रक्षाबंधन [कविता] - दिव्यांशु शर्मा
दीदी जब सावन में,
काली मिट्टी पर उग आए,
हरे पौधों को देखता हूँ,
तो मेरी साँवली कलाई पर,
हरे रंग का रेशम,
खुद ब खुद,
उग आता है,
मैं अपने माथे पर,
सुर्ख रोली ढूँढता हूँ,
और,
जब सहर आसमाँ के माथे पर,
वही लाल रोली मलती है,
तो हल्का-सा टीका मुझे भी,
लगा जाती है!!
मेरे सर पर छिड़कती है,
तो मैं होश में आता हूँ,
और,
सूनी कलाई, सूनी दुनिया,
सूना माथा पाता हूँ!!
कभी बारिश बन कर आओ,
शायद मैं अकेला हूँ,
मुझे साथ ले जाओ...
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11 टिप्पणियाँ:
दिव्यांशु बहुत अच्छी कविता है।मन को छू गयी संवेदनायें।
बहुत अच्छी कविता है, बधाई।
दीदी, कभी भोर, कभी मिट्टी,
कभी बारिश बन कर आओ,
शायद मैं अकेला हूँ,
मुझे साथ ले जाओ...
सुन्दर रचना।
MAN MEIN UTAR GAYEE AAPKI RACHNA.... LAJAWAAB LIKHA HAI
दीदी, कभी भोर, कभी मिट्टी,
कभी बारिश बन कर आओ,
शायद मैं अकेला हूँ,
मुझे साथ ले जाओ..
.सावन में एक ऐसी भी बरखा होती है......
नयन भीग गए......दिव्यांशु जी.....
प्यार भरी रचना।
संवेदनशील कविता
kya hi sunder bhav upmaye sab kuchh mujhe bahut achchhi lagi aap ki kavita
saader
rachana
बरसात जब बूँदों का अक्षत,
मेरे सर पर छिड़कती है,
तो मैं होश में आता हूँ,
और,
सूनी कलाई, सूनी दुनिया,
सूना माथा पाता हूँ!!
दीदी, कभी भोर, कभी मिट्टी,
कभी बारिश बन कर आओ,
शायद मैं अकेला हूँ,
मुझे साथ ले जाओ.
एक एक पंक्ति दिल को छू जाती है।
मर्मस्पर्शी संवेदनायें लिये कविता.
बहुत सुंदर रचना है मन को छू गई. यूँ कहो भैया की याद आ गई
सादर
अमिता
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