धूप से बरसा था यौवन [कविता] - प्रवीण शुक्ला

धूप से बरसा था यौवन
खिल उठा धरती का मन
कवितायें लिखने का शौक बचपन से है। कुछ ऐसा देख कर या सुन कर या महसूस कर जिससे हृदय की भावनाएं उद्वेलित होने लगें तो उन्हें शब्द देने का प्रयास करते रहते हैं।
घास की नोकों से हंसती
चुलबुली झोको से हंसती
प्यार ले ले के बरसती
प्यार दे दे के बरसती
वो चंचली बाला
हर अंग था उसका पुलकित
हर ढंग था उसका हर्षित
यौवन के दहलीज पे
रखती कदम वो चल रही थी
हर मोड़ पर गिरती फिर
गिर कर सभल रही थी
सौन्दर्य उसका गिर रहा था
वस्त्र की सिलवटो से
उठ रही थी मंद गंधे
जुल्फ की लटो से
विचारशील सी वो
मुग्ध चल रही थी
हर घडी घमंड से
उछल रही थी
साँस उसकी तेज थी
और हौसले बढे हुए
कर रहे थे स्वागत
लोग सब खड़े हुए
वो मुस्करा रही थी
गा रही थी
गीत ही गाये जा रही थी
कुछ चमक थी कुछ दमक थी
पहन रखा था जी उसने वसन
धूप से वर्षा था यौवन
खिल उठा धरती का मन








12 comments:
बहुत अच्छी कविता, बधाई।
बहुत बढ़िया काव्य
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चाँद, बादल और शाम
श्रंगार और प्रकृति एक साथ। बहुत खूब।
अच्छी कविता।
अनुज कुमार सिन्हा
भागलपुर
वर्तनी की अशुद्धियाँ हैं। कृपया सुधार कर प्रस्तुत करें।
प्रकृति और
तनकृति का
मनभावन
चित्रण।
Sundar abhivyakti..badhai.
सही समय पर सही चीज़ ही याद आती है
सुन्दर कविता
prakriti की rangon से khili sundar kriti
सुंदर कविता है...विशेष कर ए पंक्तियाँ..
कुछ चमक थी कुछ दमक थी
पहन रखा था जी उसने वसन
धूप से वर्षा था यौवन
खिल उठा धरती का मन
Bahut hi sunder kavita
प्रवीण सब से पहले तो तुम्हें जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई और ढेरों आशीर्वाद कविता मे प्रकृति और शिंगार का संयोजन बहुत सुन्दरता से किया है बहुत बडिया लिखते हो बहुत आगे जाओगे आसमान छूने का जज़्वा दिल मे ले कर चलो भगवान तुम पर बहुत कृपालु हैं शुभकामनायें
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