आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा... [कविता] - योगेश समदर्शी
"असली भारत" आज अकेला
ढूंढ रहा है कहां तिरंगा?
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
कवि परिचय:- जो था हमको गया बताया
भ्रष्ट हुआ ईमान घूमता
धन का रंग है सब पर छाया
देश प्रेम का भाव घट रहा,
चिंतन घूम रहा बेढंगा..
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
आज भला हम किस्से पूछें?
जिसको देखों अकड रहा है
और पनाता अपनी मूंछें
ज्ञान धूप में रिक्शा खींचे.
लूट का पैसा बढता चंगा..
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
ताड सरीखी उगी इमारत
भाई चारा गया भाड में
खूनी होती गई इबादत
आजादी का मक्खन निकला
और विकास का रंग दुरंगा.
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
एक किनारा उधर बढा है
एक खाई नित होती गहरी
एक की मनचाही सब बातें
एक की जीवन रेखा ठहरी
एक के हाथों खूब कचौडी
और एक है घूमे नंगा.
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
पछतावे के बंद रिवाज
स्वच्छंदता नित बढती ऐसे
जैसे बढे कोढ में खाज
आस्तीन जिनका घर होता
उनके शीने सजा तिरंगा.
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
जो बेमेहनत धन पा जाए
उसको क्या रंगो से लेना
भूख में जो पत्थर खा जाए
खुशहाली के रंग अनेकों
पर दुख होता है बेरंगा
आह! तिरंगा, वाह तिरंगा...








12 comments:
वह रंगों की बात करेगा
जो बेमेहनत धन पा जाए
उसको क्या रंगो से लेना
भूख में जो पत्थर खा जाए
खुशहाली के रंग अनेकों
पर दुख होता है बेरंगा
आह! तिरंगा, वाह तिरंगा...
कविता के तेवर सिहरन पैदा कर देते हैं।
BEEEHATTTAREEEEEEEN
Alok Kataria
देश की दुर्दशा को ब्याँ करती एक सच्ची कविता
दिल से लिखी हुई कविता।
योगेश समदर्शी अपने शब्दों को कागज में उतारने से पहले उन्हे जी लेते हैं। उनकी कविता के एक एक शब्द में आह्वाहन है और पंक्ति पंक्ति में तार्किकता है। कविता में अंतर्निहित व्यंग्य भी प्रहारक है -
"असली भारत" आज अकेला
ढूंढ रहा है कहां तिरंगा?
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
बहुत बढ़िया है भाई.
बहुत अच्छी कविता है योगेश जी, बधाई।
सामयिक विसंगतियों को उद्घाटित करती रचना हेतु बधाई.
वह रंगों की बात करेगा
जो बेमेहनत धन पा जाए
उसको क्या रंगो से लेना
भूख में जो पत्थर खा जाए
खुशहाली के रंग अनेकों
पर दुख होता है बेरंगा
आह! तिरंगा, वाह तिरंगा..
darpan hai samaaj ka....
sundar kavita
WAH TIRANGA WAH TIRANGA
KYA BAAT H JANAB
DIL KE HAR KONE KO CHHU GAYI KAVITA
RAMESH SACHDEVA
[email protected]
WAH TIRANGA WAH TIRANGA
KYA BAAT H JANAB
DIL KE HAR KONE KO CHHU GAYI KAVITA
RAMESH SACHDEVA
[email protected]
बहुत सुन्दर मन को छूती हुई रचना... आभार
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