना सीना...
मत बताना कि जी नहीं सकोगे उसके बिना...
या बताना भी तो...
थोड़ा-थोड़ा।
मुझे तो ये जमाना बंदर की तरह नचाता है...

श्श्श्श
एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
गर्द-मिट्टी-धूल
सालों ने नहीं उठा, नहीं धुला
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।

श्श्श्श-2
चुप...
बोलना मत कुछ...
चुपचाप निकल जाना...
पैर बचाकर।
और आंखें..?
उन्हें भी मत देखने देना कुछ
देखोगे तो लोग दीवाना कहेंगे...
बोलोगे तो पागल कहलाओगे।
दीवानों और पागलों को पत्थर मारते हैं लोग।

14 टिप्पणियाँ:

दृष्टिकोण August 25, 2009 1:04 PM  

भई वाह!

अनन्या August 25, 2009 1:22 PM  

एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
गर्द-मिट्टी-धूल
सालों ने नहीं उठा, नहीं धुला
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।

बहुत खूब।

अभिषेक सागर August 25, 2009 3:05 PM  

बहुत अच्छी क्षणिकायें, बधाई।

दिव्यांशु शर्मा August 25, 2009 3:56 PM  

देवेश भाई का अपना एक हस्ताक्षर है जो कि इतनी कम उम्र में कम ही कवियों में दीखता है ... कविताओं में एक आक्रामकता एक व्यंग्य है जो काफी प्रभावी है ... बैक स्लैप काफी तीखा है ... बहुत सुन्दर ....

अनिल कुमार August 25, 2009 3:56 PM  

गहरी क्षणिकायें हैं, सभी बेहतरीन।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक August 25, 2009 5:22 PM  

इस सुन्दर क्षणिकाओं के लिए बधाई!

सुषमा गर्ग August 25, 2009 5:33 PM  

ताजगी है क्षणिकाओं में।

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) August 25, 2009 5:58 PM  

देवेश जी बहुत बेहतरीन इतनी मर्म स्पर्शी रचना के लिए आप का बहुत बहुत धन्यबाद
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

gita pandit August 25, 2009 6:26 PM  

एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
गर्द-मिट्टी-धूल
सालों ने नहीं उठा, नहीं धुला
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।


बहुत अच्छी क्षणिकायें...

बधाई.....

सुशील कुमार August 25, 2009 7:19 PM  

बढ़िया लिखा है भाई।

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ August 25, 2009 8:52 PM  

.........
सच कहूं तो सालों से हिली ही नहीं है जुबान...
अब भी मत हिलाना...
बहुत गर्द उड़ेगी।

सभी क्षणिकायें गम्भीर हैं ... उपरोक्त पंक्तियों ने विशेष प्रभावित किया.

परमजीत बाली August 25, 2009 10:39 PM  

बहुत बढिया क्षणिकाएं हैं बधाई।

rachana August 26, 2009 6:59 PM  

sari chhadikayen achchhi hain .soch aur shbd snyojan bahut khoob hai
rachana

Dr. Sudha Om Dhingra August 27, 2009 4:23 AM  

बढ़िया क्षणिकाएं..
एक दरीचा बिछा है जुबान पर मेरी
भारी-मोटी जुबान बंद रहती है अक्सर
तथा
देखोगे तो लोग दीवाना कहेंगे...
बोलोगे तो पागल कहलाओगे।
दीवानों और पागलों को पत्थर मारते हैं लोग।
क्या खूब कहा है...
बहुत -बहुत बधाई!

सितम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

कविता:-अजय यादव, सुशील कुमार, दीपक शर्मा, राजीव रंजन प्रसाद, तेज राम शर्मा, रचना श्रीवास्तव, हिन्दी दिवस पर तीन कवितायें - डॉ. वेद व्यथित/ डी. के. सिंह/ शोभा महेन्द्रू., अवनीश तिवारी, प्रथम नागरिक हैं पेड़ पृथ्वी पर [पेंटिंग -कविता श्रंखला - 3] - सुशील कुमार,
कहानी:- शक्ति प्रकाश,
गज़ल:-देवमणि पांडेय, नीरज गोस्वामी, दीपक बेदिल, दिगम्बर नासवा, दीपक गुप्ता, श्रद्धा जैन,
जीवन परिचय:-
नज़म:-
काव्यालोचना:-

साहित्य समाचार:-"स्पंदन" संस्था का प्रथम कथा पुरस्कार श्रीमती मृदुला गर्ग को - वीरेन्द्र जैन, दिविक रमेश का हिंदी कविता में एक पृथक चेहरा है - केदारनाथ सिंह - डॉ. प्रेम जन्मेजय,

गीत:-

कवि चर्चा:- रचनाकार से मिलिए -गीति-शिल्पी महेंद्रभटनागर - साहित्य शिल्पी,
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सितम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

स्थायी स्तंभ:-
गज़ल: शिल्प और संरचना:
नाटक पर स्थायी स्तंभ:
काव्य का रचना शास्त्र - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल': काव्य का रचना शास्त्र:२6, काव्य का रचना शास्त्र:२7, वर्ण्य एक वर्णन कई, अलंकार उल्लेख -काव्य का रचना शास्त्र: २८, जोर सहित दोहराव ही, है पुनरुक्तिप्रकाश- काव्य का रचना शास्त्र: २९ ,
हितोपदेश की कहानियों का काव्यरूप:- ब्राह्मण और तीन दुष्ट [हितोपदेश का काव्यानुवाद - 5] - सीमा सचदेव,
आलेख:- छत्तीसगढ़ में गणेश उत्सव की प्राचीन परंपरा - प्रो. अश्विनी केशरवानी, आशा भोसले एक परिचय - अजय कुमार, भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी के बढ़ते कदम - के के यादव, वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रभाषा हिन्दी की विकास प्रक्रिया - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, दुर्गा सप्तशती अर्थात 700 प्रयोग [नवरात्रि पूजा विधि पर विशेष आलेख] - अजय कुमार, दिनकर का काव्य : दहकते अंगारों पर इंद्रधनुषों की क्रीड़ा [रामधारी सिंह दिनकर जयंती पर विशेष] - सुशील कुमार,

सितम्बर-2009 में अब तक प्रकाशित...

पुस्तक-अंश:-
व्यंग्य:- जिन्नागिरी के पेंच - आलोक पुराणिक,
श्रद्धांजलि:- "हिन्दी चेतना" की ओर से फ़ादर कामिल बुल्के को श्रद्धाँजलि - शशि पाधा, डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' नहीं रहीं [श्रद्धांजलि] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल",
साक्षात्कार:-कमिटमेंट की कमी है आज के लेखन में - पुष्पा भारती। [प्रसिद्ध साहित्यकार तथा प्रखर पत्रकार पुष्पा भारती जी से बातचीत] - मधु अरोरा,
विमर्श:-
हिन्दी साहित्य का इतिहास:-

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