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शुक्रवार, ७ अगस्त २००९

"धीमन की नौका" [कविता] - मोहिन्दर कुमार


वृक्ष था जब मैं
जड था
गति लुभाती मुझको
सोचा करता
काश होता मैं भी
चलायमान
क्या है नदी के
इस धारे से
उस धारे तक
मैं भी जाता जान.


रचनाकार परिचय:-

मोहिन्दर कुमार का जन्म 14 मार्च, 1956 को पालमपुर, हिमाचल प्रदेश में हुआ। आप राजस्थान यूनिवर्सिटी से पब्लिक- एडमिन्सट्रेशन में स्नातकोत्तर हैं।

आपकी रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं साथ ही साथ आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं। आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में एक हैं। वर्तमान में इन्डियन आयल कार्पोरेशन लिमिटेड में आप उपप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।


सुना है लोगों को कहते
तीव्र मनोइच्छा कोई भी हो
कालान्तर में
देवयोग से
पूर्ण हो जाती है

कौन जाने यह क्या था
मेरी इच्छा की पूर्ति
मेरे जडपन का अंत
अथवा
आकारण इच्छा का दण्ड

चली आरी कुल्हाडी मुझ पर
जड से जडपन से
टूटा नाता
खण्ड खण्ड हुआ
बचा जो कुछ वह थी
छीलन और टूटन

तना रहता जो तना था
आरे पर जा कर
तख्तों में हुआ विभाजित
इक कौने में पडा हुआ मैं
था मन से पीडित और पराजित

फ़िर इक दिन
समय ने करवट बदली
आरे से
मिस्त्री के अड्डे तक आया
सधे हाथों ने
काट पीट कर
छील छाल कर
जोड तोड कर
एक्दम बदल दी मेरी काया

हुई रंग रोगन से लीपा पोती
और मेरा श्रृंगार हुआ
अब बेनाम नहीं
इक नाम मिला
"धीमन की नौका"
आकार बदल कर मुझे मिला
वरदान गति का
और इच्छित
नदिया तक जाने का मौका

13 comments:

dr roli tiwari mishra ७ अगस्त २००९ १:३७ PM  

MOHINDER JI,,SABSE PAHLE MERI SHUBH-KAMNAYEN SWEEKAR KARE...SAHITYA SHILPI PAR AATE HI ITNI SUNDER RACHNA KO PADHNA..MERA SAUBHAGYA HAI,,AB POORA DIN AAPKI RACHNA KI PRATIGOONJ MAIN KATEGA...

BAHUT SUNDER...............
MANAV JEEVAN KI CHIRANTAN ABHILASHAON KA SACHCHA LEKHA-JOKHA
JO NA MILA USSE PANE KI CHAHAT AUR JO MILA USSME KUDH KA KHONA..............

SACHMUCH APNE SAATH BAHA LE HI GAYI........AAPKE......."""DHEEMAN KI NAUKA"""

हेमन्त कुमार ७ अगस्त २००९ २:०२ PM  

मोहिन्दर जी अच्छी कविता..।

nitesh ७ अगस्त २००९ २:०२ PM  

हुई रंग रोगन से लीपा पोती
और मेरा श्रृंगार हुआ
अब बेनाम नहीं
इक नाम मिला
"धीमन की नौका"
आकार बदल कर मुझे मिला
वरदान गति का
और इच्छित
नदिया तक जाने का मौका

उम्मीद से भरीपूरी कविता।

राजीव रंजन प्रसाद ७ अगस्त २००९ ४:२० PM  

जड के चैतन्य हो जाने की मनोरम कहानी कहती है आपकी कविता। बहुत प्रभावी रचना।

अभिषेक सागर ७ अगस्त २००९ ४:२८ PM  

बहुत अच्छी कविता है, बधाई।

rachana ७ अगस्त २००९ ८:१२ PM  

kavita me kahani bahut sunder tarike se likhi hai padh ke aanand aaya
badhai
saader
rachana

अर्चना तिवारी ७ अगस्त २००९ १०:४० PM  

bahut-bahut sunder kavita

अमिता ८ अगस्त २००९ १२:०० AM  

बहुत सुंदर कविता है
धीमन की नौका"
आकार बदल कर मुझे मिला
वरदान गति का
और इच्छित
नदिया तक जाने का मौका
आनन्द आया पढ़ कर
धन्यवाद
अमिता

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ८ अगस्त २००९ ४:४७ PM  

भुत खूब मित्र,,, एक जड़ सजीव की संवेदन शीलता और

इच्छा शक्ति को दर्शाती बहुत ही सुन्दर रचना

मेरी बधाई स्वीकार करे

सादर

प्रवीण पथिक

9971969084

KK Yadav ८ अगस्त २००९ ६:११ PM  

कौन जाने यह क्या था
मेरी इच्छा की पूर्ति
मेरे जडपन का अंत
अथवा
आकारण इच्छा का दण्ड
....Behad khubsurat abhivyakti..badhai.

दिगम्बर नासवा ९ अगस्त २००९ २:२३ PM  

बहुत सी उम्मीद जगाती है आपकी लाजवाब रचना............ सुन्दर लिखा है

बेनामी १३ अगस्त २००९ ४:३७ PM  

आपने बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है. मन में समायी हुई इच्छा के फ़लीभूत होने की चाह और उसके बाद की कशमकश को खूब अच्छे ढंग से आपने दर्शाया है.

कविता धींगरा

Kusum Thakur १३ अगस्त २००९ ६:१८ PM  

बहुत अच्छी कविता है.

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